प्रायश्चित – उषा भारद्वाज

   घर में शादी का माहौल था। रिया कुछ घंटे पहले ही दिल्ली से आई है। साथ में उसका 5 साल का बेटा मंटू भी है। अक्षांश रिया के पति को समय न मिल पाने के कारण वह नहीं आ सके।

उनका मन तो बहुत था छोटी साली की शादी में सम्मिलित होने का, मगर नहीं पहुंच पा रहे थे। इसलिए रिया को अकेले ही मंटू को लेकर आना पड़ा। सभी भाई- भाभी अपनी बड़ी बहन की आवभगत में लग गए थे।

 चाची- चाचा, मां उसके पास बैठकर हाल-चाल पूछ रहे थे। पापा कहीं काम से बाहर गए हुए थे। मंटू बहुत जल्दी ही सबके साथ घुल-मिल जाने वाला बच्चा था इसलिए वह एक छोटे बच्चे के साथ खेलने लगा था। 

   तभी लाठी की ठक-ठक की आवाज आई जिसको सुनते ही रिया की निगाह बाहर के दरवाजे की तरफ चली गई जहां उलझे -उलझे बाल जिनमें कंघी शायद काफी समय से नहीं की गई होगी, लंबी घनी दाढ़ी जिसके बीच चेहरा छुपा था, सिर्फ दो छोटी आंखें दिखाई पड़ रहीं थीं। शरीर पर एक लंबी कमीज और पजामा पहने दाएं हाथ के बगल में लाठी टिकी थी

जो यकीनन चलने में मदद करने वाली थी क्योंकि दायां पर ठीक से चलने योग्य नहीं था। रिया ने कुछ पल देखा एकदम से मां की तरफ पलट कर बोली-” मां अशर्फी चाचा है ना।” मां ने हामी  में सिर हिलाया। तभी पास बैठे छोटे चाचा उठकर उनके पास पहुंच गए और बोले- दद्दा अभी खाना नहीं बना है। थोड़ी देर बाद आना।

” अशर्फी चाचा ने कहा-” खाने के लिए नहीं आए हैं। बिट्टी आई है का?  अभी कुछ देर पहले कोई बोल रहा था तभी आए हैं।” और इसके साथ ही अशर्फी देहलीज तक आकर रुक गए क्योंकि यह उनके लिए एक लक्ष्मण रेखा की तरह थी

वह लक्ष्मण रेखा जिसको सीता जी ने एकबार तो सोचा फिर साधु बिना भिक्षा के न जाने पाये ये सोचकर रेखा को पार कर लिया था। लेकिन अशर्फी चाचा ने कभी भी पार नहीं किया।  तब तक रिया वहां पहुंच गई।

” नमस्ते चाचा।”

    रिया ने खुशी से अभिवादन किया। “नमस्ते बिटिया कैसी हो ?”अशर्फी चाचा ने खुश होते हुए पूछा।

 “ठीक हूं चाचा आप बताइए, और यह कैसे गंदे -गंदे बने हैं नहाते नहीं है क्या? रिया ने प्यार से डांटते हुए कहा ।

अशर्फी दांत निकाल कर हंसते हुए बोले-” अरे तुम भी डांटने लगी बिटिया। हम नहाते हैं मगर फिर कहीं बैठ जाते हैं तो बेटा धूल माटी में गंदे हो जाते हैं। कल ही तालाब में कपड़े धोए थे।”तभी मंटू जो दूर से देख रहा था धीरे से अपनी मम्मी के पास आया और रिया  के कान के पास मुंह लगाकर धीरे से बोला-” मम्मा यह कौन है ? मुझे डर लग रहा है आप इनसे क्यों बात कर रही हो?”

 रिया ने मंटू का चेहरा अशरफी की तरफ करके कहा-” मंटू बेटा, यह भी छोटे नानू की तरह आपके एक और छोटे नानू हैं।” “मम्मा ये नानू कैसे  हैं।” मंटू ने अपने दोनों हाथों से रिया को कमर से कस कर पकड़ते हुए कहा।

अशरफी चुपचाप मंटू को देख रहे थे। फिर बोले-” बिटिया ये तुम्हारा बेटा है। हमसे डर रहा है क्या?” 

