बुढ़ापा – खुशी

आज घर में पकवानों की खुशबू बिखरी हुई थी।गुजिया, भल्ले,पूरी छोले तरह तरह की मिठाई और भी जाने क्या क्या। रामप्रसाद जी ने अपनी पत्नी सुनीता को उठाते हुए कहा अरे सुनीता जी आज क्या है घर में पकवानों की खुशबू उड़ रही है।पता नहीं जी अभी सुशीला आएगी तो बताएगी।

कब आएगी सुशीला आज तो चाय भी नहीं मिली सुबह से हा जी आपने दवाई भी तो खानी है।दस बज गए सुशीला कहा रह गई तभी दौड़ती हुई सुशीला आई बोली अम्मा जी ये लो चाय नाश्ता आज देर हो गई फिर आ भी ना पाऊ । रामप्रसाद ने पूछा आज है क्या अरे आपको नहीं पता आज कॉलोनी  की होली पार्टी है अपने घर में अच्छा ।

चलो मै जाती हूं दिन का खाना लेकर आऊंगी देर हो जाए शायद ये बिस्कुट और मट्ठी भाभी से छुपा कर लाई हूं।सुशीला चली गई चाय के साथ रस थे। सुनीता बोली हर साल हम भी करते थे पूरा मोहल्ले को बुलाते थे । हा अपना लॉन कितना बड़ा भी तो है हा तुम्हारे हाथ के भल्ले और गुजिया का जवाब ही नहीं।शांति कितना काम कराती थी

मेरे साथ बिल्कुल सुशीला अपनी मां शांति जैसी है।हा जी क्या ठाठ थे आपके जब इस जुड़े में गुलाब लगाती थी।लाल गुलाबी पीली में साड़ी में क्या सुंदर लगती थी।हर रंग ही तुम पर सजता था। आप भी ना आपका रूबाब कम था क्या जब फैक्ट्री जाने के लिए तैयार होते थे

तो हर कोई आपको ही देखता था सही कह रही हो।अभी मैं 65 का और तुम 60 की हो हमने अपनी दुर्गति खुद ही कर ली।मैने रोहन को सब सौंप दिया कि आराम करूंगा घूमेंगे फिरेंगे पर रचना और रोहन ने हमे इस कमरे तक सीमित कर दिया बंद हो गए हैं यहां कैद में सही कह रहे है आप दिन में सब रंग खेल रहे थे खाने पीने का आनंद ले रहे थे

पर बुढ़ा बुढ़िया को किसी ने नहीं पूछा तीन बज गए अब रामप्रसाद की बस हो गई।मेहमान लगभग जा चुके थे वो कमरे से बाहर आए और बोले रोहन रोहन कहा हो । रोहन रंग में और नशे में सरोबार था क्या है पापा क्यों चिल्ला रहे हो क्या चाहिए कमरे में जाओ।खाना चाहिए 3 बज गए तेरी मां को शुगर है

खाना टाइम पर चाहिए।दादू दादू करते हुए रोहन के बच्चे भी आ गए रचना बोली अंदर जाओ।और ससुर साहब आप घर में मेहमान हो तो देर सवेर हो जाती हैं।पैर कब्र में है और जबान का चोचला नहीं जा रहा।सुशीला खाना दे इन्हें और हा मीठा तला मत देना जी भाभी रचना रोहन बच्चे सब अपने कमरों में चले गए।

रामप्रसाद बोले सुशीला जो बना है सब लेकर आ जी मालिक सुशीला खाना दे कर आई फिर चाय भी ले आई और बोली भाभी सो रही हैं शाम में क्या खाना है बता दो मै बना दूंगी।रुक तू कुछ भल्ले और कुछ हल्का जाते हुए दे जाना ।सुशीला बर्तन ले गई और बाहर काम करने लगी।खाना देरी से खाने के कारण सुनीता की तबीयत खराब हो गई। 

Vommits और लूज मोशन शाम को जब रोहन उठा तो रामप्रसाद ने उसे बताया कि चल डॉक्टर के पास।पापा आज तो डॉक्टर बंद होता है क्यों इमरजेंसी तो चलती होगी।रचना बोली कुछ नहीं चलता सुबह बोला था मैने अपनी जबान काबू में रखो पर खाने को देख तो भूखे हो जाते है।जैसे कभी मिला ही ना हो।

