गरीबी का रंग – शुभ्रा बैनर्जी 

“अरे रहने दे बेटा,तेरी छोटी बुआ को बुलाने से कोई फायदा नहीं।नहीं आएगी इस बार भी।मुंह फुलाए बैठी रहेगी अपने घर,और यही सोचती रहेगी कि मैं क्यों नहीं गया उसे बुलाने।

कितने साल हो गए उसे,यहां आए।बाकी तीनों जिज्जी हर त्योहार में सपरिवार आ जाती हैं एक बार बुलाने से।बस तेरी छोटी बुआ ही नहीं आती कभी।

पति का व्यापार बहुत अच्छा चल रहा होगा,तभी घमंड हो गया है उसे।पहले तो नहीं थी ऐसी।हर तीज-त्योहार में दौड़कर आ जाती थी,और घुस जाती थी रसोई में।मिनटों में सौ लोगों का खाना बना देती थी।और अब देखो।रहने दें पिंकी,मत फोन करना उसे।” 

अभिनव की  शादी की पच्चीसवीं सालगिरह होली पर पड़ रही थी।बड़ी भव्य पार्टी का आयोजन होना था।सभी रिश्तेदारों को फोन पर निमंत्रण दिया जा रहा था।तभी बेटी (पिंकी)ने जब छोटी बुआ को बुलाने की बात कही तो, अभिनव दुखी हो गया।

पिंकी ने भी बहुत कम ही छोटी बुआ को देखा है किसी फंक्शन में।हां राखी वाले दिन एक लिफ़ाफे में राखी और इंक्यावन रुपये हर साल आते थे उनकी तरफ से।पिंकी ने एक बार मजाक में अपनी मां से कहा भी था” मां,दुनिया कितनी बदल गई,पर बुआ का भेजा राखी का लिफाफा आज भी नहीं बदला।वहीं सादी सी राखी,और इंक्यावन रुपये।”,

अविनाश की पत्नी बेटी को डांट कर कहती थी” छि!!!!!पिंकी,ऐसे किसी रिश्ते को छोटा नहीं करते।तेरी बाकी की बुआओं के यहां से उपहार जरूर अच्छे आते हैं, पर उनके उपहार उनके पैसों का प्रदर्शन है।रुतबे का घमंड है।सब तो आती हैं, पर कभी छोटी बहन के बारे में जानना नहीं चाहतीं।शायद छोटी बुआ किसी तकलीफ में होंगी।” 

“अरे मां,तकलीफ में है अगर तो बता तो सकतीं हैं ना पापा को।इकलौता भाई है उनका।क्या उनकी तकलीफ में काम नहीं आएगा?” 

पिंकी की बात कितनी सच है या नहीं पता नहीं,पर अविनाश की पत्नी (सुगंधा)को अब क्या करना है,पता चल गया।बिना अविनाश को बताए पिंकी के द्वारा छोटी ननद के यहां फोन करवाया कि उसका भाई बहुत बीमार है,उससे मिलना चाहता है।होली पर जरूर आएं।”पिंकी ने मां को समझाया भी ” क्या ये ठीक रहेगा मां?बीमारी का बहाना सुनकर पापा नाराज ना हो जाएं।”तब सुगंधा ने समझाया बेटी को” जब झूठ किसी अच्छे कारण के लिए बोला जाए तो,वह सौ सच से बड़ा होता है।”,मां की बात सुनकर पिंकी भी मुस्कुरा दी।

होली के तीन दिन पहले ही अविनाश की तीनों जीजी और जीजा बच्चों के साथ आ पहुंचे।तीनों बुआ की ससुराल संपन्न थी।जब भी आतीं ,मंहगे उपहार ही लेकर आतीं।इस बार भी एक बुआ सोने का सैट लेकर आई सुगंधा के लिए,और दूसरी बुआ ने भाई -भाभी को मंहगी घड़ी दी।तीसरी ने हीरे की अंगूठियां भाई -भाभी दोनों को दिए।पिंकी के लिए भी मंहगे ड्रेस लेकर आईं थीं।रात के खाने में बातों-बातों में छोटी बुआ की बात निकली,तो बड़े दामाद हंसकर बोले”अरे वो नहीं आएगी यहां।यहां आकर उसके पति की बेईज्जती होती होगी।बेवकूफ को तो इतनी भी तमीज नहीं कि, किसी के घर जाने पर कुछ लेकर जाना चाहिए।”

