रवि के पिता जी और छवि के पिता जी साथ काम करते थे। दोनों एक ही दफ्तर में थे, एक ही छत के नीचे रोज़मर्रा की भागदौड़, फाइलों की गंध, चाय के छोटे-छोटे ब्रेक और दिन के अंत में घर लौटते समय का अपनापन—इन सबने उन्हें सिर्फ सहकर्मी नहीं, परिवार जैसा बना दिया था। रवि के पिता जी अक्सर कहते थे, “भाई, नौकरी तो है ही… पर इंसानियत न रहे तो सब बेकार।” और छवि के पिता जी भी हमेशा रवि के पिता की साफ़ नीयत और हिम्मत की इज्ज़त करते थे।
लेकिन किस्मत ने अचानक करवट ली। रवि के पिता जी की अचानक मौत हो गई। घर में जैसे बिजली गिर पड़ी—रवि की पढ़ाई/करियर की चिंता, मां का सहारा छिन जाने का भय, और भविष्य की अनिश्चितता… सब एक साथ आ खड़े हुए। वह समय बेहद कठिन था। जिन लोगों की भीड़ अंतिम संस्कार में दिखी, वही लोग कुछ दिन बाद अपने-अपने काम में व्यस्त हो गए। रवि और उसकी माता जी के लिए जीवन का सबसे बड़ा सवाल बस यही था—अब आगे कैसे?
ऐसे समय में छवि के पिता जी ने दोस्ती और इंसानियत का वह रिश्ता निभाया जो बहुत कम लोग निभाते हैं। छवि के पिता जी की मदद से रवि की नौकरी और उनकी माता जी की पेंशन लग गई। उन्होंने कागज़ी कार्रवाई समझाई, दफ्तर के चक्कर कटवाए, और जहाँ-जहाँ रवि की पकड़ कमजोर थी, वहाँ अपने अनुभव का हाथ रख दिया। रवि की मां जब पहली बार पेंशन का मैसेज/रसीद देखकर रो पड़ीं, तो वह राहत के आँसू थे—कम से कम अब भूख का डर नहीं था, और बेटे का भविष्य पूरी तरह अंधेरे में नहीं गया था।
अब दोनों परिवारों में गहरे विश्वास का रिश्ता स्थापित हो गया। यह रिश्ता कोई औपचारिक “आना-जाना” नहीं था; यह एक ऐसा जुड़ाव था जिसमें हर छोटा-बड़ा सुख-दुख साझा होने लगा। छवि के घर रवि का आना-जाना बढ़ गया। कभी वह छवि के पिता जी से सलाह लेने आता, कभी उनके साथ बैठकर अख़बार पढ़ता, कभी उनके किसी काम में हाथ बँटा देता। छवि की मां भी रवि को बेटे जैसा ही मानने लगीं—“बेटा, खाना खाकर जाना” जैसे शब्द रवि के लिए रोज़ की बात हो गए।
एक शाम रवि छवि के पिताजी से मिलने आया। उस दिन रवि के मन में न जाने क्यों एक बेचैनी थी—शायद अपने पिता की कमी का अहसास, या फिर उस परिवार के प्रति कृतज्ञता जिसने उसे संभाला था। छवि के पिता जी अभी काम से लौटकर नहीं आए थे और छवि घर पर नहीं थी। अंधेरा हो रहा था। घर में हल्की-हल्की रोशनी जल चुकी थी। दरवाज़े पर हवा की सरसराहट थी और मोहल्ले के बच्चे अपनी-अपनी खेल की आवाज़ों के साथ घर लौट रहे थे।
रवि ने पूछा छवि कहां है? छवि की माता जी ने बताया कि छवि आटे की चक्की से आटा लेने गई है। रवि ने उन से कहा कि इस काम के लिए उसे बोल देते। उसकी आवाज़ में चिंता थी, जैसे वह सचमुच घर का कोई जिम्मेदार सदस्य हो।
इतना कहकर रवि छवि को लेने चला गया। रास्ते में उसे लगा कि शाम जल्दी ढल गई है। मोहल्ले के कोने-कोने में स्ट्रीट लाइटें जल तो रही थीं, पर कई जगह अंधेरा अभी भी गाढ़ा था। उसे अपने पिता की कही कोई पुरानी बात याद आ गई—“बेटा, दुनिया जैसी दिखती है वैसी होती नहीं, सतर्क रहना।”