सुनीता बाहर आई बोली बहु कैसे बात कर रही हो तुम्हारे ससुर है भूल गई क्या।लो मुझसे लड़ने आ गई अभी तो मर रही थी।रोहन अपनी पत्नी को चुप करा वो तेरी मां को मरने की दुआएं दे रही है।आप दोनों ने परेशान कर दिया है मै आपको वृद्ध आश्रम में छोड़ आऊंगा।

रचना बोली चलो रोहन हमे देर हो रही हैं।सुशीला सारा काम खत्म हो गया तो सारा खाना तू लेकर नौकरों में बाट दे। और इन्हें कुछ नहीं देना दिन में बहुत ठूंसा है इन्होंने जी दीदी।सुशीला अंदर आई बोली अम्मा जी क्या हुआ।रामप्रसाद बोले इसकी तबियत खराब है रुको मैं दवा का देती हूं।

सुशीला ने नौकर भेज दवा मंगवाई ।खिचड़ी बना कर खिलाई बर्तन धो कर रख दवाई खिला कर उसने रामप्रसाद और सुनीता को सोने का कह वह बाहर आ गई।पर दोनों की आंखों में नींद नहीं थी।सुनीता बोली सुनिये जी बुढ़ापा सबको आता है ना।ह्म्म्म क्यों पूछ रही हो नहीं रोहन रचना हमारे साथ ऐसा व्यहवार करते हैं

इसलिए पूछा मैने अब तो लगता है हम क्यों जी रहे हैं।कभी किसी ने आपसे या मुझसे इस लहजे में बात नहीं की पर आज जो व्यहवार हमारे साथ हुआ वो नाकाबिले बर्दाश्त है।थोड़ी देर में दवाई के कारण सुनीता सो गई पर रामप्रसाद जी की आंखों में नींद नहीं थी वो रात भर टहलते रहे फिर कुछ सोच वो भी सोने चले गए।

अगले दिन सुबह वो जल्दी उठे नहा धो कर सुनीता को बोल वो बाहर चले गए अपने दोस्त शैलेन्द्र के पास जो वकील थे उन्हें उन्होंने सारी बात बताई और पूछा कि अपना बिजनेस और घर वापस लेने का कोई तरीका है क्या।रोहन और रचना का व्यवहार बहुत खराब है और मेरे होते हुए सुनीता का अपमान मै बर्दाश्त नहीं कर सकता मैं तिल तिल मर रहा हूं।

तू  परेशान नहीं हो मै देखता हूं कि क्या हो सकता हैं।शैलेन्द्र ने अपने दोस्तों से भी मशवरा किया और रोहन को एक लेटर भेजा कोर्ट की तरफ से की  रामप्रसाद अपना घर और बिजनेस से रोहन को बेदखल कर रहे हैं और 15 दिन में घर खाली करने का।

रोहन भागता हुआ घर आया और बोला पापा पापा क्या बात है रचना बाहर आई देखो इन लोगों ने मुझे नोटिस भेजा है कि ये घर और ऑफिस 15 दिन में खाली करना है।क्या ये घर और ऑफिस तो रोहन का है ये कौन होते है? बहु ये ऑफिस घर सब मेहनत का है और ये घर सुनीता का है अगर मैं सब तुम्हारे नाम कर सकता हूं तो वापस ले भी सकता हूं।

नोटिस पढ़ लिया है ना अब तैयारी पकड़ों।कल से ऑफिस में खुद आऊंगा।शाम को मैनेजर को बुला उन्होंने ऑफिस की तमाम जानकारी ली और बोला कि कल से मैं ऑफिस आऊंगा आज का खाना सुशीला सुनीता की पसंद से बनेगा।और सुशीला कल से सिर्फ तुम हमारा काम करना और किसी का नहीं।

