बुढ़ापे का अकेलापन – अमिता कुचया

आज जज साहब अनोखा केस पढ़कर अपने केबिन में बाप बेटे को बुलाते है….

गोपाल लाल जी और उनका बेटा सुरेश जज के पास दलील दे रहे थे। तभी वो दोनों से पूछते है आप लोग एकदूसरे को जानते है? तो हां… सुरेश बोलता है मेरे बाबू जी… और गोपाल लाल जी भी कहते ये मेरा बेटा है…

अच्छा आप दोनों की मानसिक स्थिति सही है।तब वे कहते मात्र दो हज़ार रुपये के लिए आपने अपने बेटे पर केस किया है ये आपने नहीं सोचा कि जगहंसाई होगी समाज क्या सोचेगा जब अदालत में पेशी होगी।

इतनी छोटी रकम के लिए कोई बाप अपने बेटे पर केस कर सकता है?अभी तक जायदाद के लिए बेटा कानूनी हक मांगने के लिए केस करता था…..

तब गोपाल जी अड़कर कहते -मेरा बेटा एक महीने में दो हजार रुपये भी नहीं देता है … मैं चाहता हूं महीने में दो बार एक एक हजार रुपए दे।

तब गोपाल लाल जी से जज ने कहा -आपको तो पेंशन मिलती है। तो फिर आपको दो हजार रुपये की क्या जरूरत ?तब बेटा सुरेश बोला- इन्हें पच्चीस हजार मिलते है। नौकर है …फ्लैट है और पेंशन भी …और क्या चाहिए….इतना तो काफी अकेले के लिये ये तो सरासर जिद है मुझे बस ये परेशान करना चाहते है और कुछ नहीं…इतना सुनकर वे बोले – मैंने जो भी जमा पूंजी इस पर खर्च कर दी वो मुझे वापस चाहिए। चाहे जो हो जाए मुझे चाहिए तो चाहिए….

तब सुरेश बोला -अच्छी जबरदस्ती है, आपके पास पर्याप्त पैसा है ,तो मुझसे क्यों ही लेना…

मैं तुम्हें ऐसे ही थोड़े ही छोड़ दूंगा… वो बोलने लगे

 तब जज साहब कहते- आपका बेटा सही तो कह रहा है…

आपकी पेंशन तो है….

 तो उन्होंने कहा -जब मैंने अपने फर्ज निभाए तो ये अपने फर्ज निभाए अगर नहीं निभा सकता तो मेरे समय के जो बचपन से लेकर बड़े होने तक दियाऔर मैंने जो पैसे खर्च किए उसकी कीमत चुकाए….

वकील असमंजस में होकर बोले ऐसा कौन सा बाप करता है… जो आप कर रहे है ….

वो आंखों में भरे आंसुओ को पोंछते हुए बोले इससे पूछों कि ये हमारे साथ क्यों नहीं रहता, ये अलग क्यों रहता है? मैं पांच साल से अलग रह रहा हूं इसे देखे बिना पांच वर्ष हो गए,ये क्या मेरे प्रति कोई फर्ज निभा रहा है।

तो वो कहने लगा, क्या मैं नया घर नहीं ले सकता ? इन्होंने मुझे और मेरी पत्नी को परेशान करके रख दिया था।इनकी टोंका.. टांकी , रात दिन की बहस से परेशान होकर मैं अलग हुआ। वहां जाकर रह रहा हूं तो कौन सा गुनाह कर रहा हूं?

वो बोले बुढ़ापा सबका आता है ,जो मेरे साथ कर रहा है वो इसे बुढ़ापे में पता चलेगा। इसे कोई फिक्र है मेरी! कि जिंदा हूं या मर गया। हूं …पांच महीने से नौकर भी नहीं है…

मैं बिल्कुल अकेला पड़ गया हूं।

 तो सुरेश बोला -दूसरा नौकर क्यों नहीं रख लेते…. ज्यादा से ज्पादा आठ से दस हजार लेंगा…

पर तू तो मेरा खून है , तूने तो मुझसे पीछा ही छुड़ा लिया मैं भी तुझे इसी बहाने देखना चाहता था…मेरे फ्लैट के पीछे वाले फ्लैट में शर्मा जी की पिछले महीने डेड बाडी मिली क्योंकि उसके बेटे बहू कोई खैर खबर ना लेते ….इस कारण ऐसा हुआ…. तू मेरी खैर खबर तो लेता नहीं है इसी बहाने तुझे पता तो रहेगा कि जिंदा हूं या मर गया हूं….

अगर कोई इमरजेंसी आ जाए तब तो खड़ा हो मेरे आखिरी वक्त में….

इतना सुनते ही जज साहब की आंखे भर आई…

और उन्होंने सुरेश की तरफ जब देखा तो उसकी आंखे भी शरम से झुक गई। 

तब गोपाल लाल जी बोलते बोलते वे भभक कर रोने लगे….

इतना देखकर जज साहब सुरेश से बोले -देखा कितना अकेलापन खाए जा रहा है तुम्हारे बाबू जी को, और एक तुम हो कि अपना पल्ला ही झाड़ रहे हो …कम से कम खैर पूछने तो मिल सकते थे ,ऐसा भी क्या किनारा कर लिया….

कि तुम पांच सालों से तुम नहीं मिले ही नहीं….

आज ये कितना अकेलापन महसूस कर रहे है समझ रहे हो कि नहीं.. ये सब तुम्हारे साथ होगा तब समझोंगे….सबका बुढ़ापा एक न एक दिन आता ही है।

तब वो भावुकतापूर्ण उनके आंसू पोंछ कर कहने लगा बाबूजी हम से बहुत बड़ी गलती हो गई। माफी के तो लायक नहीं है। फिर भी माफी मांगता है उनके कदमों को पकड़कर रोने लगता है। तब गोपाल लाल जी उठाकर गले लगाकर कहते है बेटा तू मेरी जिंदगी में वापस लौट आया ,इससे ज्यादा मुझे कुछ नहीं चाहिए। वो दोनों एक दूसरे के साथ वापस लौटते है जो अलग अलग आए थे। आज वे दोनों साथ लौटे तो जज साहब ने चैन की सांस ली। मन ही मन सोचने लगे कि बाप बेटे अब एक हो गए। अब गोपाल लाल जी जितना जीएंगे उतना संतुष्ट तो रहेंगें। कम से कम अकेलापन तो उन्हें महसूस नहीं होगा।

बेटे को सीख मिल जाती कि घर में कितनी ही बड़ी बात क्यों ना जाए पर हम अपने खून के रिश्ते से दूर नहीं हो सकते।

इस तरह बाप बेटे एक साथ रहने लगते है। 

स्वरचित मौलिक रचना

अमिता कुचया✍️

बुढ़ापा सबका आता है साप्ताहिक प्रतियोगिता

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