छवि कालोनी के गेट से प्रवेश कर रही थी। उसके हाथ में साइकिल थी, साइकिल की टोकरी में आटे का पैकेट रखा था। उसने सिर पर दुपट्टा ठीक से नहीं लिया था, बस हवा से बचाने के लिए हल्का-सा ओढ़ रखा था। रवि ने उसे देखते ही कदम तेज़ कर दिए। रवि ने उसके हाथ से साइकिल पकड़ ली और उस से कहा कि आज के बाद वह अंधेरे में कहीं नहीं जाएगी। छवि एक पल के लिए चौंक गई। उसे लगा जैसे कोई अपना उसे टोक रहा है—किसी दावे के साथ नहीं, अधिकार के साथ नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के साथ।
छवि को ऐसा लगा जैसे उसे बड़ा भाई मिल गया है। उसके मन में एक अजीब-सी सुरक्षा का एहसास भर गया। उसने सोचा भी नहीं था कि किसी दिन कोई उसे यूँ कहेगा—“आज के बाद…” जैसे उसकी चिंता अब किसी की अपनी चिंता हो।
घर लौटकर रवि ने छवि के माता-पिता से कहा कि वे लोग उसे अंधेरे में अकेले नहीं भेजेंगे। छवि के पिता ने कहा कि उन्होंने छवि की परवरिश बेटे की तरह की है। उनके स्वर में गर्व था—उन्होंने कभी छवि को कमजोर नहीं माना, उसे पढ़ाया, समझाया, आत्मनिर्भर बनने को कहा, और उसे हर काम करने दिया जो समाज आमतौर पर बेटों के लिए “आरक्षित” मानता है।
रवि ने कहा बहुत अच्छी बात है पर दुनिया की नजर में छवि एक लड़की ही रहेगी। यह वाक्य किसी ताने की तरह नहीं, बल्कि उस कड़वे यथार्थ की तरह था जिसे वह खुद अनुभव कर चुका था। पिता जी ने कहा कि वह कौन होता है? उनके और उनकी बेटी के बीच में आने वाला। उन्होंने छवि को हमेशा मजबूत बनाया है। कोई उसे कमजोर होने का अहसास कैसे दिला सकता है? पिता जी के भीतर का पिता बोल रहा था—अपनी बेटी के लिए ढाल बनकर।
तब रवि ने कहा कि वह छवि का बड़ा भाई है। वह छवि के साथ रहे या न रहे पर छवि अंधेरे में कहीं नहीं जाएगी। अपने काम दिन में खत्म करें। फिर भी यदि जरूरत पड़े तो उसे आवाज दे दीजिए। वह सामान लाकर देगा। पिता जी के पास कोई उत्तर नहीं था। छवि अचंभित यह सब देख रही थी। उसके लिए यह सब नया था—किसी का यूँ कहना कि “मैं हूँ।” और वह भी ऐसे समय में जब दुनिया अक्सर “तुम खुद संभाल लो” कहकर पीछे हट जाती है।
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छवि के पिता जी ने पहली बार महसूस किया कि उनकी “मजबूती” वाली परवरिश और “सावधानी” वाली दुनिया दोनों अलग-अलग बातें हैं। मजबूत बनाना जरूरी है, पर खतरों को अनदेखा करना बहादुरी नहीं। पहली बार पिता जी को कोई यह समझा पाया था कि जरूरत हो तब भी अंधेरे में लड़कियों को बाहर नहीं भेजना चाहिए। उसके कानों में बार-बार यही शब्द गूंज रहे थे कि “मैं इसका बड़ा भाई हूं। “
और छवि के मन में भी यह वाक्य किसी नए रिश्ते की मुहर बन गया था—बिना खून के, बिना औपचारिकता के, सिर्फ भाव से।
समय बीतने लगा। रवि की नौकरी स्थिर हो गई। छवि की पढ़ाई/जीवन भी अपने रास्ते चल रहा था। दोनों घरों में एक आत्मीयता बनी रही। कभी छवि की मां रवि को उसके पसंद का खाना दे देतीं, कभी रवि छवि के पिता जी के लिए दवा लाकर रख देता। छोटे-छोटे कामों में रिश्ते गहरे होते जाते हैं।
राखी का दिन था। सुबह का समय था। घर में त्योहार की हलचल थी—मिठाई की खुशबू, नए कपड़ों की आहट, और पूजा की थाली की खनक। छवि के घर की घंटी बजी। दरवाजा खोला तो सामने रवि भईया खड़े थे। छवि ने उत्सुकता से पूछा,”भईया आप इतनी सुबह- सुबह?
