स्वाभिमानी अम्मा जी – गीता वाधवानी

 शिल्पी जब भी बाजार जाती थी, एक बूढी औरत को कुछ ना कुछ सामान बेचते हुए देखी थी। कभी कुछ सब्जियाँ, कभी धनिया मिर्च अदरक लहसुन, कभी कोई फल, कभी  आलू तो कभी टमाटर। उस अम्मा जी की उम्र लगभग 75 या 80 वर्ष की होगी। 

 अम्मा जी रोड की एक साइड में एक कपड़ा बिछाकर बैठ जाती थी और अपना सामान भी वही रख लेती थी। उम्र अधिक होने के कारण उनकी कमर भी झुक गई थी।

 आज शिल्पी ने देखा कि वह चटनी और इडली बेच रही थी। शिल्पी उनके पास गई और उनसे बोली-” अम्मा जी, आज आप सब्जी लेकर नहीं आई? ” 

 अम्मा जी -” नहीं बेटी, सुबह बारिश हो रही थी तो मैं सब्जी लेने जा नहीं सकी, तो इसीलिए आज इडली और चटनी बनाकर ले आई, क्या तुम खाओगी? ” 

 शिल्पी ने कहा-” हां दो इडली दे दीजिए। ” 

 सचमुच इडली बहुत ही स्वादिष्ट थी और चटनी भी बढ़िया थी। उसने पैसे पूछे तो अम्मा जी ने कहा “₹20” 

 अम्मा जी की सारी इडलियां, थोड़ी देर में ही खत्म हो गई थी। 

 अगले दिन शिल्पी बाजार आई,तो अम्मा जी आज संतरे लेकर आई थीं। आज शिल्पी ने सोचा था कि अम्मा जी से कुछ बात करूंगी। 

 शिल्पी अम्मा जी के पास गई और कहने लगी-” अम्मा जी इस उम्र में भी आप इतनी मेहनत क्यों करती हो? क्या आपके बच्चों का व्यवहार ठीक नहीं है, क्या वह आपको पूछते नहीं है? ” 

 अम्मा जी चुप थी। उनकी आंखों में आंसू थे और वह कुछ बोल नहीं रही थी। उनकी आंखों में आंसू देख कर शिल्पी ने कहा -” माफ कीजिए अम्मा जी मैंने आपके दिल को दुखा दिया।” 

 तब अम्मा जी ने कहा-” नहीं बेटी, इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है, जब किस्मत ही खराब हो तो कोई क्या कर सकता है। ” 

 शिल्पी -” आप ऐसा क्यों कह रही हैं? ” 

 तभी अम्मा जी के पास एक आदमी आया और उसने सारे संतरे सही दामों में खरीद लिए। अम्मा जी घर जाने को तैयार थी। शिल्पी ने कहा -“चलो अम्मा जी, मैं आपके घर तक छोड़ देती  हूं। ” शिल्पी ने रिक्शा  करके अम्मा जी को बिठाया और खुद भी बैठ गई। अम्मा जी का घर ज्यादा दूर नहीं था। 

 अम्मा जी को रिक्शा से उतर कर वह अपने घर जाने लगी, तब अम्मा जी ने कहा -” आओ बेटी, अंदर तो आओ। ” 

 शिल्पी ने रिक्शे वाले को पैसे दिए और अम्मा जी के घर में आ गई। घर क्या था, छोटी सी झोपड़ी थी। 

 छोटा घर परंतु एकदम साफ सुथरा। 

 छोटे सिलेंडर के साथ छोटा चूल्हा। एक तरफ साफ सुथरी खटिया और एक छोटी मेज और कुर्सी। एक पुराने जमाने वाली लोहे की अटैची और उस पर   साफ सुथरा कवर। 

 अम्मा जी ने कहा -” बैठो बेटी, मैं अभी चाय बनाती हूं। ” 

 शिल्पी -” नहीं नहीं अम्मा जी, मुझे चाय नहीं चाहिए, आप बस पानी पिला दीजिए। ” 

 अम्मा जी ने ₹5 वाला बिस्कुट का एक पैकेट खोला और साथ में पानी शिल्पी को दिया। 

 फिर अम्मा जी ने एक पॉलिथीन निकाली। उसमें से अम्मा जी ने कुछ तस्वीर निकाल कर शिल्पी के हाथ में पकड़ाई। देखो बेटी, एक फोटो हाथ में लेकर उन्होंने कहा यह मेरा बड़ा बेटा है अतुल, और यह छोटा बेटा नवीन, और यह फोटो मेरे पति की है। जब मेरे दोनों बेटे छोटे थे तब मेरे पति का देहांत हो गया था। मैंने दोनों बच्चों को पढ़ाया लिखाया और काबिल बनाया। अतुल की बहुत अच्छी नौकरी लग गई थी और नवीन कॉलेज में था। 

