रिश्तों के भी रंग – बिमला रावत जड़धारी

राहुल अपनी मम्मी का अंतिम संस्कार करके घर पहुंचा साथ में उसके पापा, जीजा जी, रिश्तेदार और पड़ोसी थे सब अपने

अपने घर जा रहे थे। थोड़ी देर में उसके दोनों जीजा जी भी अपने घर चले गए । घर में दोनों बहनें ,पापा और राहुल थे।

पंडित जी भी कल आने का बोल कर चले गए।       

राहुल कमरे में आकर लेट गया तभी पीछे से बड़ी बहन सीमा आई और

बोली राहुल तुम क्या सोच रहे हो,दीदी आप तो जानती ही हो पिताजी और निर्मला की बिल्कुल भी नहीं बनती है, माँ थी

तो सब-कुछ संभल लेती थी। और अब माॅं नही रही तो सब कैसे होगा। मैं तो ऑफिस चला जाऊंगा। मेरे पीठ पीछे कैसे

रहेंगे, बात -बात में लड़ाते रहते हैं।     

निर्मला , राहुल की पत्नी उसे हर काम अपने हिसाब से करने की आदत है । जो की

राहुल के पापा को बिल्कुल भी पसंद नहीं था । उनका कहना है कि हमारा घर हम जैसे चाहिए वैसे रहे सकते हैं। जहाॅं मन

करेगा वहाॅं बैठ सकते है। परन्तु निर्मला को यह बिल्कुल भी पसंद नहीं। वह बैठक में किसी को भी नहीं बैठने देती , कहती है

बार-बार सोफे में बैठने से सोफे के कवर खराब हो जाते हैं, जब कोई आए तभी बैठना है। 

परंतु राहुल के पापा को तो सोफे

पर ही बैठकर पेपर पढ़ना होता है। यहां तक कि चाय भी वहीं बैठकर पीनी है। कभी-कभी तो खाने के लिए भी जिद्द करते हैं

कि बैठक में बैठकर ही खाना, खाना है। डाइनिंग टेबल पर नहीं। 

अभी-अभी कुछ दिन पहले पिताजी ने अपनी चप्पल वाॅश बेसिन के पास उतार दी। निर्मला ने वह चप्पल उठाकर बाहर फेंक दी। 

बोली, चप्पल यहाॅं पर क्यों रखी है। उस दिन मैं भी

घर पर ही था ।मैंने  देखा कि माॅं  पिताजी को डांटने लगी। तो मैंने निर्मला को डाॅंटकर बोला, पिताजी की चप्पल गीली थी

इसलिए यहाॅं पर उतार दी। और अगर यह चप्पल पहनकर पिताजी बाहर जाते तो तुम्हें उससे भी परेशानी होती। तुम जब

देखो पिताजी से झगड़ती रहती हो तुम्हें तो कुछ न कुछ बहाने चाहिए झगड़ने के लिए। बस यह सब सोच कर मैं परेशान हो

रहा हूॅं ।       

तभी राहुल के पापा अंदर कमरे में आते हैं और बोलते हैं बेटा तुम चिंता मत करो मेरी वजह से निर्मला बेटी

को कोई परेशानी नहीं होगी तुम अपनी माॅं के पूजा का काम ठीक से निपटा दो। फिर मैंने सोच लिया है कि मैं गांव चला

जाऊॅंगा किसी को कोई परेशानी नहीं होगी ।पिताजी आप यह क्या बोल रहे हो । मैंने माॅं जी को तो खो दिया है और अब

आप भी गाॅंव चले जाओगे तो मैं कैसे आप लोगों के बिना रहूंगा राहुल बोला।       

 ठीक ही तो बोल रहे हैं पिताजी मुझे

उनकी वजह से परेशानी होती है। उनके जाने से मुझे बहुत खुशी मिलेगी अरे आप लोगों ने कैसे सोच लिया कि मुझे पिताजी

की वजह से परेशानी होती है मैं मानती हूॅं की मुझे सफाई का भूत सवार रहता है इसलिए मैं चिल्लाती हूॅं। पर मैं चाहती हूं

कि सब एक साथ बैठकर साथ में चाय पिए, और साथ में बैठ कर खाना खाएं ।

 पिताजी की आदत है की वह सोफे पर बैठ

कर चाय पीते हैं और मम्मी जी यहाॅं अकेले बैठकर चाय पीती थी मैं तो यह चाहती थी दोनों साथ बैठकर खाए पिए ऐसा

नहीं एक यहाॅं एक वहाॅं अच्छा लगता था क्या ?    

 पिताजी आप कहीं नहीं जाएंगे, मेरी वजह से आप सब को परेशान हुई

मुझे माफ कर देना। मम्मी जी तो रही नहीं ,मैं उनसे तो माफी नहीं मांग सकती परंतु आप यहीं रुक जाओ मैं समझूंगी आपने

मुझे माफ कर दिया ।     

 बेटा माफी तो मुझे मांगनी चाहिए। अगर मैं तुम्हारी भावना को समझ पाता। आज राहुल की

मम्मी की यादें मेरे साथ रहती मैं हमेशा उससे दूर-दूर ही रहा वह तो मेरे पास कई बार बैठने की कोशिश करती और कई

बार बात करने की भी कोशिश करती । परंतु मैं पुरुष अहंकार में ही रहा और उससे दूर-दूर ही रहा । अब वह इतनी दूर

चली गई की अब मैं उसके साथ के लिए तरस रहा हूॅं।          

 बच्चों में पूजा के बाद कुछ समय के लिए गांव जाना चाहता हूॅं।

निर्मला बोली पिताजी हम आपको अकेले तो गांव नहीं भेज सकते जब पूजा हो जाएगी तब कुछ समय के लिए हम सब गांव

चलेंगे कुछ दिन रहकर आ जाएंगे ।राहुल बोला मैं तो नहीं जा पाऊंगा मुझे ऑफिस से छुट्टी नहीं मिलेगी । राहुल की छोटी

बहन राधा दीदी बोली ,कोई बात नहीं मैं और भाभी चलें जाएंगे पर पिताजी को अकेले नहीं भेजेंगे ।

राहुल के पिताजी के

आंखों मे आंसू थे और बोल रहे थे काश राहुल की मम्मी आज तुम होती तो हम दोनों साथ में गांव जाते ,तुम्हारा कितना मन

था गांव जाने का। मैं तुम्हें हमेशा डांट कर चुप कर देता था। काश मुझे इन खूबसूरत रिश्तों के भी रंग का एहसास पहले

होता। राहुल ने अपने पिताजी के कंधे में हाथ रख दिया। सब की आंखों में आंसू थे।-

 बिमला रावत जड़धारी

error: Content is protected !!