तो रवि ने उस से कहा कि जल्दी से राखी बांध दे और एक कप चाय पिला दे। डियूटी जाना है।
छवि के चेहरे पर एक मीठी-सी मुस्कान फैल गई। पहली बार उसे लगा कि राखी सिर्फ रस्म नहीं, एक अपनापन है। छवि ने अपने बड़े भाई को पहली बार राखी बांधी, फिर चाय बनाकर लाई। भईया चाय पीकर डियूटी पर चले गए। जाते-जाते रवि ने बस इतना कहा, “शाम को फोन कर दूँगा।” और छवि देर तक दरवाज़े पर खड़ी रही, जैसे अपने जीवन में एक नया रिश्ता जुड़ते देख रही हो।
अगली राखी पर रवि भईया ने छवि को अपने घर बुलाया और कहा कि रीति अनुसार उनके घर आकर राखी बांधा करे। छवि को यह सुनकर गर्व भी हुआ और खुशी भी—भाई ने उसे अपने घर का हिस्सा माना था। उसने नए कपड़े पहने, मिठाई ली, और भाई के घर राखी बाँधने गई। उस घर में भी उसे अपनापन ही मिला—कम से कम तब तक।
फिर रवि भईया का विवाह हो गया। भाभी सुन्दर, सुशील और प्यारी आई। घर में खुशियाँ बढ़ गईं। छवि ने भी मन से भाभी का स्वागत किया। उसे लगा अब रिश्ता और मजबूत होगा—भाई का घर बस गया, सब कुछ अच्छा होगा।
विवाह के बाद छवि राखी बांधने गई तो भईया घर पर नहीं मिले। छवि निराश लौट आई। उसे लगा शायद काम होगा, निकल गए होंगे। पर मन में थोड़ी कसक रह गई—पहली बार ऐसा हुआ था कि वह राखी लेकर लौटी थी, कलाई सूनी रह गई थी। कुछ दिन बाद रवि भईया घर आए और बताया कि भाभी की तबीयत ठीक नहीं थी। वह अपने मायके में है और वह वहीं गए थे। छवि ने भाई को खुशी -खुशी राखी बांधी। उसे लगा बात समझ में आ गई—भाभी बीमार थीं, भाई साथ गया, यह तो स्वाभाविक है। छवि ने दिल से उस बात को स्वीकार किया।
समय आगे बढ़ा। अब रवि भईया के घर एक छोटी सी गुड़िया भी आ गई थी। घर में नन्हे कदमों की आवाजें थीं, खिलौनों की बिखरी दुनिया थी। सब खुश थे। छवि भी खुश थी—भाई के घर बेटी हुई, यह तो और भी प्यारा रिश्ता बन गया।
लेकिन राखी के दिन जब छवि राखी बांधने गई तो भाभी ने छवि से कहा कि उसे आने की जरूरत नहीं थी राखी तो गुड़िया ने ही बांध देनी थी।
भाभी के शब्द शायद उनके लिए साधारण हों, या उन्होंने हँसी में कह दिया हो, पर छवि के लिए वह बात किसी तेज़ कांटे की तरह चुभ गई। छवि को लगा कि जैसे उसके आने की जरूरत ही नहीं, जैसे उसकी राखी का महत्व ही नहीं।
छवि के आत्मसम्मान पर यह बहुत बड़ी चोट थी। उसने भरे हुए मन से भाई को राखी बांधी और इस प्रण के साथ लौट आई कि अब कभी वह राखी बांधने उनके घर नहीं जाएगी।
उस दिन रास्ते भर छवि ने खुद से कई बातें कीं। उसने सोचा—“मैंने तो कभी किसी से कुछ माँगा नहीं, बस भाई का स्नेह चाहा था।” लेकिन जब शब्दों से चोट लग जाए तो मन झट से दीवार खड़ी कर लेता है। छवि ने वही किया।
