दिनेश अपने माता-पिता का होनहार बेटा था। माता-पिता ने पाल पोसकर, अच्छे संस्कार ,अच्छे गुण आदि का उसमें समायोजन करके एक अच्छे शिक्षित व्यक्ति की राह पर उसे चलाया था। दिनेश भी माता-पिता की दिखाई राह पर लगातार आगे बढ़ता जा रहा था।
वह पढ़ने में काफी होशियार था। एक-एक करके वह शिक्षा की नई-नई ऊंचाइयों को छू रहा था। जिस समय उसकी शिक्षा पूर्ण हो गई। किस्मत ने दस्तक दी और वह एक विद्यालय में अध्यापक पद पर कार्यरत हो गया ।
अपने माता-पिता के लिए संस्कार और व्यवहार तथा अच्छी शिक्षा में महारत प्राप्त दिनेश अपनी अध्यापक की नौकरी बहुत ही लगन के साथ करने लगा। वह बहुत ही लगन के साथ बच्चों को शिक्षा देता। उनके जीवन को संवारने के लिए वह दिन-रात एक कर रहा था। विद्यालय में भी उसका रुतबा अन्य अध्यापकों से बढ़कर हो चुका था ।बच्चे भी दिनेश को काफी पसंद करते थे और जानते थे कि उनके हर सुख दुख में उनके अध्यापक दिनेश जी सदैव उनके साथ है।
जब सालाना परीक्षाएं आती तो बच्चों से ज्यादा दिनेश परेशान हो जाता और एड़ी चोटी का जोर लगाकर बच्चों को पढ़ने में समय व्यतीत करता। किसी को किसी प्रकार की कोई भी मुश्किल आती तो दिनेश उनके साथ हमेशा खड़ा हो जाता। दिनेश के माता-पिता भी उसके इस जज्बे के प्रति बहुत हैरान थे।
वह जानते थे कि दिनेश अपने अध्यापन कार्य में बहुत ही रुचि रखता है और उसे अपने कर्म के समान निभाता है ।बच्चों में दिनेश के प्रति इतना इज्जत मान तथा बच्चों के माता-पिता तथा समस्त इलाका वासियों में दिनेश के प्रति सम्मान का भाव दिनेश के साथ पढ़ाने वाले बाकी अध्यापकों के हृदय में शुल की भांति चुभने लगा।
दिनेश इस बात से बेखबर था और वह अपने साथी अध्यापकों के साथ सदैव प्रेम भाव के साथ रहता।उनके सुख-दुख में बराबर का शरीक होता। वह खुद से ज्यादा अपने साथी अध्यापकों पर विश्वास करता। इसके अलावा विद्यालय के प्रधानाचार्य को अपना भगवान तुल्य मानता।
सदैव उनकी आज्ञा का पालन करता ।उसका इस प्रकार का विश्वास कहीं ना कहीं उसके लिए एक नए संकट में जीवन की शुरुआत कर रहा था। इस बात से दिनेश पूरी तरह बेखबर था। दिनेश सिर्फ अपने कर्म की तरफ ही ध्यान देता और वह हमेशा यही सोचता कि इंसान कभी भी किसी का बुरा नहीं कर सकता जब तक ईश्वर की रजा उसमें शामिल न हो।
इसी विश्वास के साथ दिनेश लगातार अपना अध्यापन कार्य पूरी ही लगन के साथ करता जा रहा था। फिर एक समय ऐसा आया जिस समय दिनेश रोजाना की तरह पूरा दिन बच्चों को पढ़कर अपने घर पर लौटा। जैसे ही वह घर पहुंचा हाथ मुंह धोकर अभी पानी ही पी रहा था कि एकाएक उसका फोन बज पड़ा।
उसने देखा की विद्यालय के फोन से कोई उसे फोन कर रहा है। पानी एक तरफ रख कर उसने फोन उठाकर बात करना प्रारंभ किया। दूसरी तरफ से विद्यालय में चपरासी पद पर तैनात एक व्यक्ति भोला उसे समाचार देता है कि दिनेश जी आपके स्थान पर कोई अन्य अध्यापक ज्वाइन कर गया है।
जिसके कारण आपकी सेवाएं पूरी तरह समाप्त कर दी गई है। दिनेश यह समाचार सुनकर हक्का-बक्का हो गया। उसने फोन काट कर विद्यालय के प्रधानाचार्य को फोन किया। प्रधानाचार्य ने कहा कि मैं कुछ नहीं कर सकता। हां इतना कह सकता हूं कि अब आप की नौकरी नहीं रही क्योंकि सरकार द्वारा अन्य अध्यापक को आपके स्थान पर भेज दिया गया है।
इसलिए अब आपको विद्यालय आने की आवश्यकता नहीं ।दिनेश कुछ नहीं बोल सका और प्रधानाचार्य ने फोन काट दिया ।दिनेश चुपचाप कुर्सी पर बैठ गया। पानी उसके हल्क के अंदर नहीं जा रहा था। माता-पिता उससे पूछ रहे थे कि किसका फोन है ?और क्या हुआ है ?परंतु दिनेश कुछ नहीं बोल पाया। चुपचाप अपने कमरे में चला गया ।
बस यही कहता कुछ नहीं हुआ है। दिनेश को विश्वास नहीं हो रहा था कि उसके साथ क्या हो गया है? वह सिर्फ इसी बात को अपने आप से पूछ रहा था कि जिस समय वह अध्यापक उसके स्थान पर ज्वाइन कर रहा था तो उसके साथ ही अध्यापकों ने उसे मना क्यों नहीं किया?
