असली राजकुमार

रामनारायण जी ने अपने दोनों बेटों, सूरज और मयंक का विवाह कराकर घर में दो सर्वगुण संपन्न बहुओं का प्रवेश कराया था। रितु और कविता, दोनों ही बहुएँ स्वभाव से बहुत ही संस्कारी और घर को बांध कर रखने वाली थीं। देखते ही देखते दो-तीन सालों के भीतर घर का आँगन पोते-पोतियों की किलकारियों से गूँजने लगा।

भरा-पूरा परिवार, व्यापार में बरकत और घर में शांति—रामनारायण जी को लगता था कि भगवान ने उनकी झोली खुशियों से भर दी है। लेकिन जैसे-जैसे समय बीत रहा था, उनके माथे पर एक नई चिंता की लकीरें उभरने लगी थीं।

यह चिंता थी उनकी सबसे छोटी और लाडली बेटी, अनन्या की।

अनन्या अभी बी.ए. अंतिम वर्ष की छात्रा थी। वह पूरे घर की जान थी। सूरज और मयंक अपनी इस इकलौती बहन पर जान छिड़कते थे, और दोनों भाभियाँ तो उसे ननद कम और अपनी सहेली या छोटी बहन ज्यादा मानती थीं। पूरे घर में अनन्या की हंसी किसी जलतरंग की तरह गूंजती थी।

रामनारायण जी अक्सर रात को अपनी पत्नी यशोदा जी के साथ दालान में बैठते, तो उनकी बातचीत घूम-फिर कर अनन्या पर ही आ जाती।

“यशोदा, सूरज और मयंक तो अब अपने-अपने जीवन में सेटल हो गए हैं। बहुएं भी बहुत अच्छी मिल गईं। लेकिन अब मुझे अपनी इस फूल सी बच्ची की फिक्र सताने लगी है,” रामनारायण जी ने एक गहरी सांस लेते हुए कहा। “मेरी अनन्या ने आज तक इस घर में कभी कोई दुःख नहीं देखा। उसके पैर जमीन पर पड़ने से पहले उसके भाई अपनी हथेलियां बिछा देते हैं।

ऐसी नाज़ों से पली बच्ची के लिए मैं राजकुमार-सा वर कहाँ से लाऊँगा? आजकल का जमाना बहुत खराब है, मुझे डर लगता है कि कहीं मेरी बच्ची को कोई ऐसा घर न मिल जाए जहाँ उसकी कद्र न हो।”

यशोदा जी अपने पति की चिंता समझती थीं। उन्होंने मुस्कुराते हुए रामनारायण जी के हाथ पर अपना हाथ रखा और बड़े इत्मीनान से बोलीं, “आप नाहक ही इतनी चिंता करते हैं। हमारी अनन्या के संस्कार इतने अच्छे हैं कि वह जहाँ भी जाएगी, खुशबू ही फैलाएगी। और रही बात राजकुमार की, तो आप देखिएगा, हमारी बेटी जहाँ जाएगी, वहाँ दिलों पर राज करेगी। भगवान ने उसके भाग्य में बहुत सुख लिखा है।”

पत्नी की बातों से रामनारायण जी को उस पल के लिए तो सांत्वना मिल जाती, लेकिन एक पिता का दिल कहाँ इतनी आसानी से मानता है। जैसे ही अनन्या की परीक्षाएँ खत्म हुईं, रामनारायण जी ने अपने रिश्तेदारों और परिचितों में अनन्या के लिए योग्य वर की तलाश शुरू कर दी। उनका बस एक ही पैमाना था—लड़का रईस हो, बहुत बड़े घर का हो, ताकि उनकी बेटी को वहां भी वही ऐशो-आराम मिले जो उसे मायके में मिला है। वे नहीं चाहते थे कि अनन्या को जीवन में कभी भी आर्थिक तंगी या किसी भी प्रकार के अभाव का सामना करना पड़े।

कुछ महीनों की मशक्कत के बाद, उनके एक दूर के रिश्तेदार ने एक बहुत ही अमीर घराने का रिश्ता सुझाया। शहर के सबसे बड़े कपड़ा व्यापारी सेठ दीनदयाल का इकलौता बेटा, कुणाल। कुणाल देखने में भी सुंदर था और पुश्तैनी रईसी उसके चेहरे से झलकती थी। उनका अपना शानदार बंगला था, नौकर-चाकर थे, और कई महंगी गाड़ियां थीं। रामनारायण जी को लगा जैसे उनकी तलाश पूरी हो गई है। यही तो वह राजकुमार था जिसका सपना वे अपनी बेटी के लिए देख रहे थे।