अगले वर्ष रवि भईया इन्तजार करते रहे पर छवि राखी बांधने नहीं गई। रवि भईया ने अपनी बेटी से भी राखी नहीं बंधवाई। भाभी को अपनी ग़लती का अहसास हुआ।
भाभी ने समझ लिया कि उन्होंने जो कहा, वह छवि के मन पर भारी पड़ गया। उन्होंने छवि से माफी मांगी और राखी बांधने को कहा पर छवि नहीं मानी। उसने कहा कि अगर रवि भईया को राखी बंधवानी है तो उन्हें स्वयं ही आना पड़ेगा।
छवि का स्वर अब कठोर था—वह खुद को कमजोर नहीं दिखाना चाहती थी। उसने अपने आत्मसम्मान का पहरा लगा लिया था।
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भाभी ने रवि भईया से बात की तो उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि उनकी कोई ग़लती न होने पर भी उन्हें सजा मिली। इस कलाई पर राखी तो सिर्फ छवि ही बांध सकती है और वह यहां आकर ही बांधेंगी।
रवि अपने भीतर से भी आहत था। उसे लगा कि उसने तो हमेशा छवि को बहन माना, उसका ख्याल रखा, फिर वह क्यों न आए? उसका मन भी अपनी जगह अड़ गया।
इसी तरह वक्त बीतता चला गया। एक तरफ छवि अपने आत्मसम्मान के कारण नहीं झुकी, दूसरी तरफ रवि अपनी बात पर अड़ा रहा कि “गलती मेरी नहीं।” दोनों के बीच वही कच्चा धागा था, पर धागे पर अहं और चोट की गांठें पड़ती जा रही थीं। कभी-कभी छवि का मन होता कि चलकर राखी बाँध दे, पर फिर वह भाभी का वाक्य याद करती और खुद को रोक लेती। उधर रवि भी कभी-कभी सोचता कि बहन को लेने चला जाए, पर फिर मन कहता—“मैं क्यों जाऊँ, जब मैं गलत नहीं?”
और फिर एक दिन सब कुछ बदल गया—बिना चेतावनी, बिना मौका दिए।
इस बात का पता छवि को तब चला जब उसका भाई सूनी कलाई लेकर इस दुनिया से रुखसत हो चुका था। रवि ने ताउम्र अपनी कलाई के लिए छवि की राखी का इंतजार किया। छवि के पास अब पश्चाताप के सिवाय कुछ नहीं बचा था।
जब छवि को खबर मिली, उसके हाथ से फोन गिरते-गिरते बचा। उसे लगा जैसे किसी ने उसकी सांसें रोक दी हों। वह भागी-भागी रवि के घर पहुँची, पर वहाँ “भईया” नहीं थे—बस लोगों की भीड़ थी, रोते चेहरे थे, और एक सूनी-सी खामोशी थी।
छवि की नजर अनायास रवि की कलाई पर गई—उस कलाई पर जहाँ कभी उसने पहली बार राखी बाँधी थी। आज वही कलाई… सूनी थी। छवि के भीतर कुछ टूट गया। वह सोचती रही—काश एक बार… बस एक बार… मैं चली जाती। काश मेरे आत्मसम्मान की दीवार थोड़ी-सी झुक जाती। काश भाई भी एक कदम चल देता।
पर “काश” जीवन को वापस नहीं लाता।
दोनों भाई बहन अपने अपने आत्मसम्मान के लिए कच्चे धागे के पक्के रिश्ते को जीते जी खो बैठे।
राखी का धागा तो कच्चा होता है, पर उसका रिश्ता पक्का—बहुत पक्का। और जब वही रिश्ता चोट और जिद की भेंट चढ़ जाए, तो उम्र भर सिर्फ खालीपन बचता है।
स्वरचित मौलिक रचना
डॉ हरदीप कौर (दीप)