उसके साथी अध्यापक उसके साथ ऐसे कैसे कर सकते हैं? उसने अपना सारा जीवन अपने जीवन का स्वर्णिम समय बच्चों के जीवन को उज्जवल बनाने में लगा दिया। अब ऐसा समय था जिस समय उसे आगे का रास्ता बिल्कुल नजर नहीं आ रहा था। वह यह सोचकर परेशान था कि अब वह क्या करेगा ?
इसी कशमकश में उसे अंधेरा ही अंधेरा दिखाई दे रहा था ।उसने मन में विश्वास बांधा और अपने आप को विश्वास दिलाया कि वह अगले दिन जाकर उस अध्यापक से बात करेगा कि वह अन्य स्थान पर चला जाए और उसे अध्यापन पद पर रहने दे। यह सोचकर जैसे तैसे करके उसने वह रात काटी ।सुबह रोजाना की तरह तैयार होकर विद्यालय की तरफ चला गया।
विद्यालय में पहुंचते ही साथ ही अध्यापकों का रवैया उसके प्रति बाकी दोनों की भांति बिल्कुल अलग था। वह उसे ऐसे देख रहे थे जैसे कोई अपरिचित व्यक्ति उनके पास आया हो ।उसने सीधा जाकर विद्यालय के प्रधानाचार्य से पूछा कि यह सब क्या है? यदि ऐसा हुआ है तो क्या आपने उसे बताया नहीं कि पहले से यहां पर एक अध्यापक काम कर रहा है ।
परंतु प्रधानाचार्य ने दो-टूक शब्दों में कहा कि आप एक अस्थाई अध्यापक थे। आपकी सेवाएं स्थाई नहीं थी। इसलिए आपका इस पद पर कोई भी हक नहीं बनता है। इसलिए अब आप हमसे बहस ना करें और विद्यालय छोड़ कर चले जाए। दिनेश पूरी तरह टूट गया।
फिर उसने हौसला बांधा और सीधा क्लर्क के पास पहुंचा। वहां पर क्लर्क साहब से पूछा की क्या आपने सरकार को इस पद पर मेरे द्वारा काम करने की रिपोर्ट नहीं भेजी थी? क्लर्क ने कागज निकाल कर सामने रख दिए और कहा कि प्रधानाचार्य ने आपके वाले स्थान को इस बार खाली छुड़वा दिया था ।
जिस कारण सरकार द्वारा पद खाली होने की स्थिति में दूसरे अध्यापकों को आपके स्थान पर भेज दिया गया। इसलिए अब आपकी नौकरी समाप्त हो गई है। इस पर दिनेश ने पूछा इसमें सबसे बड़ा दोषी कौन है? बस मुझे इतना बता दीजिए। मैं यहां से चला जाऊंगा।
इस पर क्लर्क ने कहा कि जिन पर आप आंख मुड़कर विश्वास करते थे। उन्होंने ही आपकी नौकरी समाप्त करवाने में अहम भूमिका निभाई है। हां यदि मैं सच कहूं तो वह आपकी इस अध्यापन पद के प्रति सच्ची निष्ठा और लगन औ
तथा समाज में आपके प्रति बढ़ते सम्मान को सहन नहीं कर पाए। जिस कारण उन्होंने सदा सदा के लिए आपकी सेवाएं समाप्त करवा दी ।बस इतना कहकर उन्होंने कहा कि अब मैं इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकता। आप काफी समझदार है। बस यही कहूंगा की कोशिश कीजिए और हो सकता है
आने वाले समय में आप इसे भी अच्छे विद्यालय में अध्यापन पद पर कार्यरत हो। दिनेश टूट चुका था। कुछ नहीं बोला और चुपचाप विद्यालय को एक बार देखकर, बच्चों को देखकर और विद्यालय की तरफ हाथ जोड़कर रोते हुए हृदय से चुपचाप चला गया। आज दिनेश को कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था क्योंकि आज उसके विश्वास का गला घोट दिया गया था।
वह सिर्फ भगवान से यही पूछ रहा था कि आखिर उसने क्या गलत किया? उसने अपना संपूर्ण जीवन अपने जीवन का स्वर्णिम समय बच्चों के उज्जवल भविष्य को बनाने के लिए लगा दिया। अब वह कहां जाए? अब उसके पास कोई भी रास्ता नहीं है।
उसका विश्वास ईश्वर के प्रति टूट गया। वह रास्ते पर चल रहा था परंतु उसे ऐसे लग रहा था जैसे सारा समाज खत्म हो चुका है ।चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा है। इसी अंधेरे में उसके हृदय से सिर्फ एक ही आवाज आ रही थी कि कुछ भी करना कभी भी किसी पर आंख बंद करके भरोसा मत करना। एक दो बार आंखों से अश्रु की धारा निकली ।हृदय भारी हो गया जीने की इच्छा समाप्त हो गई।
एकाएक उसने अपने आप को एकदम सड़क के बीचो-बीच खड़ा कर दिया और इस समय एक तेज रफ्तार ट्रक ने उसकी जीवन लीला को समाप्त कर दिया। सभी दौड़ते हुए उसकी तरफ आए । तेज रफ्तार ट्रक आगे जाकर रुक गया। सभी लोगों ने आगे जाकर देखा तो दिनेश लहूलुहान सड़क पर अंतिम सांस ले रहा था ।
लोग आनन -फानन में उसे उठाने लगे। परंतु कुछ ही पल में दिनेश इस संसार को हमेशा के लिए अलविदा कह कर चला गया। सच कहा है किसी ने कभी भी किसी पर आंख बंद करके भरोसा मत करना।
धन्यवाद।
लेखक :संजय सिंह।