विनोद जी ने बहुत दौलत कमाई थी। मेहनत, लगन और अपने तेज़ दिमाग से उन्होंने अपना कारोबार गाँव-शहर तक फैला दिया था। लोगों की नज़र में विनोद जी की ज़िंदगी किसी राजा से कम नहीं थी—बड़ा सा घर, प्रतिष्ठा, नौकर-चाकर, और चारों तरफ़ नाम। पर उनके दिल के किसी कोने में एक मलाल हमेशा चुभता रहता… **उनके कोई बेटा नहीं था।**
एक के बाद एक तीन लड़कियाँ हो गईं। पहली बेटी हुई तो घर में खुशी भी थी, पर साथ ही रिश्तेदारों की फुसफुसाहटें भी शुरू हो गईं—“चलो, अगली बार बेटा हो जाएगा।” दूसरी बेटी हुई तो कुछ लोग मुस्कुरा कर बधाई दे गए, पर कईयों की आँखों में दया और तंज दोनों थे—“अब तो बेटा होना चाहिए।” विनोद जी बाहर से हँस देते, लेकिन भीतर कहीं यह बात बैठने लगी थी कि “लड़का ही बुढ़ापे का सहारा है।”
तीसरी बेटी के समय तो हालात और भी कठिन हो गए। प्रसव के दौरान सुधा जी को गर्भाशय में दिक्कत हो गई। घर में हड़कंप मच गया। अस्पताल की भागदौड़, डॉक्टरों की चिंता, विनोद जी का काँपता दिल—सब कुछ जैसे एक साथ टूट पड़ा। जैसे-तैसे माँ-बेटी की जान बची। डॉक्टर ने साफ कह दिया—
“देखिए, अब अगर दोबारा माँ बनीं तो जान बचाना मुश्किल है।”
यह सुनकर विनोद जी भीतर तक हिल गए। उन्हें अपनी पत्नी की जान प्यारी थी, परिवार प्यारा था। उन्होंने उसी समय फैसला कर लिया और ऑपरेशन करा दिया। बाहर उन्होंने यही कहा कि “डॉक्टर ने सलाह दी है,” लेकिन भीतर कहीं उनकी आँखें भीग गई थीं—क्योंकि अब उनके “बेटे की उम्मीद” पर भी जैसे ताला लग गया था।
सुधा जी को भी अफसोस होता कि वो अपने पति को बेटा नहीं दे पाई। ऐसा नहीं था कि वो अपनी बेटियों को प्यार नहीं करतीं—उनकी तीनों बेटियाँ उनकी दुनिया थीं। पर जो उन्होंने शुरू से देखा, सुना—कि “लड़का ही बुढ़ापे की लाठी है”—तो उन्हें भी यही लगता कि एक बेटा हो जाता तो अच्छा होता। कई बार वो रात के सन्नाटे में छत की तरफ देखते हुए मन ही मन रो पड़तीं। विनोद जी भी कभी-कभी बेटियों को देखकर गर्व करते, तो कभी किसी के ताने पर भीतर से टूट जाते।
पर किस्मत ने भी जैसे विनोद जी को जवाब देना तय कर लिया था। बेटियाँ लक्ष्मी का रूप लेकर आई थीं। विनोद जी का कारोबार चौगुना हो गया। उनके व्यापार में इतनी तरक्की हुई कि आसपास उनकी कीर्ति फैल गई। लोग कहते—“देखो विनोद जी, बेटियाँ तो घर की लक्ष्मी होती हैं।” जो लोग पहले ताने देते थे, वही अब बधाई और तारीफ के शब्द बोलते।
समय अपनी चाल चलता रहा। बेटियाँ स्कूल जाने लगीं, घर में हँसी-खुशी बढ़ गई। सुधा जी के चेहरे पर भी अब पहले से ज्यादा सुकून रहने लगा। फिर भी—विनोद जी के भीतर कहीं वो चाह बाकी थी, जिसे वो खुद भी खुलकर स्वीकार नहीं करते थे।
इसी बीच एक दिन विनोद जी का छोटा भाई **सुबोध** उनसे मिलने आया। सुबोध के तीन बेटे थे। वह एक-दो दिन घर पर रुका। विनोद जी उसे देखकर बहुत खुश हुए। भाई-भाई की बातें हुईं, पुराने दिन याद आए, खाना साथ खाया गया। सुबोध घर में अपने तीनों बेटों की बातें करता, उनकी शरारतें बताता, और विनोद जी उसकी बातें सुनकर मुस्कुराते जरूर, पर उनकी आँखों में एक अजीब-सी चमक भी आ जाती।
