अधूरे रिश्ते – किरण फुलवारी

ट्रेन में बैठी ख्याति के मन में कई सारे विचार चल रहे थे। खिड़की के बाहर पीछे छूटते खेत, दूर भागती बिजली की तारें और स्टेशन के छोटे-छोटे बोर्ड—सब जैसे उसके भीतर उठते तूफान के सामने फीके पड़ गए थे। रक्षाबंधन के एक दिन पहले ही वह अपने पीहर आई थी, बड़े भाई के बुलाने पर। भाई ने स्वयं फोन करके रक्षाबंधन पर बुलाया था। “इस बार जरूर आना, छोटी… सब लोग इकट्ठे होंगे,” भाई की आवाज़ में अपनापन था, इसलिए खुशी-खुशी वह घर जाने के लिए रवाना हुई थी। उसे क्या पता था कि रक्षाबंधन के दिन भाई रक्षा सूत्र बंधाने के साथ ही आज उपहार स्वरूप उससे कुछ ऐसा मांगेंगे जिसकी उसने कल्पना तक नहीं की।

ट्रेन की सीट पर बैठी ख्याति बार-बार अपने पर्स की चैन ठीक कर रही थी, जैसे बाहर की हलचल से ज़्यादा भीतर की बेचैनी उसे परेशान कर रही हो। उसे याद आ रहा था कि घर जाने से पहले उसने कितने उत्साह से नई राखियाँ खरीदी थीं—एक बड़े भाई के लिए, एक दूसरे भाई के लिए, और मन ही मन उसने तय कर लिया था कि इस बार मां के लिए भी कुछ खास ले जाएगी। जब-जब त्योहार आता, पीहर की तरफ खिंचाव अपने आप बढ़ जाता। वहां जाना सिर्फ एक यात्रा नहीं होता था, अपने बचपन में लौटना होता था। लेकिन आज उसी पीहर की याद में मिठास कम और कसक ज्यादा थी।

विचारों में डूबी ख्याति को याद आ रहा था, तीन साल पहले ही तो पापा के जाने के बाद घर में कितना कुछ बदल रहा था। बिना पापा के घर सूना-सूना लगता था। वही आँगन, वही दीवारें, वही बरामदा—पर हर चीज़ में एक खालीपन घुस आया था। पापा के बिना घर का “सहारा” जैसे हट गया था। मम्मी, पापा को याद कर-कर के रोने लगती थी। कभी रसोई में बर्तन धोते-धोते उनकी आँखें भीग जातीं, तो कभी पूजा के सामने दिया जलाते-जलाते उनकी आवाज़ भर्रा जाती। ख्याति के मन में वो दृश्य आज भी ताज़ा था—मम्मी का कांपता हुआ हाथ, पापा की तस्वीर के सामने रखा फूल, और घर में पसरा हुआ भारी सन्नाटा।

दो बड़ी बहनें व दो बड़े भाई—और मैं सबसे छोटी, ख्याति बहुत भावुक थी। बचपन में जब भी कोई डर लगता, ख्याति सीधे पापा के पास भाग जाती। पापा उसे गोद में बिठाकर कहते, “डर तो बस मन की बात है बेटी, मन मजबूत हो तो सब आसान हो जाता है।” पर पापा के जाने के बाद मन को मजबूत करना सबसे मुश्किल हो गया था। उस समय बड़े भाई-बहन सब आए थे, रोए थे, ढांढस बंधाया था, पर कुछ दिनों में सबको अपने-अपने घर लौटना था। ज़िंदगी फिर अपनी चाल चलने लगी और मां उसी घर में रह गईं—यादों के साथ, जिम्मेदारियों के साथ, और धीरे-धीरे बढ़ती अकेलेपन की चुप्पी के साथ।

सभी भाई बहनों की शादी हो चुकी थी व सभी अपनी-अपनी घर गृहस्थी में व्यस्त थे। हम तीनों बहनें अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गईं। त्यौहार-बार अपने पीहर जाती और मां, परिवार से मिलकर वापस आ जाती। घर आते ही फिर वही रोज़मर्रा, वही जिम्मेदारियां। बहनों की दुनिया अपने-अपने घरों में बंट गई थी, मगर पीहर का रिश्ता भीतर कहीं उसी तरह जुड़ा रहता था। दोनों भाई भी व्यस्त होते थे तो कुछ ज्यादा बातचीत नहीं हो पाती। कभी-कभी फोन पर दो मिनट की बात—“हां सब ठीक?” “हां, तुम बताओ”—और कॉल कट जाती। ख्याति को लगता, पहले जो घंटों बातें होती थीं, अब वही बातें एक-दो वाक्यों में सिमट गई हैं।

