आज मालती जी ने अपनी बहू सुमति को बार-बार अलमारी खोलकर कुछ ढूंढते हुए देखकर रूखे स्वर में बोल पड़ी। बहू आज तुम यह सुबह से अलमारी खोल कर बार-बार क्या ढूंढ रही हो। तुमने ऐसा कौन सा खजाना रख दिया था। जिसे तुम्हें इतनी ढूंढने की जरूरत पड़ गई है। जरा मैं भी तो जानू।
अपनी सास की बात सुनकर सुमति उनके चेहरे की ओर देखकर बोल पड़ी। मम्मी जी मैं वह पायल ढूंढ रही हूं। जिसे मेरी मम्मी ने मेरी एनिवर्सरी पर मुझे उपहार स्वरूप दिया था। वह क्या है ना जब चाचाजी की पच्चीसवीं वर्षगांठ पर मैं औरंगाबाद जा रही हूं तो सोचा वह पायल पहन कर चली जाऊं। मम्मी को बहुत अच्छा लगेगा।
सुमति की बात सुनते ही मालती जी तुरंत बड़ी बेपरवाही से बोल उठी। अरे वह पायल तो मैंने तुम्हारी ननद सोनी को दे दी। उसे बहुत पसंद आ गई थी,वैसे मुझे तो इतनी खास भी ना लगी थी ।
मगर क्या है ना बहू जब बेटी को पसंद आ जाए तो देना ही ठीक होता है, क्यों बेटी का मन दुखाना कह कर वो मुस्कुराने लगी।
अपनी सासू मां की यह बात सुनते ही सुमति को बहुत तकलीफ हुई। वह तुरंत दुखी मन से बोल उठी, मम्मी जी आपने मुझे पूछा भी नहीं और मेरी पायल सोनी दीदी को दे दी।
अरे इसमें पूछने वाली कौन सी बात है, एक पायल ही तो थी क्या अब तुम्हारे मायके की वस्तु पर मेरा कोई अधिकार नहीं है, या फिर सोनी का कोई अधिकार नहीं है ।
सुमति अपनी सासू मां की बात सुनकर फिर बोल उठी।
मम्मी जी कल को आपकी दी हुई कोई चीज सोनी दीदी की सास अपनी बेटी को दे दे, तो क्या सोनी दीदी को बुरा नहीं लगेगा और सच कहिए क्या आपको बुरा नहीं लगेगा।
देखिए मम्मी जी मायके से आई हुई चीज सिर्फ एक वस्तु नहीं होती । उसमें मायके का प्यार छुपा होता है। सच कहूं तो जो चीज उपहार स्वरूप जिसे दी जाती है। उसके अलावा उस पर किसी का अधिकार नहीं होता। हां अगर वह स्वयं अपने मन से देना चाहे तो वह अलग बात है ।
आप ही बताइए क्या आपके मायके की लाई हुई चीजों को आप मुझे इस्तेमाल करने का अधिकार देगी। नहीं ना।
सोनी दीदी को अगर वैसी ही चाहिए तो हम बाजार से लाकर दे सकते हैं। आप इस तरह मेरे मायके की दी हुई चीज को आप मेरे से बिना पूछे सोनी दीदी को नहीं दे सकती । सच कहूं तो इसे प्यार या अधिकार तो नहीं कह सकते हां अपने ओहदे यानि कि बड़े होने का गलत फायदा उठाने का नाम जरूर दे सकते हैं ।
सुमति की बात सुनते ही मालती जी गुस्से में बोल उठी।
अरे क्या जमाना आ गया है। अब बहुएं घर का हिसाब रखने लगी हैं अब बहू सासू मां को सीख देने लगी है कहकर तुरंत मालती जी गुस्से में अपने कमरे की ओर चल पड़ी।
राघव जी अपने कमरे में बैठे-बैठे दोनों सास बहू की बातें पूरी सुन चुके थे, जैसे ही उनकी पत्नी मालती जी ने कमरे में प्रवेश किया।
राघव जी तुरंत बोल उठे। हद हो गई है आज तो मालती, मैं बहुत दिनों से देख रहा हूं। जब भी सोनी यहां आती है उसे अपनी भाभी की ही चीजें पसंद आती है ऐसा क्यों? क्या बाजार में कोई सामान नहीं मिलता। कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम उसे ऐसा करने के लिए उकसाती हो । देखो मालती तुमने बहू की पायल बगैर पूछे सोनी को दे दी, यह बहुत गलत बात है।
देखो मालती पराए घर से किसी की बेटी को लाकर अपनी बहू बनाकर लाने का अर्थ उसे प्यार देना उसके स्वाभिमान का मान रखना,उसके मनपसंद का ख्याल रखना होता है ना कि उसके चीजों पर अपना अधिकार जमाना ।
अरे अधिकार जमाना ही है तो उसके दिल पर जमाओ । वह भी बड़े प्यार से ताकि तुम्हारी बहु गर्व से अपने मायके में किसी को कह सके कि मेरी सास इतनी अच्छी है।
जरा सोचो क्या तुम उसकी डायरी के किसी भी पन्नें में एक अच्छी सास बन पाई हो। शायद कभी नहीं और ना ही सोनी एक अच्छी ननद बन पाई है। देखो मालती सास बहू का रिश्ता हो या फिर ननद भाभी का रिश्ता हो । तुम घर की बड़ी हो तुम्हें तो अपनी बेटी और बहू के बीच प्यार के बीज को अंकुरित करना चाहिए ताकि दोनों के बीच दिन प्रतिदिन प्यार और समझदारी बढ़ती जाए क्योंकि इन रिश्तों में अधिकार और नफरत का क्या काम बल्कि मैं तो कहता हूं रिश्ते अधिकार से नहीं करुणा से निभते हैं। और जहां अधिकार आ जाए और करुणा खत्म हो जाए। वो रिश्ते टिकते ही कहां हैं।
ठीक कह रही थी बहू अगर कल को तुम्हारी दी हुई चीज तुम्हारी बेटी की सास अगर अपनी बेटी को दे दे, तो सोनी को कैसा लगेगा और सच-सच बताना तुम्हें कैसा लगेगा।
शायद मालती जी को अपनी गलती का एहसास हो गया था इसीलिए वो तुरंत राघव जी से बोल उठी। जी मुझे माफ कर दीजिए यह मेरी बहुत बड़ी भूल थी । यह सच है मैंने बहू के प्रति अपने अधिकार का इस्तेमाल किया मगर अब आप मेरे साथ बाजार चलिए कहीं देर ना हो जाए क्योंकि सोनी को दिया हुआ उपहार वापस लेना तो अब सही नहीं होगा।
मगर हां सुमती के औरंगाबाद जाने से पहले उसकी वैसी ही पायल मुझे लाकर उसे उपहार स्वरूप देनी है बल्कि उससे भी और कहीं ज्यादा खूबसूरत कहते हुए मालती जी राघव जी के साथ बाजार की ओर निकल पड़ी।
बाजार की ओर चलते हुए कदम आज उन्हें अपने बहुत हल्के महसूस हो रहे थे क्योंकि आज पति और बहू द्वारा मिली सीख उनके मन को अपार खुशी दे रही थी। वह यह अच्छी तरह समझ चुकी थी कि रिश्ते अधिकार से नहीं करुणा से निभते हैं।
स्वरचित
सीमा सिंघी
गोलाघाट असम