बातों-बातों में सुबोध जान गया कि भैया को लड़के की चाह अभी भी है। उसने महसूस कर लिया कि भैया चाहे जितनी भी तरक्की कर लें, उनके दिल में एक “अधूरापन” बैठा हुआ है। उसी रात सुबोध के मन में एक अलग ही चाल ने जन्म लिया।
वापस जाकर उसने अपनी पत्नी **प्रेमा** से बात की—
“अगर हम अपना बेटा उन्हें दे दें तो पूरी संपत्ति का वो मालिक हो जाएगा।”
प्रेमा के मन में भी लालच आ गया। दोनों ने सोचा—भैया के पास धन-दौलत बहुत है, बेटा नहीं है। अगर हम अपना छोटा बेटा उन्हें दे दें, तो कल को सारी संपत्ति उसी के नाम हो जाएगी—और असल में फायदा हमारा ही होगा। वे दोनों अपने मन में इस योजना को “भलाई” का नाम देने लगे—कि “भैया का दुख भी मिटेगा” और “हमारा भविष्य भी बन जाएगा।”
कुछ ही दिनों में दोनों फैसला करके अपने **छोटे बेटे मोहित** को लेकर विनोद जी के पास आ गए।
घर में आते ही प्रेमा ने मोहित को अच्छी तरह तैयार कर रखा था। सुबोध ने बड़े आदर से विनोद जी के चरण छुए, फिर अपने साथ लाए मोहित को आगे किया। मोहित कुछ समझ नहीं पा रहा था—बस इतना जानता था कि ताऊजी का घर बड़ा है, यहाँ सब उसे प्यार करते हैं, और वह यहाँ “मेहमान” बनकर आया है।
सुबोध बोला—
“भैया, आपका दुख मुझसे देखा नहीं जा रहा। आज से मेरा बेटा आपका हुआ। आप इसे संभालिए।”
यह सुनकर विनोद जी चौंक गए। एक पल को उनकी सांस अटक गई। उनका मन भीतर ही भीतर खुश भी हो गया था—जैसे वर्षों की चाह अचानक दरवाज़ा खोलकर सामने खड़ी हो गई हो। मगर वे तुरंत संभल गए।
विनोद जी ने गंभीर स्वर में कहा—
“मैं एक माँ से उसके बच्चे को दूर नहीं कर सकता।”
प्रेमा तुरंत आगे बढ़ी, आँखों में बनावटी भावुकता और आवाज़ में मीठापन लेकर बोली—
“किसी अजनबी को थोड़ी दिया है। आप भी उसके पिता ही है और भाभी मां। बस आप अपना लीजिए।”
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बहुत मनुहार के बाद विनोद जी मान गए। उन्होंने मोहित को अपना बेटा मान लिया—इस उम्मीद के साथ कि बुढ़ापे में, विपत्ति में सहारा बनेगा। सुधा जी की आँखों में भी एक अजीब-सा भाव था—खुशी भी, डर भी। उन्होंने मोहित को अपने पास बैठाया, माथा चूमा, और मन ही मन कहा—“अब घर पूरा हो गया।”
मोहित को तीनों बहनें जी-जान से चाहने लगीं। उसके लिए खिलौने, कपड़े, किताबें—सब। तीनों बहनों को लगता था कि अब उनका एक भाई है जिसे वे रक्षाबंधन पर राखी भी बाँधेंगी, जिसे वे बचपन की शरारतों में साथ ले जाएँगी, जिसके लिए वे दुनिया से लड़ जाएँगी। विनोद जी और सुधा जी भी खुश थे। अब परिवार उन्हें पूरा लग रहा था।
समय गुजरता रहा। सब बच्चे बड़े हो गए। मोहित भी नए घर में खुश था। उसे सबका प्यार मिल रहा था। ताऊजी उसके लिए पिता बन गए, ताईजी उसके लिए माँ। बहनों का दुलार उसे हर कमी से भर देता। उसे लगता कि यह घर सिर्फ ईंट-पत्थर का नहीं, रिश्तों का घर है।
लेकिन सुबोध और प्रेमा बीच-बीच में उसके कान भरते रहते—