एक दिन रामनारायण जी और उनके दोनों बेटे, कुणाल और उसके परिवार से मिलने उनके बंगले पर गए। घर की चकाचौंध देखकर मयंक और सूरज भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। बैठक में बहुत ही शानदार तरीके से उनका स्वागत किया गया। सेठ दीनदयाल बातों-बातों में अपनी दौलत, अपने रसूख और अपनी विदेश यात्राओं का बखान करते रहे। रामनारायण जी चुपचाप सब सुन रहे थे।

तभी कुणाल कमरे में आया। उसने रामनारायण जी का अभिवादन तो किया, लेकिन उसके लहजे में एक अजीब सा गुरूर था। बातचीत के दौरान कुणाल ने अपने एक नौकर को चाय लाने में हुई दो मिनट की देरी के लिए सबके सामने जिस तरह से जलील किया और भद्दी गालियां दीं, वह रामनारायण जी को भीतर तक चुभ गया। कुणाल की माँ ने जब कुणाल को टोकना चाहा, तो उसने अपनी माँ को भी झिड़क दिया, “मॉम, आप बीच में मत बोलिए, आपको बिजनेस और इन नौकरों से डील करना नहीं आता।”

यह देखकर रामनारायण जी के मन में एक अजीब सी हलचल होने लगी। दौलत और महल तो सामने था, लेकिन उस महल में रहने वाले ‘राजकुमार’ का हृदय पत्थर का था। जिस व्यक्ति के मन में अपने से छोटों के लिए करुणा और अपनी माँ के लिए सम्मान न हो, वह उनकी बेटी का सम्मान क्या करेगा? वहां से लौटते समय कार में एकदम सन्नाटा था। सूरज ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, “पिताजी, घर तो बहुत बड़ा है, लेकिन लड़के का स्वभाव मुझे कुछ ठीक नहीं लगा।”

रामनारायण जी ने गहरी सांस ली और कहा, “सही कह रहे हो बेटा। सोने का पिंजरा चाहे कितना भी खूबसूरत क्यों न हो, वह रहता तो पिंजरा ही है। मुझे अपनी बेटी के लिए महल नहीं, एक अच्छा इंसान चाहिए।” उन्होंने घर पहुँचकर यशोदा जी और अनन्या को सारी बात बताई और साफ कह दिया कि वे यह रिश्ता नहीं करेंगे। अनन्या ने अपने पिता के गले लगकर कहा, “पापा, मुझे आप पर पूरा भरोसा है। आप जो भी फैसला लेंगे, वह मेरे लिए सबसे अच्छा होगा।”

समय बीतता गया। कई रिश्ते आए, लेकिन रामनारायण जी अब सिर्फ बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि लड़के का चरित्र और उसका परिवार का माहौल देखने लगे थे। इसी दौरान, उनके एक पुराने मित्र ने एक रिश्ता भेजा। लड़के का नाम सिद्धार्थ था। सिद्धार्थ के पिता का देहांत बहुत पहले हो चुका था और उसकी माँ ने सिलाई-कढ़ाई करके उसे पढ़ाया-लिखाया था। आज सिद्धार्थ एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के पद पर काम कर रहा था। उनका एक छोटा सा, अपना फ्लैट था। धन-दौलत के मामले में वे सेठ दीनदयाल के आगे कहीं नहीं ठहरते थे, लेकिन मित्र ने सिद्धार्थ के संस्कारों की बहुत तारीफ की थी।

रामनारायण जी इस बार अकेले ही सिद्धार्थ से मिलने उसके ऑफिस के पास एक कॉफी शॉप में गए। सिद्धार्थ समय से पहले ही वहां मौजूद था। उसने बहुत ही शालीनता से रामनारायण जी के चरण स्पर्श किए। बातचीत के दौरान सिद्धार्थ ने अपनी माँ के संघर्षों के बारे में बहुत ही गर्व से बताया। उसने कहा, “अंकल जी, मेरे पास कोई बहुत बड़ी पुश्तैनी जायदाद तो नहीं है, लेकिन मैंने अपनी माँ से मेहनत करना और रिश्तों की कद्र करना सीखा है। मेरी होने वाली पत्नी मेरे लिए सिर्फ एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि मेरी जीवनसंगिनी और मेरी बराबर की साझीदार होगी।”

जब वेटर कॉफी लेकर आया और गलती से कॉफी की कुछ बूंदें टेबल पर गिर गईं, तो सिद्धार्थ ने न सिर्फ वेटर से प्यार से बात की, बल्कि खुद टिश्यू पेपर उठाकर टेबल साफ करने लगा। यह छोटी सी बात रामनारायण जी के दिल को छू गई। उन्हें कुणाल का वह घमंडी चेहरा याद आ गया। सिद्धार्थ की आँखों में जो सच्चाई और विनम्रता थी, उसने रामनारायण जी का दिल जीत लिया।

