“क्यों केशव?” मृणालिनी ने केशव की तरफ देखे बिना पूछा। “उस दिन तुम क्यों नहीं आए थे? हम भागकर शादी करने वाले थे न? मैं स्टेशन पर दुल्हन के जोड़े में तुम्हारा इंतज़ार करती रही। पूरी रात… और तुम? तुम गायब हो गए। बाद में पता चला कि तुमने अपने पिता के दोस्त की बेटी सुधा से शादी कर ली। क्यों? क्या मेरे प्यार से ज़्यादा भारी सुधा के पिता की दौलत थी?”
“डॉक्टर मृणालिनी, पेशेंट की हालत बहुत क्रिटिकल है। उनके पति बाहर लॉबी में इंतज़ार कर रहे हैं, उन्होंने कहा है कि वे आपसे एक बार मिलना चाहते हैं सर्जरी से पहले।” नर्स ने हाफते हुए केबिन में आकर सूचना दी।
मृणालिनी ने अपनी फाइलों से नज़र हटाई और चश्मा ठीक किया। वह शहर की सबसे नामी कार्डियोलॉजिस्ट (हृदय रोग विशेषज्ञ) थी। उसके हाथों में न जाने कितनों की जान बची थी, लेकिन आज न जाने क्यों उसके हाथ कांप रहे थे। पेशेंट का नाम फाइल पर लिखा था—’सुधा शर्मा’। और पति के कॉलम में नाम था—’केशव शर्मा’।
‘केशव’… यह नाम बीस साल से उसके दिल के किसी कोने में कांटे की तरह चुभा हुआ था। वही केशव, जिसने उसके साथ सात जन्मों के वादे किए थे, लेकिन एक दिन अचानक उसे बीच राह में छोड़कर किसी और का हो गया था।
मृणालिनी ने गहरी सांस ली, खुद को संभाला और केबिन से बाहर निकली। कॉरिडोर के अंत में बेंच पर एक शख्स सिर झुकाए बैठा था। उसके बाल अब सफेद हो चले थे, कंधों पर ज़िम्मेदारियों का बोझ साफ झलकता था। मृणालिनी के कदमों की आहट सुनकर उसने सिर उठाया।
दोनों की नज़रें मिलीं। समय जैसे वहीं थम गया।
“मृणालिनी?” केशव की आवाज़ में अविश्वास और दर्द का मिश्रण था।
मृणालिनी ने अपने चेहरे पर डॉक्टर वाला सख्त मुखौटा चढ़ा लिया। “मिस्टर केशव, मैं आपकी पत्नी की डॉक्टर हूँ। पुरानी जान-पहचान का इस इलाज से कोई वास्ता नहीं है। प्लीज़, फॉर्मेलिटीज़ पूरी कर दीजिये।”
केशव चुप रह गया। उसकी आँखों में हज़ारों सफाई थी, पर होंठ सिले हुए थे।
सर्जरी लंबी चली। सुधा के दिल में छेद था और वाल्व डैमेज हो चुका था। मृणालिनी ने अपनी पूरी जान लगा दी। वह एक बेहतरीन डॉक्टर थी और अपनी निजी नफरत को उसने अपने पेशे के आड़े नहीं आने दिया। पाँच घंटे बाद, ऑपरेशन सफल रहा।
जब मृणालिनी ओटी से बाहर आई, तो केशव वहीं खड़ा था। उसकी आँखों में आंसू थे।
“शुक्रिया… मेरी सुधा को बचाने के लिए,” केशव ने हाथ जोड़ लिए।
मृणालिनी वहां से गुजरना चाहती थी, पर न जाने क्या हुआ, उसके कदम रुक गए। बीस साल का गुबार, जो उसने सीने में दबा रखा था, आज ज्वालामुखी बनकर फटना चाहता था।
“क्यों केशव?” मृणालिनी ने केशव की तरफ देखे बिना पूछा। “उस दिन तुम क्यों नहीं आए थे? हम भागकर शादी करने वाले थे न? मैं स्टेशन पर दुल्हन के जोड़े में तुम्हारा इंतज़ार करती रही। पूरी रात… और तुम? तुम गायब हो गए। बाद में पता चला कि तुमने अपने पिता के दोस्त की बेटी सुधा से शादी कर ली। क्यों? क्या मेरे प्यार से ज़्यादा भारी सुधा के पिता की दौलत थी?”
केशव ने एक फीकी मुस्कान दी। ऐसी मुस्कान जिसमें हार थी।
“दौलत? मृणालिनी, तुम्हें आज भी यही लगता है कि मैंने पैसों के लिए तुम्हें छोड़ा?”