” नहीं चाचा इसने आपको कभी देखा नहीं है इसलिए ऐसे कर रहा है।” रिया सच बताकर अशर्फी को दुखी नहीं करना चाहती थी। क्योंकि वह जानती थी कि अशरफी चाचा बहुत दुखी रहते हैं। इतनी देर में अंदर से छोटी बहन टिया चाचा का खाना लेकर आई और चाचा वहीं पड़े तखत पर बैठ गए। रिया फिर बात करने को कहकर मंटू को लेकर अंदर चली गई ।

   मगर जब भी वह अशर्फी चाचा से मिलती है। उसके अंदर तूफान से उठने लगता था। आखिर कब तक, कब तक ये सजा चलेगी? कब इसका अंत होगा?  यह सोचते सोचते रिया 20 साल पहले अतीत में चली गई।

    जब वह लगभग 12 -13 साल की रही होगी । उसके पापा शंकर तीन भाई थे शंकर रिया के पापा, उनसे छोटे अशर्फी जिनके नाम के लिए कई लोगों ने प्रश्न चिन्ह लगाया और हर बार दादा रामप्रसाद ने एक ही जवाब बताया कि जब अशर्फी का जन्म हुआ था तो उनके एक बचपन के घनिष्ठ मित्र जिनका नाम हामिद था

वो आये और आते ही बोले-” भाई रामप्रसाद ये तुम्हारा बेटा तो अशर्फी की तरह चमक रहा है बुरा न मानो तो आज से मै इसे अशर्फी बुलाऊंगा।” रामप्रसाद ने भी मित्र की बात का आदर किया और कहा तुम ही क्यो हम सब इसे अशर्फी ही कहेंगे। वैसे लिखा पढ़ी में रुद्र नारायन नाम था, सबसे छोटे चाचा का नाम कैलाश था।  सब एक साथ रहते थे। घर में रामप्रसाद जी की ही चलती थी।  उनके अनुसार ही सारे काम होते थे।

वह अपने बात के बहुत पक्के थे जो कह देते थे इस पर अडिग हो जाते थे। मझले चाचा जिनका नाम अशरफी था वह घर के सभी कामकाज करते थे पूरे घर की जो आवश्यकता होती तुरंत दादा से पैसे लेकर ले आते। कोई और काम होता वह भी कर देते।

  उनका मन पढ़ने में कम और सामाजिकता में ज्यादा लगता था। उनकी मित्र मंडली भी बड़ी थी जिसमें हर तरह के मित्र थे यह बात रामप्रसाद को बिल्कुल पसंद नहीं थी। अक्सर बाप-बेटे में इसी बात को लेकर बहस हो जाती है फिर दोनों लोग खाना ना खाते फिर दादी भी दुखी होकर बिना खाए रह जाती। दादी को रिया की मां कुमुद समझाती, पर्दा करने के कारण दादा  से कुछ ना कह पाती।

फिर अशर्फी चाचा को समझाती कि पिताजी से माफी मांग लो मगर अशर्फी  पर मानो  जवानी की अकड़ थी। जो कहीं भी झुकने नहीं देती थी।  जब दादा दूसरे समय भी खाना ना खाते तो अशर्फी को माफी मांगनी पड़ती । और फिर सब खाना खाते ।

    समय बीता, अशर्फी के विवाह की बारी थी, मगर अशर्फी विवाह नहीं करना चाहते थे। दादी जब विवाह के लिए समझाती तो उठकर बाहर चल देते थे।मित्रों के साथ बैठकर गाना बजाना हो हल्ला करते।

यही उनकी दिनचर्या बन गयी थी। एक दिन तो हद पार हो गई जब अशर्फी के कदम गेट पर आते ही लड़खड़ा गये। जिनको उन्होंने बहुत संभाला मगर राम प्रसाद की पैनी निगाहों से छिपा न सके। दादाजी क्रोध से फुफकार उठे । फिर जो उन्होंने विष उगला उसका असर जीवनभर के लिए हो गया।

 हां राम प्रसाद ने चीखकर कहा-” अशर्फी वहीं रुक जाओ।जहां से आए हो वहां वापस लौट जाओ।”

