हां, मैं अपनी बेटी के साथ रहती हूं – अर्चना खंडेलवाल

 मैं और मेरी दुनिया, हम तीन लोग थे। जीवन से सारी खुशियां हमने जैसे चुरा ली थीं। एक छोटा-सा घर, थोड़ी-सी कमाई, और ढेर सारा अपनापन—यही हमारी पूरी दुनिया थी। हम साथ रहते, साथ हँसते, साथ खाते-पीते, और यूँ ही जिंदगी जीते चले जा रहे थे। कभी-कभी तो लगता था

कि बस यही तो जीवन है—सादा, शांत और सच्चा। मन में यह भरोसा भी था कि हम हमेशा ऐसे ही साथ रहेंगे, पर सच यही है कि जीवन में मिलने के साथ-साथ बिछड़ना भी लिखा होता है। लोग कहते हैं न—“एक-एक करके हम मिलते हैं, तो बिछड़ते भी हैं।” उस वाक्य का मतलब मुझे तब समझ आया, जब मेरी दुनिया से एक-एक करके लोग कम होने लगे।

आशु मेरे पति थे—बहुत जिंदादिल, बहुत सुलझे हुए। उनका स्वभाव ऐसा था कि घर में परेशानी भी हो, तो वे अपनी मुस्कान से उसे हल्का कर देते। वे ज्यादा कमाते नहीं थे, पर इतना कमा लेते थे

कि हमारी जरूरतें पूरी हो जाती थीं। मैं कभी-कभी अपनी इच्छाओं को दबा लेती थी—कभी कोई नया सूट मन को भा गया तो सोचती “अगली बार,” कभी कोई छोटी-सी घूमने की इच्छा जागी तो मन को समझा लेती “अभी नहीं।”

लेकिन इन सबके बावजूद मैं खुश थी, क्योंकि मेरे पास आशु थे, और हमारे बीच सच्चा साथ था। हमें दिखावे की जिंदगी नहीं चाहिए थी। हमें बस इतना चाहिए था कि घर में प्यार बना रहे, सम्मान बना रहे, और एक-दूसरे के लिए दिल में जगह बनी रहे।

फिर हमारे जीवन में खुशी आई—हमारी बेटी। उसके आने से हमारे घर की चहल-पहल और बढ़ गई। वह छोटी थी तो उसकी किलकारियाँ पूरे घर में गूंजतीं, और जैसे-जैसे वह बड़ी होने लगी, उसके सवाल, उसके सपने, और उसके छोटे-छोटे किस्से हमारे दिन का सबसे सुंदर हिस्सा बन जाते। खुशी के साथ हमारा जीवन सचमुच खुशियों से भर गया। हम दोनों उसे देखकर खुद को पूरा महसूस करते थे। हमारी दुनिया अब तीन लोगों की हो चुकी थी—मैं, आशु और हमारी खुशी।

धीरे-धीरे रिश्तेदारों और लोगों की सलाहें शुरू हो गईं। कोई कहता, “दूसरा बच्चा कर लो,” तो कोई बोलता, “अरे एक बेटा भी होना चाहिए।” मुझे याद है, कितने ही लोग बड़े आत्मविश्वास से समझाते थे कि एक बच्चा और कर लो, बेटा होगा तो बुढ़ापे का सहारा मिल जाएगा। और फिर वही बात—“खुशी तो लड़की है, चली जाएगी अपने घर, वो तुम लोगों के लिए कुछ नहीं कर पाएगी।” ऐसे वाक्य सुनकर मन में टीस उठती थी। मुझे लगता था, लोग बेटी को क्यों इतना हल्का समझते हैं? क्यों यह मान लेते हैं कि बेटी पराया धन है? क्या बेटी का प्यार कम होता है? क्या बेटी का कर्तव्य नहीं होता?

हमारी स्थिति भी बहुत बड़ी नहीं थी। इतनी ज्यादा कमाई नहीं थी कि हम दो बच्चों को पढ़ा-लिखा सकें, अच्छे से परवरिश कर सकें। हम जानते थे कि एक बच्चे को ही हम सही तरीके से बड़ा कर सकते हैं, उसकी पढ़ाई, उसकी जरूरतें, उसके सपने—सब कुछ हम पूरा मन लगाकर कर सकते हैं। अगर दूसरा बच्चा लाते, तो कहीं न कहीं हम खुशी को वैसा समय, वैसा ध्यान, वैसी सुविधाएँ नहीं दे पाते, जैसी हम देना चाहते थे। इसलिए हमने निर्णय लिया कि हमारी संतान बस वही है—हमारी खुशी।