15 दिन में रोहन और रचना की एहसास हो गया कि उन्होंने कितना गलत किया है वो अपने मां बाप से माफी मांगने लगा ।पापा बच्चों का ख्याल करो हम कहा जाएंगे।तुमने अपने माता पिता का ख्याल किया था इतना जलील किया जो मां तुम्हारे बिना एक पल नहीं रहती थी

तुम्हारी बीमारी में डॉक्टर हॉस्पिटल एक करती उसकी तकलीफ ड्रामा बूढ़ा बुढ़िया की जबान के चोंचले अब तुमसे हमे कुछ नहीं चाहिए समझे हमारा घर खाली करो।15 दिन बाद शैलेंद्र के सामने ही सब निकलने लगे ।रचना बार बार कह रही थी कि मेरे बच्चों का क्या होगा बाहर निकलते निकलते रामप्रसाद बोले सुनो तुम्हारे लिए तो हम बोझ थे

पर तुम्हारी मां तो तुम्हे छोड़ नहीं सकती ना तुम्हारे लिए नहीं इन बच्चों के लिए ये फ्लैट की चाबी है और तुम चाहो तो ऑफिस में नौकरी कर सकती हो सिर्फ नौकरी मालिकगिरि नहीं ।बहु बुढ़ापा सबको आता है अपना आज सुधारो अपने बच्चो के लिए मिसाल बनो ना कि कल को तुम्हारा बुढ़ापा खराब हो एक नई वसीयत बनाई गई

जिसमें सब कुछ बच्चों के नाम कर दिया गया।शाम को रामप्रसाद जी घर आए लॉन में सुनीता जी ने चाय लगवाई आज तो बहुत सुंदर लग रही हो जैसे मुझे अच्छी लगती हो।सब आपकी वजह से वरना मेरी और आपकी हैसियत नौकरों जैसी थी।सुनो जी रोहन कैसा है, ठीक है मिलना चाहती हो।

जी कल चलेंगे बच्चों के लिए सामान ले ले।बच्चों के लिए फल मिठाई चॉकलेट चिप्स खिलौने बहुत कुछ लिया और वो रोहन के यहां पहुंच गए।रोहन और रचना उन्हें देख खुश हुए पर घर की हालत ठीक नहीं थी सुनीता जी की पारखी नज़रों ने सब भाप लिया।

घर आई तो वो चुप चुप थी रामप्रसाद जी उनकी परेशानी भाप गए थे।अगले दिन कुछ फैसला कर वो निकले और शाम को बच्चों और रोहन रचना को घर ले आए।सुनीता कहा हो अम्माजी अंदर है आज सुबह से कुछ नहीं खाया सुशीला बोली।सुशीला तू अच्छा खाना बना मै लाता हूं तेरी अम्माजी को  मै लाता हूं।

सुनीता उठो चलो चाय पिए।सुनीता बाहर आई बच्चों को देख वो खुश हुई ये यहां ? अरे मेरी भोली तेरी बात मै बिना कहे ही समझ जाता हूं । समझी।बेटा ये घर तुम्हारा है पर याद  रखना मां बाप अपनी एक एक इच्छा मार अपने बच्चों के लिए सब खड़ा करते हैं और बच्चों को सब पका पकाया मिलता है तो वो उनकी इज्ज़त और कीमत भूल जाते है।

तुम यहां रहो पर यदि तुमने पहले जैसी कोई हिमाकत की तो अंजाम के लिए तैयार रहना।समझे ।मां पिताजी हमे माफ कर दीजिए आगे से कभी आपको कोई शिकायत का मौका नहीं मिलेगा रचना बोली।बोझिल माहोल को कम करने के लिए सुनीता बोली चलो खाना खाए भूख लगी है बच्चों आ जाओ।

सब खुशी खुशी खाना खाने लगे।रोहन रचना ये सोच रहे थे हमने गलत किया फिर भी हमे मां पापा ने अपनाया ।सुनीता अपनी किस्मत पर रश्क कर रही थी कि मुझे ऐसा जीवनसाथी मिला।रामप्रसाद सोच रहे थे कि हे ईश्वर अपनी अनुकंपा बनाए रखना इस परिवार को एक सूत्र में बांधे रखना।

स्वरचित कहानी 

आपकी सखी 

खुशी 

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