 दोबारा इस घर की देहलीज पर कदम मत रखना तुम अपनी गंदी संगति की वजह से इतने नालायक हो गए हो कि आज तुम शराब पीकर भी आ गए , अब हमारे घर में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है। आज से तुम हमारे लिए मर गए हो और तुम्हारे लिए हम सब मर गए इतना कहते कहते वह हांफने लगे लगे । पास में खड़ी दादी चिल्लाने-रोने लगीं- अरे यह क्या कह रहे हो हमारा बेटा है गलती हो गई सुधार लेगा।” ” नहीं तुम अंदर जाओ और अभी कभी नहीं आएगा यहां।” रामप्रसाद जी  अपनी पत्नी के ऊपर चीखते  हुए बोले।

 अशर्फी तो मानो पत्थर का होकर खड़ा था। वह समझ नहीं पा रहा था कि अब वह क्या करें कहां जाए? रिया रोने लगी क्योंकि उसको दोनों चाचा में सबसे ज्यादा अशर्फी चाचा से प्रेम था । वह बोली -“नहीं चाचा आप कहीं मत जाना।”

 तभी उसकी मां उसको अंदर ले गई अशर्फी के कदम बाहर की तरफ मुड़ गए । दादी जी  चिल्लाती रही मगर ना राम प्रसाद का दिल पसीजा, और न ही अशर्फी लौटा। सभी समझे थोड़ी देर का गुस्सा है शांत होने पर सब ठीक हो जाएगा लेकिन कुछ ठीक नहीं हुआ। दादाजी का क्रोध अशर्फी के नाम से बढ़ जाता। दादी बीमार हो गई उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया। इशारों से रिया की मां से कहती -“दुल्हिन अशर्फी को बुला दो ।” मगर राम प्रसाद जी के सामने किसी की हिम्मत ना पड़ती और आखिर एक दिन उनकी पत्नी अशर्फी -अशर्फी कहते हुए अंतिम सांस  लेकर इस दुनिया से चली गयीं। जब दादी का पार्थिव शरीर बाहर रखा गया तो रिया ने भीड़ में कंबल ओढ़े अशर्फी चाचा को देखा। मगर वह कुछ बोली नहीं। उसके रोने की आवाज और तेज हो गई। वह चाहती थी कि चाचा के पास जाए मगर अपने को रोक लिया। दादी के मरने के बाद से दादा रामप्रसाद उदास रहने लगे थे। रिश्तेदारों ने समझाया कि बेटा है इतना गुस्सा करना ठीक नहीं। मगर अब दादा का जवाब होता था – कि जो उस को चाहती थी वहीं चली गई तो अब क्या….। रिया सोचती कि क्या सिर्फ मां बच्चे को प्यार करती है पिता नहीं करते एक दिन इसका जवाब भी मिल गया जब उसने देखा दादाजी अपने कमरे में अशरफी चाचा की कमीज लेकर बड़बड़ा रहे थे-” काहे ऐसा किया तुमने? अशर्फी तुम जब यहां थे तब भी परेशान करते थे। आज तुमको निकाल दिया तब भी परेशान हैं। ओ शंकर की अम्मा तुम चली गई, अब हम भी जी नहीं पाएंगे।” रिया दरवाजे के पास से छिपकर देख सुन रही थी इसका मतलब पिता भी प्यार करते हैं मगर बच्चे की गलतियों को माफ नहीं कर पाते।

       सुनने में आया कि अशरफी अपने दोस्त जगत के घर में एक कमरा लेकर रहने लगा है। उसी के साथ खेतों में काम करता जो मिल जाता उसी से गुजारा कर रहा था। अब तो वो बहुत पीने लगा था। कुछ गांव के लोगों ने उसे जायदाद में हिस्सा लेने के लिए भड़काया तो अशर्फी ने कहा -” जब हम उनके लिए मर गये तो हिस्सा काहे का। हमने गलती की है । बहुत मन दुखाया है अपने अम्मा पिता जी का । इसलिए मेरा यही प्रायश्चित है कि हम उनसे कुछ नहीं मांगेंगे।