उन्होंने घर आकर जब सिद्धार्थ के बारे में बताया, तो परिवार में मिली-जुली प्रतिक्रिया हुई। बहुओं ने कहा, “पिताजी, लड़का अच्छा है, लेकिन अनन्या ने कभी कोई काम नहीं किया। क्या वह एक मध्यमवर्गीय परिवार में एडजस्ट कर पाएगी?” सूरज ने भी कहा कि बहन को शायद सुख-सुविधाओं की कमी खले।

तब अनन्या ने बहुत ही समझदारी से जवाब दिया, “भैया, सुविधाएँ तो इंसान अपनी मेहनत से भी बना सकता है, लेकिन किसी का स्वभाव नहीं बदल सकता। मुझे वो महल नहीं चाहिए जहाँ मुझे घुट-घुट कर जीना पड़े। मुझे वो छोटा घर मंजूर है जहाँ मेरे विचारों की कद्र हो और मुझे सम्मान मिले।”

यशोदा जी ने भी अपनी बेटी का समर्थन किया और कहा, “हमारा दामाद वही बनेगा जो हमारी बेटी को पलकों पर बिठाकर रखेगा, पैसों के ढेर पर नहीं।”

रामनारायण जी ने सिद्धार्थ और अनन्या की मुलाकात करवाई। दोनों ने एक-दूसरे को समझा और विवाह के लिए अपनी सहमति दे दी। विवाह बहुत ही सादगी लेकिन पूरे सम्मान और खुशी के साथ संपन्न हुआ। अनन्या की विदाई के समय रामनारायण जी बहुत रोए। उन्हें अपनी फूल सी बच्ची को एक अनजान आंगन में भेजते हुए डर लग रहा था, लेकिन सिद्धार्थ की उन आश्वस्त करने वाली आँखों ने उन्हें ढांढस बंधाया।

विवाह को तीन साल बीत गए। इस दौरान सिद्धार्थ ने अपनी मेहनत और लगन से अपनी कंपनी में बहुत तरक्की की। उसने अपनी माँ और अनन्या के लिए शहर के एक अच्छे इलाके में एक बड़ा और सुंदर फ्लैट भी खरीद लिया था। लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि उस घर में अनन्या सच में एक रानी की तरह रह रही थी। सिद्धार्थ न केवल घर के कामों में अनन्या का हाथ बंटाता था, बल्कि उसके हर फैसले का सम्मान भी करता था। अनन्या ने भी अपनी सास को सगी माँ से बढ़कर प्यार दिया, जिससे उस छोटे से घर में स्वर्ग सा माहौल बन गया था।

एक दिन रामनारायण जी अपनी पत्नी के साथ अनन्या के नए घर उससे मिलने गए। उन्होंने देखा कि सिद्धार्थ रसोई में चाय बना रहा है और अनन्या अपनी सास के साथ बैठकर हंस-हंस कर बातें कर रही है। घर में महंगी सजावट भले ही न हो, लेकिन जो सुकून और प्यार वहां हवा में तैर रहा था, वह किसी भी महल की चकाचौंध से ज्यादा कीमती था।

सिद्धार्थ ने चाय की ट्रे लाते हुए कहा, “लीजिए बाबूजी, आपके दामाद के हाथ की स्पेशल चाय।”

रामनारायण जी की आँखें खुशी से छलक उठीं। उन्होंने सिद्धार्थ के सिर पर हाथ फेरा और फिर मुड़कर अपनी पत्नी यशोदा की ओर देखा। यशोदा जी मुस्कुरा रही थीं, जैसे कह रही हों—’कहा था न मैंने, हमारी बेटी राज करेगी।’

रामनारायण जी को उस दिन समझ में आ गया कि असली ‘राजकुमार’ वो नहीं होता जो सोने के रथ पर सवार होकर आता है और जिसे अपनी दौलत का अहंकार होता है। असली राजकुमार तो वो होता है जिसके हृदय में प्रेम हो, जो अपनी पत्नी को सम्मान का ताज पहनाए और जो एक छोटे से घर को भी अपने व्यवहार से महलों से ज्यादा खूबसूरत बना दे। आज उनका दिल पूरी तरह से शांत था, क्योंकि उनकी फूल सी बच्ची सचमुच किसी रानी से कम नहीं लग रही थी और उसका राजकुमार उसके साथ, कदम से कदम मिलाकर खड़ा था।


क्या आपने भी कभी अपने आस-पास देखा है कि पैसों से ज्यादा रिश्तों में सम्मान और प्रेम की अहमियत होती है? क्या रामनारायण जी का फैसला सही था? अपने विचार हमारे साथ जरूर साझा करें।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।

error: Content is protected !!