रिश्तो के रंग – मधु वशिष्ठ

डोर बेल बजने पर दरवाजा खुला तो सामने मिसेस भसीन को मुस्कुराते हुए खड़ा पाया। उन्हें अंदर आने को कहा तो झट से बोली ,नहीं बहन जी ,आप तो हमारे घर आती नहीं ,मैं भी आपके घर नहीं आऊंगी। अरे भाई ,अगर नहीं आना था तो डोर बैल क्यों बजाई ?मन मन में ही कहते हुए मैंने उन्हें जिद करने का नाटक करते हुए अंदर आने को कहा।

सोफे पर धम्म से बैठते ही बोली, देखो तुम्हारी यह बड़ी बुरी आदत है चाय तो नहीं पियूंगी मैं। हैरान होने की बात नहीं है यह उनका लगभग हर तीसरे दिन का ही हाल था। इसका मतलब चाय तो मुझे बनानी ही है, वैसे भी संस्कारवश यूं भी बनानी ही थी। तभी बोलीं, साथ में कुछ मत रखना मैं नहीं खाऊंगी। मतलब आप सब लोग खुद समझ लें।

नहीं यह कहानी सुनाने का मतलब यह बिल्कुल नहीं कि मैं मेहमाननवाज नहीं हूं, या कि किसी के कभी घर आने से मुझे बहुत तकलीफ होती है। मिसेज भसीन और मेरी बेटी एक ही बस में स्कूल से आती थी। हम दोनों जब बेटी को लेने के लिए खड़े होते थे वहां से ही उनकी और मेरी जान पहचान हुई थी।

अब बच्चों की बस जब तक नहीं आती इतनी देर में ही घर का काम निपटाने का भी समय होता है । वह ना जाने कैसे घर का काम बहुत जल्दी निपटा के कॉलोनी में यूं ही सबके घर में घूमते हुए टाइम पास करती थीं।  पिछली गर्मियों की छुट्टियों में वह जयपुर घूम के आईं और आने के बाद मेरे लिए वहां से आलता और एक जयपुरी साड़ी लेकर आईं थी।

बहुत मना करने के बावजूद भी वह जबरदस्ती मुझे दोनों चीजें उपहार स्वरूप दे गईं थी। यूं भी  पैरों में मैं कभी आलता नहीं लगाती थी और कॉटन की साड़ी मेरे से पहनी भी नहीं जाती थी।

लेकिन उनका दिल रखने के लिए मैंने वे दोनों चीजें ले ली थी और मैं खुद भी इसी उधेड़बुन में लगी थी कि उनके लिए अब मैं कब और क्या खरीद कर दूं? उसके बाद एक दो बार आने के बाद तीसरी बार वह बोलीं बहन जी आपने अभी तक उस आलता और साड़ी के ₹950 नहीं दिए। मैं हैरान थी मैंने तो वह चीजें मंगवाई ही कब थीं?

परंतु पैसे तो खैर देने ही थे ।लेकिन——-। हमेशा के जैसे वह फिर यही कह कर जा रहीं थी आप तो कभी हमारे घर आती ही नहीं हो अब तो मैं आपके घर नहीं आऊंगी। मन में तो मेरे यही होता था कि ना हीं आओ तो बहुत अच्छा?

बच्चों की गर्मियों की छुट्टियां थी और अब वह नानी के घर गए हुए थे। इस कारण मैं भी फ्री होकर मार्केट से कुछ सामान खरीद के आ रही थी। बाई चांस ऑटो उनके घर के बाहर ही खराब हो गया था।

थकान थी या यूं कहो मुझे ख्याल आया कि चलो हमेशा मिसेस भसीन मिलने आने के लिए कहती है एक बार मैं भी उनके घर में देखकर तो आऊं।

दोपहर का समय था मैंने उनकी डोरबेल बजाई तो स्कूल बस में आने वाली पिंकी ने ही दरवाजा खोला। मिसेस भसीन अंदर कमरे में थी। पिंकी मम्मी को बुलाने के लिए गई तो मैं भी उत्सुकता वश या यूं कहो कि यह कहने लीजिए में भी आपके घर आ ही गई, पिंकी के पीछे पीछे गई।

  जैसे ही पिंकी ने मम्मी को मेरे आने की सूचना दी  कि चीनू की मम्मी आई है, मिसेस भसीन पिंकी पर बहुत जोर से चिल्लाई और बोली तू बेवकूफ है क्या ?बाहर के बाहर क्यों नहीं भगा दिया। कह देती मम्मी घर में नहीं है।

अपने घर में तो लोगों से रहा नहीं जाता चले आते हैं यहां चाय पानी पीने। मुझे सामने देख कर वह घबराकर चौंक उठी और मुस्कुराहट लाते हुए बोली आओ बैठो बहन जी?

लेकिन मैं बैठी नहीं। शायद  यह मेरा एक अनोखा अनुभव था लेकिन इस अनुभव के बाद उनका मेरे घर आना छूट जाएगा, अपमान की पीड़ा से ज्यादा शायद यह खुशी का एहसास हो रहा था। रिश्तो के रंग अब वह बखूबी समझ चुकी थी। 

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा

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