पापा के नाम से दो घर थे। पापा के रहते हुए ही सबको पता था कि यह घर परिवार के लिए हैं—एक घर में मां रहती थीं, दूसरे को किराये पर दिया गया था या जरूरत के हिसाब से उपयोग होता था। पापा ने कभी संपत्ति को लेकर घर में तनाव नहीं आने दिया। वे हमेशा कहते, “बच्चों, घर से बड़ा रिश्ता होता है। रिश्ता बचा तो सब बचा।” लेकिन पापा के जाने के बाद मानो वही चीज़ें—जो पहले केवल ‘सुरक्षा’ थीं—धीरे-धीरे ‘विवाद’ की वजह बनने लगीं।

दोनों भाइयों ने आपसी रजामंदी से दोनों घर अपने-अपने नाम करवाने का स्वयं निर्णय ले लिया। जिस घर की कीमत अधिक थी, उस घर की निश्चित कीमत एक भाई, दूसरे भाई को अदा कर देगा—ऐसा उन दोनों ने ही आपसी सहमति से निर्णय ले लिया और कागजात वगैरह भी बनाकर तैयार कर लिए। सुनने में यह सब बहुत “सिस्टम” जैसा लगता था—जैसे कोई साधारण लेन-देन हो। पर ख्याति के लिए यह केवल कागज नहीं थे; यह पापा की यादों का नक्शा था, मां की छत का भरोसा था, और पीहर की जड़ों का सवाल था।

मां रमा देवी जी पढ़ी-लिखी नहीं थी। उन्हें कागजों की भाषा समझ नहीं आती थी। बेटे उनसे ज्यादा कुछ पूछते नहीं। कोई भी काम होता तो कह देते—“यह इस चीज़ के कागज हैं मां, तुम हस्ताक्षर कर दो।” और उनकी मां हस्ताक्षर कर भी देती थी। मां का विश्वास अपने बेटों पर अटूट था। उन्हें लगता, बेटा जो कह रहा है, ठीक ही होगा। आखिर बेटा है—क्यों गलत करेगा?

किन्तु आज… आज तो हद हो गई। जब दोनों भाइयों ने आपसी निर्णय से दोनों घर अपने-अपने नाम करवाने का निश्चय कर लिया और तीनों बहनों को रक्षाबंधन पर बुलाकर उन कागजातों पर हस्ताक्षर करने को कहने लगे। यह बात ख्याति को याद आते ही उसकी छाती में अजीब-सी जलन उठी। रक्षाबंधन… जिस दिन बहन भाई की कलाई पर राखी बांधकर उसके जीवन की रक्षा का वचन मांगती है—उसी दिन भाई बहन से कागज़ पर हस्ताक्षर मांग रहा था। रिश्ते का अर्थ जैसे उलट गया था।

रक्षाबंधन की सुबह ख्याति ने बड़े जतन से राखी की थाली सजाई थी। मां ने भी पूजा का सामान रखा था। घर में त्यौहार की हलचल तो थी—पर उस हलचल के पीछे एक छिपी हुई जल्दी भी थी, एक अनकहा उद्देश्य भी। बहनें आईं तो मां ने पहले उन्हें गले लगाया, उनके सिर पर हाथ रखा। “आई हो बेटा?” कहते हुए मां की आँखें भीगी थीं। मां के चेहरे पर खुशी थी, पर भीतर कहीं चिंता भी। ख्याति ने मां की हथेलियों को पकड़ा तो महसूस किया कि मां के हाथ पहले से ज्यादा कांपने लगे हैं। शायद डर का कांपना, शायद समय का।

जब राखी बांधने का समय आया, ख्याति ने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा। भाई ने हाथ आगे किया, मुस्कुराया भी, पर उसकी नजरें बार-बार कमरे में रखी फाइलों की तरफ जा रही थीं। राखी बंध गई, आरती हो गई, बहनों ने मिठाई खिलाई। मां ने भी दुआ दी। पर उत्सव की मिठास पूरी तरह घुलने से पहले ही दोनों भाइयों ने बात छेड़ दी—“मां, बहनें, ये कागज़ हैं… बस हस्ताक्षर कर दीजिए। आज सब लोग हैं, इसलिए काम निपट जाए।”

उस पल घर में जैसे हवा रुक गई। मां और बहनों की आंखों में आंसू थे कि अभी पापा को गए हुए तीन साल ही हुए थे और इतनी जल्दी क्या है?? दोनों को हस्ताक्षर कराने की। मां का चेहरा एकदम सूख गया। उन्होंने फाइल की तरफ देखा, फिर बेटों की तरफ। मां ने धीरे से पूछा, “बेटा… ये क्या कागज हैं? और इतनी जल्दी क्यों? मैं… मैं समझना चाहती हूँ।”

दोनों भाइयों ने मां को समझाने की कोशिश की, पर मां के सवाल बढ़ते गए। मां ने दोनों पुत्रों को कुछ प्रश्न पूछे किंतु दोनों ने संतुष्टि जनक जवाब नहीं दिए। जवाबों में जल्दबाज़ी थी, टालना था, और “मां आपको समझ नहीं आएगा” जैसी कठोरता भी। मां ने कहा, “जब समझ नहीं आएगा तो मैं हस्ताक्षर कैसे कर दूं? मैं अनपढ़ हूं, लेकिन मां हूं… मेरा मन भी समझता है।”