“तुम्हें सिर्फ दौलत के लिए उस घर में भेजा है।”
“देखना, वही घर तुम्हारा है, वही संपत्ति तुम्हारी है।”
“ताऊजी ने तुम्हें इसलिए अपनाया क्योंकि उनके पास बेटा नहीं था।”
पहले-पहले मोहित इन बातों को सुनकर उलझ जाता। उसे लगता—“मुझे तो यहाँ प्यार मिलता है, फिर ये लोग ऐसा क्यों बोल रहे हैं?” धीरे-धीरे उसने दोनों तरफ़ का सच देखना शुरू किया। एक तरफ़ ताऊजी और उनका परिवार, जो उसे दिल से अपनाता था, उसकी जरूरतों, भावनाओं, पढ़ाई—हर चीज़ का ध्यान रखता था। दूसरी तरफ़ उसके अपने माता-पिता—जिन्होंने उसे “संपत्ति” के लिए अपने से दूर कर दिया था।
मोहित को समझ आ गया—**मैं उनकी चाल कामयाब नहीं होने दूंगा।**
उसकी सोच साफ होती गई। उसे लगा कि अगर वह लालच के रास्ते चला तो वह उन लोगों जैसा बन जाएगा जिनसे उसे घृणा हो गई है। और अगर उसने सच का साथ दिया तो शायद रिश्ते बच जाएँ।
एक दिन मोहित ने हिम्मत करके सारी बात ताऊजी यानी विनोद जी को बता दी। वह उनके सामने बैठा, आँखें झुकी हुईं, आवाज़ में सच्चाई का भार लिए बोला—
“ताऊजी… मुझे आपसे कुछ कहना है।”
विनोद जी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा—“बोल बेटा, क्या बात है?”
मोहित ने धीरे-धीरे सब बता दिया—कैसे उसके माता-पिता उसे बार-बार कहते हैं कि उसे सिर्फ दौलत के लिए यहाँ भेजा गया है, कैसे वे उसे उकसाते हैं कि संपत्ति पर नजर रखे, और कैसे वह इस सोच से परेशान हो गया है।
फिर मोहित ने वह बात कह दी जिसने विनोद जी के दिल को एक साथ खुशी और दर्द दोनों से भर दिया—
“आप चाहे तो मुझे निकाल सकते हैं… लेकिन मैं दौलत के लिए नहीं, प्यार के लिए यहाँ हूँ।”
ये सुनकर विनोद जी बहुत खुश हुए… साथ ही दुख भी हुआ कि उनका भाई उन्हें धोखा दे रहा था। उन्हें पहली बार साफ दिख गया कि सुबोध और प्रेमा ने जिस “भलाई” का मुखौटा पहना था, उसके पीछे लालच छिपा था।
विनोद जी की आँखें नम हो गईं। उन्होंने मोहित को गले लगा लिया।
“बेटा… तू मेरा बेटा है। तुझे निकालने की बात मेरे मन में भी कैसे आ सकती है? तूने आज साबित कर दिया कि रिश्ते खून से नहीं, नीयत से बनते हैं।”
उस दिन विनोद जी ने बड़ा फैसला लिया। उन्होंने सुबोध से सारे रिश्ते तोड़ लिए। यह फैसला उनके लिए आसान नहीं था—आखिर भाई था। लेकिन जब भाई ने ही भरोसा तोड़ा, तो विनोद जी ने भी अपने दिल पर पत्थर रखकर उसे दूर कर दिया।
और बेटे को भी कागजी कार्यवाही करके अपना नाम दे दिया। अब मोहित सिर्फ भावनाओं से नहीं, कागजों में भी विनोद जी का बेटा बन गया। परिवार ने राहत की सांस ली। सुधा जी ने मोहित के माथे पर हाथ रखकर कहा—“बेटा, तूने हमें शर्मिंदा नहीं किया, हमें गर्व दिया है।” तीनों बहनों की आँखें भी भर आईं—उन्हें लगा, उनका भाई सच में उनका अपना है।
उधर सुबोध और प्रेमा को अब अहसास हुआ कि जो रिश्ता खुद की विपत्ति बांटने के लिए बनाया था वो संपत्ति के चक्कर में बंट गया। उनके हाथ से संपत्ति के चक्कर में बेटा भी चला गया।
स्वरचित
अंजना ठाकुर