बुढ़ापा तो सबको आता है!! – संजय सिंह

गोपाल और उमा अपने परिवार का पालन पोषण करते-करते कब अपनी जिंदगी के इस के इस मोड़ पर आ गए हैं कि उन्हें यह तक याद नहीं रहा कि उन्होंने अपना जीवन कभी खुशी से जिया या नहीं ।बस जो किया वह अपने बच्चों की खुशी और तरक्की के लिए ही किया। गोपाल और उमा के दो बेटे थे।

विक्की और बंटी। समय रहते विक्की और बंटी की बड़ी धूमधाम से शादी कर दी गई। उनके आगे भी परिवार हुआ। बड़ा बेटा विक्की अपने परिवार के साथ हंसी-खुशी शहर में बस चुका था। छोटा बेटा बंटी अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ माता-पिता के साथ ही रहता था।

कभी कबार बड़ा बेटा अपने परिवार सहित छुट्टियां मनाने अपने माता-पिता के पास आया करता था। जिस कारण गोपाल और उमा कुछ पल हंसी के जी लेते। परंतु उसमें भी वह अपने बेटों और उनके परिवार के भले के बारे में ही सोचते रहते हैं। समय ने करवट ली और उमा ईश्वर को प्यारी हो गई।

अब  गोपाल उमा के स्वर्गवास के बाद अकेले रह गए थे।  उनके साथ उनका बेटा बंटी अपने परिवार के साथ रहता था। गोपाल जी काफी बूढ़े हो चुके थे ।शरीर से कमजोर, आंखों से कम  दिखता था। कान भी अब सुनना बंद कर चुके थे। बहुत सारी बीमारियों ने उन्हें घेर रखा था।

यूं कह सकते हैं कि वह जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुके थे। बड़ा बेटा जब घर आता तो गोपाल अपने बेटे से छोटी-छोटी मांगे करते। जैसे कोई छोटा बच्चा अपने पिता से कुछ पाने की जिद करता है। कुछ एक मांगे बेटा पूरी कर देता। परंतु बार-बार गोपाल जी के द्वारा   जिद करने पर वह चिढ़ जाता और डांट कर उन्हें चुप कर देता।

इस पर गोपाल जी भी चुपचाप दूसरी तरफ मुंह करके अपने मन को मसोस कर शांत हो जाते और दोबारा अपने बेटे से उसे मांग को पूरा करने का हौसला ना कर पाते ।बस उस समय को याद करते ।जिस समय जब उनके बेटे छोटे होते थे ।तो उनकी एक पुकार पर वह अपना खाना तक छोड़कर उनकी मांगों को पूरा करने के लिए दिन-रात एक कर देते थे।

बस मन मसोस कर चुपचाप रह जाते। यही हाल दूसरे बेटे का था ।कई बार वह अपने बेटे से कहते हैं कि उनको आंखों से दिखाई नहीं देता। इसलिए वह उन्हें डॉक्टर के पास ले जाकर उनकी आंखों का इलाज करवा। परंतु बेटा उनकी बात को अनसुनी कर देता और कहता ।जब समय मिलेगा तब देख लेंगे और चुपचाप अपने काम को निकल जाता ।

गोपाल यही बात अपनी बहू से भी कहते। परंतु बहू एक ही बात कहती ।अपने बेटों से कहिए जब वह कहेंगे तो आपकी आंखों का इलाज करवा देंगे। आज गोपाल को यह महसूस होता है कि वह किस से फरियाद करें ।उनकी पत्नी जब जिंदा थी। तो वह कोई भी बात उनसे कहते तो उनकी पत्नी बेटों से कहकर उस बात को मनवा देती थी।

परंतु आज वह बिल्कुल अकेले हैं। ऐसे लगता है जैसे कोई भी उनका ही संसार में नहीं है। अब तो वह ईश्वर से यही कामना करते हैं कि ईश्वर भी उन्हें अपने पास बुला ले ।ताकि बार-बार उन्हें किसी के सहारे ना रहना पड़े। गोपाल प्रसाद कई बार मन में सोचते कि मेरे बेटे और बहुएं मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रही है ।क्या इनको यह बिल्कुल भी एहसास नहीं होता होगा?

