बड़े भाई हो, बाप मत बनो…
यह कहकर वृंदा ने किशोर के हाथ से मिठाई का डिब्बा लिया और अपनी भाभी को देते हुए बोली—
“भाभी, लीजिए ये मिठाई… हमें किसी को बाँटनी नहीं है, हम ही खा लेंगे।”
इतना कहकर वृंदा नम आँखों से अपने कमरे में चली गई। किशोर वहीं कुर्सी पर बैठ गया। फिर अपनी पत्नी से बोला—
“सुनो, मैं थोड़ी देर बाहर जा रहा हूँ…”
और वह बाहर चला गया।
लक्ष्मी (किशोर की पत्नी) की माँ ने यह सब देखा और लक्ष्मी से बोली—
“घोर कलयुग है बेटा! देखना, ये वृंदा कैसी है… मेरे जमाई तो राम जैसे हैं, पर उनकी कद्र नहीं करती! कैसे बात करके गई?”
लक्ष्मी ने शांत स्वर में कहा—
“माँ, आप कुछ नहीं जानतीं… आज मैंने जो देखा है, वो आजकल कहीं देखने को नहीं मिलता।
आज मैंने भाई-बहन के स्नेह का अद्भुत उदाहरण देखा है।”
“जानती हैं माँ, वृंदा को आगे की पढ़ाई के लिए लंदन जाना था। पेंटिंग की पढ़ाई वहाँ बेहतर हो सकती है, यह पता चलने पर किशोर जी बहुत खुश थे। उन्होंने ठान लिया था कि वह वृंदा को जरूर भेजेंगे।
उन्होंने सारी जानकारी इकट्ठी की, लेकिन पता चला कि खर्च बहुत ज्यादा है—फीस, रहने का खर्च, सब मिलाकर बहुत बड़ा खर्च था।”
“इसलिए वृंदा पीछे हट गई। उसने कहा— ‘जाने दो भाई, मैं यहीं कुछ कर लूँगी।’
लेकिन किशोर जी यह सह नहीं पा रहे थे, क्योंकि पिता के गुजर जाने के बाद उनकी अपनी पढ़ाई भी ऐसे ही रुक गई थी। उन्हें लगा कि इतिहास फिर से दोहराया जा रहा है…”
“उन्होंने वृंदा से कहा—
‘मैं बड़े-बड़े लोगों से मिलूँगा, जो चैरिटी करते हैं। तुम्हारे सारे सर्टिफिकेट दिखाऊँगा, बताऊँगा कि तुम कितनी होनहार हो… सिर्फ पैसों की वजह से तुम्हारा करियर नहीं रुकेगा।'”
“फिर से उम्मीद जगी… सब खुश थे।
कुछ दिनों बाद किशोर जी ने फोन किया—
‘घर में कुछ अच्छा बनाना, मैं मिठाई लेकर आ रहा हूँ… हमारी मेहनत रंग लाई, पैसों का इंतजाम हो गया!'”
“इसलिए आज वह मिठाई का डिब्बा लेकर आए थे…”
लक्ष्मी की माँ ने कहा—
“ये तो बहुत अच्छी बात है! फिर ऐसा क्या हुआ?”
लक्ष्मी बोली—
“माँ, अगर आप थोड़ी देर पहले की बात सुन लेतीं, तो हैरान रह जातीं…”
“जब किशोर जी घर आए, तो बहुत खुश थे। उन्होंने वृंदा को बुलाया—
‘वृंदा, जल्दी बाहर आओ! तुम्हारे लिए खुशखबरी है… तुम्हारी लंदन की पढ़ाई का पूरा इंतजाम हो गया है!'”
वृंदा ने पूछा—
“किसने पैसे दिए, भाई?”
किशोर बोले—
“एक बड़े सेठ हैं, तुम्हारी काबिलियत देखकर खुश हो गए… उनका नाम गणपत राव है।”
वृंदा ने तुरंत पूछा—
“आपने घर गिरवी रखा है ना?”
किशोर चौंक गए—
“तुम्हें कैसे पता?”
वृंदा की आँखों में आँसू आ गए—
“भाई, मेरी सहेली का भाई उसी सेठ के यहाँ काम करता है… उसी ने बताया।
आप जानते हैं, ब्याज का चक्कर इंसान की खुशियाँ छीन लेता है… चैन और सुकून सब खत्म कर देता है।
आपकी खुशियाँ छीनकर मैं आगे कैसे बढ़ सकती हूँ?”
“अगर मैं लंदन चली जाती और बाद में मुझे यह पता चलता, तो क्या मैं खुद को कभी माफ कर पाती?”
वह रोते हुए बोली—
“खुशियाँ लंदन जाकर नहीं मिलतीं भाई… अपनी काबिलियत से यहाँ भी कुछ किया जा सकता है।
आपने ऐसा क्यों किया?”
फिर उसने नम आँखों से कहा—
“याद रखिए… आप मेरे बड़े भाई हैं, बाप बनने की कोशिश मत कीजिए…”
इतना कहकर वृंदा अपने कमरे में चली गई।
वैशाली आडेसरा
राजकोट, गुजरात