 मेरे दोनों बच्चे बहुत ही अच्छे थे और मेरा बहुत आदर करते थे। एक दिन ऑफिस से आते समय अतुल का एक्सीडेंट हो गया और वह हमें छोड़कर चला गया। उस समय हमारे ऊपर दुख का वज्रपात हो गया था। मेरा छोटा बेटा नवीन अपने बड़े भाई के जाने से बिल्कुल टूट गया था। उसकी पढ़ाई में भी मन नहीं लग रहा था। मैंने बहुत मुश्किल से खुद को संभाला था क्योंकि मुझे अपने बेटे नवीन की चिंता थी और मुझे उसे भी संभालना था। मुश्किल घड़ी में हमारा किसी ने साथ नहीं दिया था और मैं भी किसी से मदद की भीख नहीं मांगना चाहती थी क्योंकि स्वाभिमान मेरा भी है। मैंने खुद को दुख से बाहर निकाला और नवीन को भी। 

 उसने पढ़ाई पूरी कर ली थी और वह जॉब ढूंढ रहा था। मैं ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी इसीलिए मैं शुरू से ही छोटे-मोटे काम करके बच्चों को पाल रही थी। अब नवीन जल्द से जल्द नौकरी पाना चाहता था और मुझे आराम देना चाहता था। बहुत कोशिश करने पर भी उसे नौकरी नहीं मिली।

 एक अच्छी कंपनी में नौकरी पाने के लिए, मेरे बेटे नवीन को किसी व्यक्ति ने लालच दिया और कहा कि अगर तुम मुझे ₹100000 दोगे, तो मैं तुम्हें नौकरी दिलवा दूंगा मैं नवीन से कहा कि यह बिल्कुल गलत है। तुम किसी को रिश्वत मत देना और वैसे भी मेरे पास ₹100000 नहीं है। 

 नवीन बहुत परेशान था। उसने मुझे बिना बताए चुपचाप, अपने पापा की सोने की चेन ₹100000 में बेच दी। उसने सोचा था कि जब नौकरी मिल जाएगी तो मैं सोने की चेन लाकर मां को दे दूंगा। लेकिन उस व्यक्ति ने नवीन को धोखा दिया और पैसे लेकर भाग गया। मेरा भोला बच्चा यह सहन नहीं कर पाया और उसने सोचा कि मैं अपनी मां से कैसे आंख मिलाऊंगा। और उसने चिट्ठी लिखकर खुद को समाप्त कर लिया। उसने यह भी नहीं सोचा कि मेरी मां अकेली कैसे रहेगी। ” 

 यह सब कुछ बात कर अम्मा की रोने लगी। बेटी मेरे बच्चे ऐसे नहीं थे कि अपनी मां को ना पूछें। लेकिन वह तो है ही नहीं। 

 अम्मा जी को दुखी देखकर शिल्पी भी रोने लगी थी। उसने अम्मा जी से माफी मांगी और उनसे कहा-” अम्मा जी अगर आप चाहे तो आप मेरे साथ रह सकती हैं, मुझे भी बड़ों का आशीर्वाद मिलेगा। या फिर आप चाहे तो मैं आपके लिए  किसी वृद्ध आश्रम में भी इंतजाम करवा सकती हूं। ” 

 अम्मा जी -” बेटी तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया कि तुमने मेरे बारे में इतना सोचा, मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती और ना ही मैं वृद्ध आश्रम जाना चाहती हूं, जब तक मेरे हाथ पांव चल रहे हैं मैं खुद कमाऊंगी और खुद खाऊंगी। मैं किसी पर आश्रित होना नहीं चाहती। मैं जानती हूं वृद्ध आश्रम में मुझे आराम मिलेगा, लेकिन मैं फिर भी वहां नहीं जाना चाहती। मैं जब तक जीऊंगी,स्वाभिमान के साथ जीऊंगी, किसी की दया पर नहीं और ना ही किसी के सामने हाथ फैला कर क्योंकि स्वाभिमान मेरा भी है। ” 

 इतने दुख सहने के बाद भी, शिल्पी उनका साहस देखकर हैरान थी और उसने तय कर लिया था कि वह रोज अम्मा जी से कुछ ना कुछ सामान जरूर खरीदेगी, ताकि उनकी कुछ मदद हो सके और वह अपने पड़ोसियों से भी अम्मा जी से सामान लेने को कहेगी। 

 अप्रकाशित स्वरचित गीता वाधवानी दिल्ली 

साप्ताहिक प्रतियोगिता विषय #स्वाभिमान मेरा भी है

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