मैंने मन ही मन ठान लिया था—मैं खुशी को खूब पढ़ाऊंगी। मैं उसे ऐसा बनाऊंगी कि वह आत्मनिर्भर हो, अपने पैरों पर खड़ी हो, अपने फैसले खुद ले सके। और वह ही हमारे बुढ़ापे का सहारा बनेगी। जिस तरह लोग बेटे की सफलता देखकर खुश होते हैं, मैं खुशी की प्रगति देखकर खुश रहती थी। मेरे लिए खुशी सिर्फ “लड़की” नहीं थी—वह हमारी संतान थी, हमारा गर्व थी, हमारा भविष्य थी। हमने कभी नहीं सोचा कि वह चली जाएगी तो हमारे लिए कुछ नहीं कर पाएगी। हमने उसे प्यार भी दिया, संस्कार भी दिए, और सबसे ज्यादा—उसके अंदर विश्वास भरा कि वह किसी से कम नहीं है।

समय बीतता गया। खुशी पढ़ाई में अच्छी थी, मेहनती थी। उसने हमेशा हमारे सपनों को अपना सपना समझा। हम तीनों की जिंदगी पटरी पर चल रही थी। पर जीवन कब किस मोड़ पर खड़ा कर दे, कोई नहीं जानता। एक दिन ऐसा भी आया कि हम तीन से फिर दो हो गए।

खुशी अच्छी कंपनी में नौकरी करने लगी। यह हमारे लिए गर्व का पल था। हम दोनों ने महसूस किया कि हमारे सारे त्याग, हमारी सारी मेहनत, हमारी सारी उम्मीदें रंग ला रही हैं। फिर उसके बाद उसकी शादी हो गई। शादी पास के शहर में ही हुई थी, इसलिए हमारा मन थोड़ा संभला हुआ था। मैं भीतर से टूटी जरूर थी—बेटी की विदाई किसी भी माँ के लिए आसान नहीं होती—पर यह सोचकर खुद को दिलासा देती थी कि वह पास ही तो है। वह आती-जाती रहेगी, और हमारा घर फिर भी उसका ही रहेगा।

खुशी ने आशु और मुझे बहुत संभाला। हम खुश थे, क्योंकि हमारी बेटी आते-जाते हमारा ध्यान रखती थी। जरूरत का सामान ऑनलाइन मंगवा देती, दवाइयाँ समय पर भिजवा देती। कभी-कभी मैं पैसे देने की कोशिश करती तो वह मुस्कुरा कर कह देती—“माँ, आपने पढ़ाया तभी तो मैं आज कमाने के लायक हुई हूँ। आप पैसे देकर मुझे पराया मत करो। मैं अंतिम सांस तक आपकी और पापा की सेवा करूंगी।” उसकी बात सुनकर मन भर आता। मुझे लगता—कितना गलत है यह मान लेना कि बेटी पराया धन है। बेटी तो अपने माता-पिता की सांसों में बसी होती है।

फिर भी… मैं खुशी से बिछड़कर चुपके-चुपके बहुत रोती थी। किसी के सामने नहीं, बस अकेले में। माँ का दिल होता है—वह खुश भी होता है और खाली भी। बेटी का घर बसते देख खुशी होती है, पर उसके जाने के बाद घर की दीवारें सूनी लगने लगती हैं। बहुत दिनों बाद मैं संभली थी। जीवन की गाड़ी चल रही थी। हम अपने छोटे-छोटे कामों में समय काट लेते थे। आशु थे, तो घर का सहारा था, हँसी थी, बातों की गर्मी थी।

फिर एक दिन… आशु रात को सोए तो सुबह उठे ही नहीं।
यह वाक्य लिखना भी मेरे लिए भारी है, और उस दिन का दर्द तो शब्दों में समा ही नहीं सकता। मेरा रो-रोकर बुरा हाल था। पहले खुशी चली गई थी—वो बिछड़ना अलग था—और फिर आशु चले गए… वो बिछड़ना मेरे जीवन की जमीन ही खींच ले गया। अब मैं अकेली रह गई थी। घर वही था, कमरे वही थे, पर जीवन का अर्थ बदल गया था। आंसू थम नहीं रहे थे। मन में डर बैठ गया था—अब मैं क्या करूंगी? कैसे रहूँगी? किसके लिए उठूँगी? किससे बात करूंगी?