मंझले दामाद और जीजी इशारे से नाक भौं सिकोड़ते हुए बोले”,पिंकी के पांचवें जन्मदिन पर याद है ना अविनाश क्या लेकर आए थे दोनों?एक छोटा सा घर का बना केक,और छोटी का बुना हुआ‌ स्वेटर बस।”,तीसरी बुआ भी क्यों चुप रहती?छूटते ही बोली”मैंने तो तब कह ही दिया था छुटकी से कि मेरी एक अच्छी पार्टी वियर साड़ी पहन ले,और मेरे पति का सूट अपने पति को पहना दें।देखने में थोड़ा अच्छा लगेगा।पर मानी कहां वो?बाहरी लोगों से बचने के लिए पति -पत्नी रसोई में ही घुसे रहे।मुझे तो लगता है ,छुटकी के पति किसी होटल-रेस्टोरेंट में ही खाना बनाने का काम करते होंगें।थोड़ी बहुत तन्ख्वाह मिलती होगी,तो जैसे-तैसे गृहस्थी चलती होगी उनकी।” अविनाश‌ भी तीनों बहनों की बातों से सहमत ही‌ लग रहे थे।बुरा लग रहा था तो पिंकी को,सुगंधा को।

होली के एक दिन पहले ही‌ छोटी बुआ अपने पति और बच्चों के साथ ऑटो से उतरी।घर‌ में घुसते ही अविनाश -अविनाश‌ चिल्लाने लगीं।सुगंधा को अब संभालना था मामला।जल्दी से छुट्टी(कविता) को परिवार सहित उनके कमरे में ले गई।कमरा दिखाते हुए कहा सुगंधा ने” ये देखिए कविता जी,आपके भैया ने कितना बड़ा घर बनवाया है।आप सभी के लिए कमरे अलग -अलग हैं।किसी को रहने में दिक्कत नहीं‌ होगी।आप लोग पहले नहा कर फ्रेश हो जाइये।मैं चाय लेकर आती हूं।”

कविता रोए जा रही थी और पूछ रही थी” कौन से अस्पताल में रखा है अवि को भाभी?मैं पहले मिलूंगी उससे ,फिर और कुछ करूंगी।ये देख ,अपने नगर की दुर्गा माता का पूजा का प्रसाद और फूल लाई हूं।एक बार उसके सर पर उतार दूं यह चमत्कारी फूल ,तब देखना मेरा अवि बिल्कुल ठीक हो जाएगा।”

छोटी बुआ की बातें सुनकर पिंकी को बुरा लगने लगा।मां को इशारे से सच्चाई बताने के लिए कहा पिंकी ने।सुगंधा की बांहों में धार-धार रोए जा रही थी कविता।सुगंधा ने जोर से भींच लिया कविता को,और पीठ सहलाते हुए बोली”कुछ नहीं हुआ है आपके अवि को।वो बिल्कुल ठीक हैं।कल‌ हमारी शादी की पच्चीसवीं सालगिरह है ना,तो आपको बुलाने के लिए ये छोटा सा झूठ बोला मैंने और पिंकी ने

आप सालों से आतीं नहीं,तो अवि को भी बहुत बुरा लगता है।बहुत दुखी हो जातें हैं।आप सभी बहनों को मां समान प्यार और सम्मान देतें हैं वो,आप मानती हो ना।तो बस अब नहा धो लो।बाहर आकर तैयारियां देखो।जीजाजी ,आप भी नहा धोकर तैयार होकर बाहर आ जाइये। जिम्मेदारी आपकी भी है,इस पार्टी को भव्य बनाने की।” 

भाभी की बातें सुनकर कविता और उसके पति अचंभित थे।झूठी खबर दी हमें बुलाने के लिए।बाकी की तीनों बहनें अपनी दौलत के दम पर हमेशा पतियों के सामने उन्हें नीचा दिखातीं थीं,इसलिए आना बंद कर दिया था कविता ने।बेवजह कविता के पति को नीचा दिखाने का कोई बहाना छोड़ती नहीं थी।