कि उनके पिता किस तकलीफ में है ।परंतु कुछ समय सोच कर फिर से मन में यही विचार करते चलो जो होगा देखा जाएगा। एक दिन ईश्वर उनकी अवश्य सुनेगा और उन्हें इस संसार से अपने पास जरूर बुला लेगा ।परंतु एक बात पक्की है आज मुझे बुढ़ापा आया है। मेरा शरीर कमजोर है। मेरे कानों ने और आंखों ने मेरा साथ छोड़ दिया है।

परंतु यह सिर्फ मेरे साथ ही नहीं हुआ है। एक समय वह भी आएगा ।जिस समय यह मेरे बेटे और बहू में भी इन सब का शिकार होगी। क्योंकि बुढ़ापा तो सबको आता है। जो व्यक्ति किसी के बुढ़ापे की दशा को दुख को अपने दुख के समान जानकर उसका निवारण करता है। ईश्वर भी उसकी भक्ति से प्रसन्न होता है।

परंतु फिर भी मैं मन से दुआ करता हूं कि मेरे परिवार मेरे बच्चों को कभी भी यह दिन ना देखना पड़े ।उनके बच्चे हमेशा उनकी हिफाजत करें और ईश्वर उन्हें उन्नति और अच्छा स्वास्थ्य दे। वह कभी-कभी अपने पुराने यादों में चले जाते हैं और अपने माता-पिता को याद करते हैं कि किस प्रकार उन्होंने अपने माता-पिता की सेवा की थी । कभी भी उनको किसी प्रकार की कमी  नहीं होने दी थी।

परंतु आज का समय कैसा आ चुका है? औलाद जिसको व्यक्ति अपने बुढ़ापे का सहारा मानकर पाल-पोसकर बड़ा करती है। वह औलाद किस प्रकार से उनका निरादर करती है ।यह समय की सबसे बड़ी चोट है ।जो हकीकत बनकर आज मेरे सामने खड़ी है। बस यह सोचते सोचते गोपाल सो जाते हैं।

सुबह होती है। रोजाना की तरह गोपाल उठते हैं। अपना   रोजाना का कार्य करके पूजा पाठ संपन्न करके चुपचाप बैठ जाते हैं। बहु खाना लेकर आती है ।वह खाना खाते हैं और कहते हैं कि मेरे बेटे बंटी को बुलाना। बहु बंटी को बुलाती है ।बंटी पिताजी के पास आकर बैठ जाता है

और कहता है बताइए क्या बात है? मेरे पास समय कम है और मुझे काम पर जाना है। जल्दी से अपनी बात बताइए। गोपाल कहते हैं। आप अपने काम को जाइए। मेरी बातें तो यूं ही होती रहेंगी।आप पहले अपना काम निपटा लीजिए। यह सुनकर बंटी चुपचाप काम के लिए चला जाता है।

बहू अपने काम में लग जाती है और बच्चे स्कूल को चले जाते हैं ।गोपाल चुपचाप एक कोने में बैठ जाते हैं और अपनी पत्नी को याद करते हैं। मन में यह सोचते हैं कि आज मेरा समय आ चुका है । मैं अपने बेटे से अंतिम बार कुछ बात करना चाहता था।

परंतु वह इतना व्यस्त है कि उसके पास मेरी बात जानने या सुनने का भी समय नहीं है। लंबी सांस लेते हैं। छत की तरफ देखकर ईश्वर को याद करते हैं और कहते हैं। बुढ़ापा तो सबको आता है और उसी समय उनके प्राण पखेरू उड़ जाते हैं ।कुछ समय बाद छोटे-छोटे बच्चे स्कूल से वापस आते हैं ।  दादाजी दादाजी करते हैं ।दादा के पास पहुंचते हैं। गोपाल के पास पहुंचते हैं। गोपाल जी को हिलाते हैं।

परंतु वह कुछ नहीं बोल पाते। बच्चे दौड़ते पुकारते माता के पास जाते हैं । दादा चुप है कुछ नहीं बोलते हैं। बहु भागती हुई आती है ।पिताजी पिताजी पुकारती है। परंतु गोपाल बिल्कुल शांत होते हैं ।बहु रोना शुरू कर देती है।  पड़ोसी इकट्ठा हो जाते है। भागते-भागते उनका बेटा बंटी भी पहुंच जाता है।

  देखकर हैरान हो जाता है कि यह क्या हो गया ?सबसे कहता है कि पिताजी कुछ कहना चाहते थे। परंतु कह ना सके क्योंकि मुझे आज बहुत जल्दी थी परंतु उनको मेरे से भी ज्यादा जल्दी थी।

यह मैं समझ ना सका और रोना शुरू कर देता है ।आसपास के पड़ोस के लोग गोपाल के मन की बातों को समझते थे उसके दुख को जानते थे।बेटा और बहू गोपाल का कितना ख्याल रखते थे ?बस एक दूसरे से हल्की आवाज में कहते हैं। बुढ़ापा तो सबको आता है। बुढ़ापा सबको आना है। 

धन्यवाद ।

लेखक: संजय सिंह।

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