अतः मां ने कागज़ों पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। मां का मना करना कोई जिद नहीं थी, वह डर था—अपने भविष्य का, अपने घर का, अपने अधिकार का। मां जानती थीं कि संपत्ति का मामला एक बार कागज़ पर हो जाए तो फिर लौटकर कुछ नहीं आता। और वे यह भी जानती थीं कि आज बेटे “आपसी सहमति” कह रहे हैं, पर कल को वही सहमति बदल भी सकती है। मां की उम्र हो चली थी। उन्हें सबसे बड़ा डर था—कहीं ऐसा न हो कि यह सब करके वे अपने ही घर में असुरक्षित हो जाएं।

तीनों बहनों को घर से, जायदाद से कोई मोह नहीं था। उन्हें अपने-अपने घरों में सम्मान और संतोष था। बहनों की आंखों में संपत्ति का लालच नहीं था। किंतु आज ख्याति और दोनों बहनें गहरे भवर जाल में फसी थीं क्योंकि अगर वे कागजातों पर हस्ताक्षर करती हैं तो वे कहीं ना कहीं अपनी मां के भविष्य को लेकर चिंतित हो उठतीं और अगर हस्ताक्षर ना करें तब अपने भाई-भाभी के आगे बुरी बन जातीं। भाभियों की नजरें, भाइयों की नाराजगी, घर का बदलता माहौल—सब कुछ एक साथ उनकी तरफ आ रहा था।

ख्याति के मन में बार-बार यही सवाल उठ रहा था—“अगर मां कल को बीमार हो गईं, या उन्हें सहारे की जरूरत पड़ी, तो क्या यह संपत्ति का बंटवारा उसी घर को बांट देगा?” उसे अपने पीहर का घर परिवार सब प्यारा था। मां का आशीर्वाद, भाई का स्नेह, बहनों का अपनापन—इनमें से किसी एक के बिना भी वे अपने पीहर की कल्पना नहीं कर सकती थीं। पर आज उन्हीं के सामने ऐसा मोड़ था जहाँ हर रास्ता किसी न किसी रिश्ते को चोट पहुँचाता दिख रहा था।

बहनों ने मां की तरफ देखा—मां की आँखें नम थीं, पर वह मजबूती से बैठी थीं। फिर भाइयों की तरफ देखा—उनके चेहरे पर खीझ और “काम निपटाने” की हड़बड़ी थी। ख्याति को अपने भीतर अजीब-सा टूटना महसूस हुआ। वह जानती थी कि मां के साथ खड़े होना सही है, पर वह यह भी जानती थी कि भाई से रिश्ते तोड़ना… वह नहीं कर सकती। मगर भाई का व्यवहार भी आज वैसा नहीं था जैसा राखी के दिन होना चाहिए।

आज रक्षाबंधन के दिन बहनें हार गई थीं। मां और भाइयों के बीच आज बहनें किसका साथ दें, वे खुद समझ नहीं पा रही थीं। कागजों की फाइल बीच में रखी थी, पर असल में बीच में रखे थे रिश्ते—भरोसा, अपनापन, संवेदना। एक तरफ मां की असुरक्षा थी, दूसरी तरफ भाइयों का निर्णय। बहनें बीच में फंसी हुई थीं—और उनकी आवाज़ जैसे किसी ने दबा दी थी।

ख्याति भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र तो बांध आई किंतु उपहार स्वरूप वह अपने भाइयों का विश्वास ना पा सकी। भाई के चेहरे पर वह अपनापन नहीं था जो हमेशा राखी पर दिखता था। जैसे भाई को लग रहा हो कि बहनें उसके रास्ते में रुकावट बन रही हैं। और बहन को लग रहा था कि भाई बहन के रिश्ते को “काम” समझकर निपटा देना चाहता है। यही वह पल था जिसने ख्याति को भीतर तक हिला दिया।

रह-रहकर उसके मन में यही विचार चल रहा था कि “हमारे माता पिता ने जो रिश्ता विपत्ति बांटने के लिए बनाया था ,वह रिश्ता आज संपत्ति बांटने के चक्कर में बंट गया है ।”
यह विचार उसके सीने पर पत्थर की तरह रखा था। वह चाहती थी कि कोई एक पल के लिए सब रुक जाए, कोई कहे—“ठहरो, आज तो राखी है… आज तो सिर्फ प्यार और भरोसा होना चाहिए।” पर किसी ने नहीं कहा। सब चल रहा था—कागज, बहस, नाराजगी, और बीच में माँ की कांपती हुई चुप्पी।

अब ट्रेन के डिब्बे में बैठे हुए ख्याति को वही सब दृश्य बार-बार याद आ रहे थे। उसके कानों में भाई की आवाज़, मां की सिसकी, बहनों की चुप्पी—सब गूंज रहा था। ख्याति की आंखें नम थीं और ट्रेन अपने गंतव्य स्थान पर पहुंचने ही वाली थी।

धन्यवाद
किरण फुलवारी

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