रिश्तों के भी रंग -निधि गुप्ता

मांसी को बचपन से ही रंगों से बहुत प्यार था। उसके कमरे की दीवारें तरह-तरह की पेंटिंग से भरी रहती थीं। कहीं नीले आसमान में उड़ते पक्षी, कहीं हरे खेत, तो कहीं लाल-पीले फूल। मांसी कहती थी कि रंग सिर्फ कागज़ पर नहीं होते, रिश्तों में भी होते हैं।

मांसी की मां अक्सर मुस्कुराकर कहती,

“बेटी, अगर सच में रिश्तों के रंग समझ गई ना, तो जिंदगी की हर तस्वीर खूबसूरत हो जाएगी।”

मांसी का परिवार छोटा लेकिन बहुत खुशहाल था—पिता राकेश , मां सरला और छोटा भाई अनमोल। शाम को जब सब लोग एक साथ बैठकर खाना खाते, तो मांसी को लगता जैसे उसकी जिंदगी में हर तरफ बस खुशियों के चमकीले रंग ही रंगे हुए हैं।

लेकिन जिंदगी हमेशा एक जैसी नहीं रहती।

एक दिन अचानक सरला की तबीयत बहुत खराब हो गई। इलाज चलता रहा, लेकिन कुछ ही महीनों में सरला इस दुनिया को छोड़कर चली गईं। उस दिन मांसी को लगा जैसे उसकी जिंदगी से सबसे खूबसूरत रंग हमेशा के लिए मिट गया हो।

मां सरला के जाने के बाद घर का माहौल बदलने लगा।

पिता राकेश पहले जैसे हंसते नहीं थे। वे अक्सर चुप रहते और काम में डूबे रहते।

छोटा भाई अनमोल भी धीरे-धीरे गलत दोस्तों की संगत में पड़ गया।

घर में पहले जो हंसी-खुशी थी, उसकी जगह अब खामोशी और तनाव ने ले ली थी।

मांसी कभी-कभी अपनी पेंटिंग के सामने बैठकर घंटों सोचती रहती। उसे लगता जैसे उसके रंग भी अब फीके पड़ने लगे हैं।

एक दिन उसने एक नई पेंटिंग शुरू की। उसने कैनवास पर एक परिवार की तस्वीर बनाई, लेकिन रंग भरते समय उसके हाथ रुक गए।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस तस्वीर में कौन-सा रंग भरे।

उसी समय उसे अपनी मां सरला की कही बात याद आई—

“रिश्तों के रंग तब तक चमकते हैं, जब तक हम उन्हें संभालकर रखते हैं।”

मांसी ने गहरी सांस ली और फैसला किया कि वह अपने घर के फीके पड़ते रंगों को फिर से चमकदार बनाएगी।

अगले दिन वह अपने भाई अनमोल के पास गई। रोहन कमरे में मोबाइल में खोया हुआ था।

मांसी ने प्यार से कहा,

“अनमोल, क्या तुम्हें याद है मां कहती थीं कि हमारा घर एक इंद्रधनुष की तरह है?”

अनमोल ने चुपचाप उसकी तरफ देखा।

मांसी बोली,

“अगर हम ही उसके रंग मिटा देंगे, तो वह इंद्रधनुष कैसे रहेगा?”

अनमोल की आंखें नम हो गईं। शायद उसे भी मां की बहुत याद आ रही थी।

उस दिन के बाद मांसी रोज अपने भाई से बातें करने लगी। धीरे-धीरे अनमोल ने गलत दोस्तों से दूरी बनानी शुरू कर दी।

अब मांसी ने अपने पिता राकेश की तरफ ध्यान दिया।

पिता देर रात तक काम करते रहते थे। एक दिन मांसी उनके पास जाकर बोली,

“पापा, अगर आप ऐसे ही चुप रहेंगे तो घर और भी खाली हो जाएगा। मां तो चाहती थीं कि हम सब हमेशा खुश रहें।”

पिता राकेश की आंखें भर आईं। उन्होंने पहली बार मांसी के सिर पर हाथ रखा और कहा,

“बेटी, शायद मैं ही कमजोर पड़ गया था।”

उस दिन के बाद घर का माहौल धीरे-धीरे बदलने लगा।

कुछ महीनों बाद मांसी ने अपनी एक पेंटिंग प्रदर्शनी लगाने का फैसला किया। उसने कई नई पेंटिंग बनाई। लेकिन सबसे खास पेंटिंग का नाम था—“रिश्तों के भी रंग।”

उस पेंटिंग में एक परिवार दिखाया गया था। उसमें कुछ रंग बहुत चमकीले थे, कुछ हल्के और कुछ धुंधले।

प्रदर्शनी के दिन बहुत सारे लोग उसकी पेंटिंग देखने आए। एक महिला उस खास पेंटिंग के सामने खड़ी होकर बोली,

“इस पेंटिंग में इतने अलग-अलग रंग क्यों हैं?”

मांसी मुस्कुराई और बोली,

“क्योंकि रिश्ते हमेशा एक जैसे नहीं रहते। कभी वे खुशियों से भरे होते हैं, कभी दुख से धुंधले हो जाते हैं। लेकिन अगर हम उन्हें संभालने की कोशिश करें, तो उनके रंग फिर से चमकने लगते हैं।”

इतना कहकर मांसी ने अपने पिता राकेश और भाई अनमोल की तरफ देखा, जो गर्व से उसे देख रहे थे।

उस क्षण मांसी को लगा कि उसकी जिंदगी की तस्वीर फिर से रंगों से भर गई है।

उसे अपनी मां सरला की बात याद आई—

“रिश्तों के रंग कभी खत्म नहीं होते, बस कभी-कभी उन्हें फिर से भरने की जरूरत होती है।”

मांसी की आंखों में हल्की-सी नमी थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान भी थी। अब उसे समझ आ चुका था कि सच में रिश्तों के भी रंग होते हैं, और वही रंग जिंदगी को खूबसूरत बनाते हैं।

शीर्षक: रिश्तों के भी रंग

  निधि गुप्ता

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