नहाकर जब अपना बैग खोला कपड़े निकालने के लिए,तभी सुगंधा आई और बोली” जीजी,आलमारी में कुछ साड़ियां रख दीं हैं मैंने।जल्दबाजी में खरीदी हैं,बहुत अच्छी नहीं होंगीं,पर आपको पसंद आएंगी। जीजाजी और बच्चों के कपड़े भी हैं।प्लीज़ पहनिएगा।मेरी विनती है यह।”कविता अवाक थी,भाभी को कितना ख्याल है अपनी गरीब ननद का।

बाहर बाकी की ननदें होली के रंग थालों पर निकाल कर सजा रहीं थीं।बाल्टियों में रंग घोलें जा रहें थे।हलवाई मिठाई और मुंगौड़ी बना चुके थे।जैसे ही कविता अपने पति और बच्चों के साथ बाहर आई,सभी की नजरें उन पर चिपक गई।हल्का गुलाबी रंग का गुलाल ,मंदिर में भगवान को सात बार उतारकर सीधे अविनाश और सुगंधा के माथे पर मल दिया था कविता ने।गुलाल के साथ उसके आंसू भी भाई के गाल को गीला कर रहे थे।इतने सालों में छोटी बहन को अपने घर देखकर अविनाश खुशी के मारे रोने लगा।कविता को गले लगाकर गुस्से में बोला”बड़ी सिठानी बन गई है ना अब,भाई के घर आने की फुर्सत ही नहीं है।तीनों जीजी हर साल आ जातीं हैं।अब अम्मा -बाबू नहीं हैं ना,तो मेरी अहमियत नहीं है तेरे लिए।”,

बरसों बाद भाई और बहन का मिलन हो रहा था।मानो गंगा और यमुना का संगम बन रहा हो।

होली के अगले दिन ही पार्टी थी।होली की हुल्लड़ ने बरसों से गहराई मन के बीच की खाई को पाट दिया था। अविनाश अब कविता के पति के साथ बात कर रहे थे अच्छे से।बातों -बातों में उन्होंने बताया कि उनके भाई ने कारोबार अपने हिस्से में ले लिया।बदले में एक दो कमरों वाला नौकरों का मकान रहने को दिया है।वो अब ऑटो चलाते हैं,कविता घर पर सिलाई करती है।बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाते हैं।जीजा की बात सुनकर अवि को बहुत गुस्सा आया।बोला”आप लोग मुझे नहीं बता सकते थे।मैं क्या मदद नहीं करता।भाई हूं मैं।अकेली सब सहती रही पर यह जिद्दी कविता अपना दुख अपने भाई को नहीं बता पाई।धिक्कार है मुझे भी।मैं भी तो व्यस्तता के चलते जा नहीं पाया आप लोगों की खोज खबर लेने।मुझे माफी मांगनी होगी कविता से।” 

कविता को ढूंढ़ता हुआ अवि रसोई में पहुंचा तो देखा ,पगली मूंग की दाल के लड्डू बना रही है।जो अवि को पसंद है।आंसू पोंछते हुए आकर उसने सुगंधा से कुछ कहना चाहा,तो सुगंधा और पिंकी ने हंसकर अवि को कमरे में ले गईं।वहां मंहगी साड़ियां,सोने की चेन,अंगूठी डिब्बे खोलकर दिखाते हुए सुगंधा बोली”मैं जानती थी,रिश्तों में भी अब अलग -अलग रंग हैं।जो जितना बड़ा उपहार दे,उसका रंग ज्यादा चटक।जो ना दे सके,उसके रंग बेरंग।मैंने और पिंकी ने ये खरीद कर रखा था पहले से।अब कविता अपने और अपने पति की तरफ से ये उपहार सबके सामने हमें देंगीं।ताकि आपकी बाकी की जीजियों के ताने ना सुनना पड़े उन्हें।हमारे होते हुए कविता ऐसी गरीबी की जिंदगी कभी नहीं जिएगी। पार्टी के बाद हम छोड़ने जाकर कविता के पति की अच्छी सी कमाई की कुछ व्यवस्था कर के आएंगे।कविता बहुत थक गई है मशीन चला-चला कर।बस अब वह आराम करेगी।”

