कर्ज – एम. पी. सिंह

रामू की चाय की टपरी कॉलेज के बाहर ही थीं. सामने एक स्कूल भी था. रामू के गुजर जाने के बाद उसकी पत्नि कान्ता ने उस चाय की टपरी क़ो संभाल लिया. कान्ता की बेटी कुन्ती बहुत छोटी थीं और उसकी जिम्मेदारियाँ बड़ी. हर रोज़ की तरह कान्ता टपरी पर चाय भजिया बनाने में व्यस्त थीं कि उसने किसी बच्चे की रोने की आवाज़ सुनी. नज़र उठा कर देखा

तो एक 8-9 साल का लड़का फुटपाथ पर बैठा रो रहा था. कान्ता ने पूछा, क्या हुआ, कुछ खायेगा, भूख लगी है क्या? वो रोते रोते बोला, बापू ने 20₹ देकर दाल चावल लेने भेजा था, पैसे रास्ते में कहीं गिर गये, खाली हाथ घर जाउगा तो मेरा बाप मुझे बहुत मारेगा. कान्ता ने पूछा, तेरा घर कहाँ है?

वो बोला, स्कूल के पीछे वाली बस्ती में. न जाने कान्ता क़ो उस लडके पर क्यों तरस आ गया और उसे 20 ₹ देते हुए बोली, जा दाल चावल ले आ और वापसी में मिल कर जाना. वो लड़का पैसे लेकर भागता हुआ गया और दाल चावल लेकर आ गया. कान्ता क़ो तसल्ली हों गई कि उसके पैसे ब्यर्थ नहीं गये तो उसे जाने क़ो बोल दिया.

उस दिन के बाद से वो लड़का जब स्कूल से छूटता, कान्ता कई दुकान से होकर गुजरता और नमस्ते आंटी बोलता हुआ चला जाता और कोई बात नहीं करता. एक दिन कान्ता थोड़ा फुर्सत में थीं कि वो लड़का वहाँ से जा रहा था और नमस्ते आंटी बोला तो कान्ता ने उसे रोक लिया और नाम पूछा, वो बोला राहुल. कुछ खायेगा? वो बोला, नहीं, और चला गया.

ये सिलसिला कुछ सालो तक यू ही चलता रहा. फिर एक दिन वो कान्ता कि टपरी पर आया, कुछ उदास था, पूछने पर बोला, मेरा स्कूल पूरा हों गया है, अब में नहीं आऊंगा. ठीक है, कान्ता ने बोला और वो चला गया.

  कुछ साल और बीत गये, अब कान्ता भी बीमार रहने लगी, अगर कभी वो टपरी पर नहीं जा पाती तो उसकी बेटी कुन्ती आ जाती. एक दिन अचानक राहुल टपरी पर आया और देखा की कान्ता की जगह एक लड़की चाय बना रही थीं. पूछने पर बोली मेरी माँ की तबीयत खराब है, आजकल वो नहीं आती. 

 राहुल ने ऑन्टी और उसके बारे मैं पूछा तो पता चला की उसका नाम कुन्ती है और उसकी माँ क़ो टी बी हों गई है और घर पर ही है. राहुल ने पूछा की हॉस्पिटल क्यों नहीं ले गये. कुन्ती बोली, इतने पैसे नहीं है की हॉस्पिटल मैं भर्ती करवा सके. राहुल ने उसके पर का पता लिया और बोला, मैं आंटी क़ो लेकर जे. के. हॉस्पिटल ले कर जा रहा हूँ,

तुम शाम क़ो हॉस्पिटल आ जाना, इतना बोलकर राहुल चला गया. थोड़ी देर बाद एम्बुलेंस लेकर कान्ता के घर गया, कान्ता के लाख मना करने पर भी उसे अपने साथ लेकर हॉस्पिटल मैं भर्ती करवा दिया. राहुल ने बताया की मैं यहाँ काम करता हूँ और यहाँ मेरे माँ पिताजी का इलाज मुफ्त मैं होगा. शाम तक कुन्ती भी वहाँ आ गई.

दिन मैं राहुल नौकरी पर होता और कान्ता क़ो भी देख लेता और शाम क़ो कुन्ती टपरी बन्द करके हॉस्पिटल आ जाती और रात भर माँ के साथ रहती. कई दिनों तक इलाज चला और ठीक होने पर छुट्टी दे दी, राहुल कान्ता क़ो एम्बुलेंस से घर छोड़ आया. कान्ता  राहुल क़ो बहुत दुआएँ दे रही थीं

तो राहुल बोला, मुझे अपनी माँ का चेहरा तो याद नहीं पर जिस दिन आपने मुझे रोते हुए देखकर 20₹ दिये थे, उसदिन आपमें मुझे अपनी माँ नज़र आई. आज मैं इस काबिल हों गया हूँ की अपनी माँ के लिए कुछ कर सकूँ. कुछ दिन आराम करने के बाद कान्ता ने फिर से चाय की टपरी संभाल ली और कुन्ती अपनी पढ़ाई मैं लग गई.

कान्ता ने एक अनजान रोते हुए बच्चे क़ो पैसे देकर जरा सी मदद की थीं. बरसों बाद उसी अनजान  लडके ने उसका  इलाज करवाकर अपना कर्ज उतारने का प्रयास किया.

हम दूसरों के लिए जो कुछ भी करते है वहीं लौटकर हमारे पास आता है, यही कर्मा है.

लेखक 

एम. पी. सिंह, कोटा 

स्वचित, अप्रकाशित

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