ऐसे में खुशी ने मुझे संभाला। वह तुरंत आई। मेरे पास बैठी, मुझे गले लगाया, मेरा हाथ पकड़ा। फिर उसने कहा—“माँ, अब आप मेरे साथ रहोगे।”
ये सुनते ही मैं डर गई।

“नहीं, खुशी… लोग क्या कहेंगे? समाज बातें बनाएगा। बेटी के घर रहना मुश्किल है।” मैंने घबराते हुए कहा। मुझे पुराने संस्कार, पुराने डर, पुराने ताने याद आ गए।
मैंने उसे समझाने की कोशिश की—“तू पहले की तरह ही मुझसे मिलने आती-जाती रहा कर।”

लेकिन खुशी अडिग थी। उसकी आवाज में स्नेह भी था और दृढ़ता भी—“नहीं, माँ। अब मैं आपके बुढ़ापे का सहारा हूँ। और अब आप मेरी जिम्मेदारी हो। पापा के बिना आप अकेले कैसे रहोगे? इस समाज, दुनिया की परवाह मत करो, ये बस बातें बनाता है, सहारा नहीं देता।”

मैंने फिर डर से कहा—“तेरे ससुराल वाले क्या कहेंगे?”

खुशी ने बिना रुके जवाब दिया—“कुछ नहीं कहेंगे। वो तो वैसे भी गाँव में रहते हैं—भैया-भाभी के साथ। अगर यहाँ भी रहते तो भी मैं आपको अकेले नहीं छोड़ती। यहाँ नितिन और मैं ही रहते हैं। दूसरे शहर से बार-बार आना संभव नहीं है। पापा थे तो मैं चिंतामुक्त थी, पर अब मैं आपको अकेले नहीं छोड़ सकती।”

उसने आगे कहा—“मैंने नितिन से बात कर ली है, वो भी तैयार हैं। वैसे भी मैं सशक्त हूँ, आत्मनिर्भर हूँ। मैं आपका खर्च उठा सकती हूँ। मैं अपनी माँ को अपने साथ रख सकती हूँ। माँ, आपने तो जीवन भर किया… अब मेरी बारी है।”

उसके शब्दों ने मुझे भीतर तक हिला दिया। एक तरफ मेरे अंदर समाज का डर था, दूसरी तरफ अपनी बेटी का सच्चा प्रेम। बेटी के आग्रह के आगे मैं निरुत्तर हो गई—और सच कहूँ तो चिंता मुक्त भी। क्योंकि जब जीवन में सबसे बड़ा सहारा चला जाए, तब किसी अपने का हाथ पकड़ लेना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि जीवन को फिर से जीने की कोशिश होती है।

मैं खुशी की सोसायटी में रहने आ गई। सब कुछ नया था—नया घर, नई जगह, नए लोग। लेकिन खुशी के साथ होने से मन को सुरक्षा महसूस होती थी। कुछ दिनों बाद मैं वहाँ के महिला मंडल में शामिल हो गई। भजन-कीर्तन, किटी, छोटी-छोटी बैठकों में मेरा मन लगने लगा। धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि मैं फिर से सांस ले रही हूँ, फिर से अपने भीतर जीवन को लौटते देख रही हूँ।

हाँ, लोग पूछते थे—“आप बेटी के घर रहती हो?”
पहले दिन यह सवाल सुनकर मैं थोड़ी सकुचाई। पर फिर मुझे खुशी की बातें याद आईं—“समाज बातें बनाता है, सहारा नहीं देता।”
और मैं बिना शर्म, बिना झिझक कहने लगी—“हाँ, मुझे गर्व है कि मैं अपनी बेटी के साथ रहती हूँ, और मैं बहुत खुश हूँ।”

मेरे बुढ़ापे का सहारा ना बेटा है, ना ही बहू।
मेरे बुढ़ापे का सहारा तो मेरी बेटी बनी है।
और मुझे खुशी है कि मेरा विश्वास टूटा नहीं। खुशी मुझे सच में संभाल रही है।

पाठकों, जिनके सिर्फ बेटी ही है, वो ही उनके बुढ़ापे का सहारा होगी। अपनी बेटी के साथ रहना कोई शर्म या पाप नहीं है, जिससे हम आत्मग्लानि से भर जाएँ। हमें गर्व से बताना चाहिए, ताकि समाज की सोच बदले। साथ ही हमें अपनी बेटियों को आत्मनिर्भर भी बनाना चाहिए, ताकि वो किसी पर निर्भर ना रह सकें। अगर वो आर्थिक रूप से मजबूत होगी, तो खुद फैसले ले पाएगी—और जरूरत पड़ने पर अपने माता-पिता के लिए ढाल बन सकेगी।

अब मैं आपसे पूछना चाहती हूँ—आपको मेरा ब्लॉग कैसा लगा?
क्या आपने भी अपने आसपास ऐसी सोच देखी है कि “बेटी पराया धन है”?
क्या आपको लगता है कि समाज को अब यह मान लेना चाहिए कि बेटियाँ भी माता-पिता का सहारा बन सकती हैं—और बनती हैं?
कमेंट में अपनी राय जरूर लिखिए, ताकि और लोग भी आपकी बात पढ़ें और सोचें।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

error: Content is protected !!