पार्टी के दिन जब सुगंधा ने कविता के हाथों में वो मंहगे उपहारों का पैकेट देकर कहा”ये बाकी के लोगों के सामने देना।खासकर अपने तीनों जीजा के सामने देना।ताकि वो तुम्हारी बेइज्जती ना कर पाए।तुम्हारे इंक्यावन रुपये और साधारण सी राखी में जो प्यार और पूजा का प्रसाद मिला है ना अवि को,उसी की बदौलत आज वो इस मुकाम पर हैं।सभी बहनों ने उपहार दिए,नेंग के नाम पर पैसे दिए होंगें,पर मां बनकर उनके हिस्से का आशीर्वाद हमें आपसे मिला है।आपके निश्छल स्नेह का रंग सबसे चटक है।अब आप को कुछ भी छुपाने या सहने की जरूरत नहीं।आपके भाई आपके साथ हैं।”,

कविता ,सुगंधा के गले लिपटकर रोई ,जी भर कर रोई।वो सारे आंसू,जो बड़ी बहनों ,जीजाओं ने अपमान करके भरे थे,आज सारे पिघल रहे थे। पार्टी के बाद सभी भाई -बहनों ने एक साथ सोने का प्रोग्राम बनाया।दालान में गलीचा बिछाकर ,उसपर मसनद डालकर सब सोए उस दिन।कविता ने मनुहार करके अवि के हांथ में अपना सर रखा।रात बीती उस दिन एक नए रिश्ते के रंग में सराबोर होकर।भोर की लालिमा ने मानों सारे रंगों को घोल दिया हो।सभी जागने लगे एक-एक कर।सुगंधा नहाकर चाय भी बना लाई।तब तक कविता नहीं उठी थी।अवि भी हिल -डुल नहीं रहा था कि कहीं उसकी नींद ना टूट जाए।कल बरसों बाद बचपन जिया था भाई -बहनों ने।सूरज देव अब सर के ऊपर आने लगे,तो सुगंधा ने अवि को कहा कि कविता को हिलाए,जगाए।

अविनाश ने कविता के सोते हुए चेहरे पर नजर डाली ,माथा चूमा ,और हिलाया जैसे ही,वो सीधे दूसरी ओर लुढ़क गई।सन्न रह गए सब।शरीर ठंडा पड़ चुका था कविता का।शायद भोर में ही प्राण मुक्त हो गए।मोह के अंश चेहरे की मुस्कान में अब भी था।

अविनाश हॉस्पिटल ले जाने को तैयार होने लगा कविता को लेकर,तो कविता के पति ने रहस्योद्घाटन किया”भाई साब, कोई फायदा नहीं।कविता को कैंसर का आखिरी स्टेज था। डॉक्टर बोल कर ही रखें थे,यदि ऑपरेशन नहीं हुआ तो चार -छह महीने से ज्यादा नहीं है ।हमारे पास बचत हो ही नहीं पाई।किसी रिश्तेदार से कर्ज नहीं लेने दिया उसने।आपसे भी मांगने से मना कर दिया।बोलती थी,मेरे मायके का मां है अवि,बाप है अवि।लाड़ला है मेरा।मैं कभी कुछ दे नहीं पाई उसे,तो लूं किस मुंह से।इसे अब शांति से जाने देना चाहिए भाई साब।बहुत आघात सही है यह अपनों के।” 

होली के सारे रंग मानो श्याम हो गए।बस वही हल्का गुलाबी रंग जुगनू सा चमक रहा था अविनाश के माथे पर।रोते हुए बार-बार माफी मांगता हुआ अविनाश कह रहा था”कब हम लोगों ने रिश्तों को पैसों का रंग दे दिया।प्यार और स्नेह की जगह मंहगे उपहार ही नेंग बन गए।जो ना दे पाए,उसकी औकात कुछ नहीं,उसके प्रेम की कोई कीमत क्यों नहीं।मैंने बहुत बड़ी ग़लती की कविता।तेरे ना आने को मैंने तेरी जिद मान ली।कभी तेरी हालत जानने की कोशिश भी नहीं की।मेरी जिंदगी का सबसे पसंद का रंग तो तू थी,बिना कुछ कहे,बिना कुछ मांगे ऐसे ही चली गई।क्यूं,कविता क्यूं?” 

शुभ्रा बैनर्जी 

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