  समय बीता, रिया का विवाह हो गया उसकी विदाई के समय रिया की निगाहें सबके बीच में अपने अशर्फी चाचा को ढूंढ रही थी । उसे विश्वास था कि वह जरूर आएंगे। भले दूर से देख कर चले जाए और तभी रिया का चेहरा खुशी से चमक उठा। सबसे दूर कंबल ओढ़ अशर्फी चाचा खड़े थे जिनके दोनों हाथ आशीर्वाद देने के लिए ऊपर उठे थे। रिया ने भी अपने हाथों को ऊपर करके हाथ जोड़ लिया साथ ही उसकी आंखें तेज गति से छलकने लगी थीं। रिया के विवाह के दो वर्ष बाद दादाजी का देहांत हो गया। रिया एक दिन के लिए आई थी तब अशर्फी चाचा से नहीं मिल पाई मन में एक कसक लेकर वापस चली गई थी।

     एक दिन दादा जी की वसीयत पढ़ी गई। तो रिया की दूसरी बात का जवाब भी मिल गया। जिसमें लिखा था-” मैं अपने पुत्र अशर्फी को माफ करता हूं। मेरी जायदाद के तीन हिस्से होंगे उसमें एक हिस्सा उसका भी है।”

   रिया ने जब सुना तो उसका मन भावुक हो उठा वह रोने लगी। लेकिन अशरफी ने सब मना कर दिया यह कहकर कि जब देहलीज से निकालने वाले मेरे पिता ही नहीं रहे तो मैं वापस जाकर जायदाद लेकर क्या करूंगा। हर पल अम्मा और पिताजी का पीड़ा से भरा चेहरा याद आएगा जो मेरी वजह से था। यही मेरा प्रायश्चित है कि मैं जब तक जिंदा रहूं, ऐसे ही अकेला रहूं।” लेकिन शंकर ( रिया के पापा) ने अधिकार भरे शब्दों में कहा-” ठीक है मत आओ, लेकिन दोनों वक्त खाना खाने आना पड़ेगा भले तुम बाहर से ही खाकर चले जाना ।मैं एक तखत रखवा देता हूं।”

 अशर्फी ने सर झुकाकर कहा -” दद्दा आपकी बात को इंकार नहीं करेंगे इसलिए सिर्फ एक समय का ही खाना खायेंगे।” तब से सुबह या शाम को एकबार आकर बाहर पड़े तखत पर बैठ जाते हैं वहीं खाना दे दिया जाता है। वहीं खाकर फिर अपने कमरे में  चले जाते हैं। अब तो ठीक से काम भी नहीं कर पाते।  बचपन में एकबार पैर टूटा वो सही न हुआ बहुत इलाज करवाया गया था तब भी पैर थोड़ा छोटा हो गया । पहले तो बिना बैसाखी के भी चल लेते थे मगर अब बिना बैसाखी के नहीं चल पाते।  बहुत नशा करने से टी•वी• की बीमारी भी हो गयी थी।दिन में गांव के मंदिर में बैठे रहते हैं। पूजा पाठ करके उनका समय व्यतीत होता है।

       तभी मंटू की आवाज से रिया अपने अतीत से निकलकर आज में वापस आ गई। टिया का विवाह हो गया सब अपने-अपने घर चले गए। रिया जब जा रही थी तो अशर्फी चाचा आये और मंटू को अपनी मुट्ठी में दबी चॉकलेट निकालकर देते हुए भरे गले से बोले-” बेटा क्या दूं तुम्हें, बस समझ सको तो यही कि,अपने मम्मी पापा की हर बात मानना ।” मंटू उनका चेहरा देख रहा था। रिया अशर्फी चाचा के गले से लगकर फफक कर रो पड़ी। वहां खड़े सब की आंखें भर आई थीं। 

   रिया के वापस आने के 6 माह बाद एक फोन कॉल आई की अशर्फी चाचा नहीं रहे। रिया जोर जोर से रोने लगी। अक्षांश ने उसको संभाला।” आज अशर्फी चाचा का प्रायश्चित पूरा हो गया।” रिया रोते रोते बोली।

 लेखिका – उषा भारद्वाज

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