“तो और क्या वजह थी? तुम तो कहते थे कि तुम्हारे पिता तुम्हें बहुत मानते हैं। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि तुम कायर बन गए?” मृणालिनी की आवाज़ में कड़वाहट थी।
केशव ने पास वाली बेंच की ओर इशारा किया। “बैठो मृणालिनी। आज शायद वक्त आ गया है कि वो लिफाफा खुल जाए जो बीस साल से बंद पड़ा है।”
मृणालिनी और केशव बेंच पर बैठ गए। अस्पताल की उस ठंडी गंध के बीच केशव ने अतीत के पन्ने पलटना शुरू किए।
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बीस साल पहले…
केशव और मृणालिनी (जिसे घर में सब ‘मिन्नी’ कहते थे) की प्रेम कहानी पूरे कॉलेज में मशहूर थी। दोनों ने तय किया था कि वे घर से भागकर शादी करेंगे क्योंकि केशव के पिता, दीनानाथ जी, एक बहुत ही सख्त और पुरानी सोच वाले इंसान थे। वे कभी इस रिश्ते के लिए राजी नहीं होते।
तय तारीख की रात, केशव अपना सामान पैक कर रहा था। उसकी ट्रेन का समय रात के 12 बजे का था। अचानक उसके कमरे का दरवाज़ा खुला। सामने उसके पिता दीनानाथ खड़े थे, लेकिन वह गुस्से में नहीं थे। वह रो रहे थे।
केशव ने अपनी ज़िंदगी में पहली बार अपने पिता को रोते हुए देखा था।
“बाबूजी?” केशव घबरा गया।
दीनानाथ ने अपनी पगड़ी उतारकर केशव के पैरों में रख दी।
“केशव, मुझे माफ़ कर दे बेटा। मैंने तुझे बर्बाद कर दिया।”
केशव ने झट से पगड़ी उठाई। “यह क्या कर रहे हैं आप?”
दीनानाथ ने बताया कि उन्होंने व्यापार में सट्टा खेला था और बहुत बुरी तरह हार गए हैं। उन पर बाज़ार का और साहूकारों का 50 लाख का कर्ज़ है। अगर कल सुबह तक पैसे नहीं मिले, तो पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर लेगी और घर की नीलामी होगी। और साहूकार ने धमकी दी है कि अगर पैसे नहीं मिले, तो वह घर की औरतों (केशव की माँ और छोटी बहन) को उठा ले जाएगा।
केशव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “तो अब क्या होगा बाबूजी?”
“एक ही रास्ता है,” दीनानाथ ने सिसकते हुए कहा। “मेरे बचपन के दोस्त, रघुनंदन जी… उनकी बेटी सुधा। सुधा को बचपन से पोलियो है, उसके एक पैर में दिक्कत है। रघुनंदन जी को एक ऐसा लड़का चाहिए जो उनकी बेटी को अपना ले। बदले में वो मेरा सारा कर्ज़ उतारने को तैयार हैं और मुझे व्यापार में दोबारा खड़ा करने के लिए पूंजी भी देंगे। उन्होंने तुम्हारा हाथ माँगा है।”
केशव सन्न रह गया। एक तरफ मृणालिनी थी, जो स्टेशन पर उसका इंतज़ार कर रही होगी। उसका प्यार, उसका सपना। और दूसरी तरफ उसकी माँ, उसकी बहन और उसका बूढ़ा पिता, जिनकी इज़्ज़त और जान दांव पर लगी थी।
“मैं नहीं कर सकता बाबूजी… मैं किसी से प्यार करता हूँ,” केशव ने विरोध किया।
दीनानाथ ने जेब से ज़हर की शीशी निकाली। “ठीक है बेटा। तू जा। अपने प्यार के पास जा। बस कल सुबह मेरी लाश को कंधा देने आ जाना। मैं अपनी आँखों के सामने अपनी बेटी और बीवी को नीलाम होते नहीं देख सकता।”
वह एक ऐसा पल था जब केशव के अंदर का प्रेमी मर गया और एक बेटा ज़िंदा हो गया। उसने दीनानाथ के हाथ से ज़हर की शीशी छीन ली।
“मैं शादी करूँगा,” केशव ने पत्थर दिल होकर कहा। “पर एक शर्त है। मृणालिनी को इस बारे में कुछ पता नहीं चलना चाहिए कि मैं बिका हूँ। उसे यही लगने दो कि मैं बेवफा हूँ। अगर उसे पता चला कि मैं मजबूरी में यह कर रहा हूँ, तो वह अपनी जान दे देगी या मेरा इंतज़ार करेगी। मैं उसे अपनी बदनसीबी के साथ नहीं बांधना चाहता। उसे मुझसे नफरत हो जाने दो, नफरत इंसान को जीने की वजह देती है।”
केशव स्टेशन नहीं गया। मृणालिनी पूरी रात रोती रही, और सुबह होते ही केशव के घर बारात आ गई।
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वर्तमान…
केशव की आँखों से आंसू बह रहे थे।
“उस रात मैंने तुम्हें धोखा नहीं दिया था मिन्नी, मैंने तुम्हें ‘आज़ाद’ किया था। अगर मैं तुम्हें बता देता, तो तुम भी मेरे साथ उस नर्क में घिसटतीं। मेरे पिता का कर्ज़ उतारते-उतारते मेरी पूरी जवानी निकल गई। सुधा… वो बहुत अच्छी औरत है। उसे पता था कि मैं उससे प्यार नहीं करता, फिर भी उसने मेरा घर संभाला, मेरे माँ-बाप की सेवा की। आज मैं जो भी हूँ, उसके त्याग की वजह से हूँ।”
मृणालिनी शून्य में ताक रही थी। जिस नफरत की आग में वह बीस साल से जल रही थी, जिसने उसे इतना सख्त और सफल डॉक्टर बनाया था, आज वह आग आंसुओं में बुझ गई थी।
“तो तुमने मुझे कभी संपर्क करने की कोशिश नहीं की?” मृणालिनी ने धीमे स्वर में पूछा।
“कैसे करता?” केशव ने अपनी कलाई दिखाई, जिस पर एक पुराना धागा बंधा था—वही धागा जो मृणालिनी ने उसे कॉलेज में बांधा था। “तुम्हें लगता है मैं तुम्हें भूल गया? हर साल करवा चौथ पर जब सुधा मेरे लिए व्रत रखती थी, मैं मन ही मन तुम्हारी लंबी उम्र की दुआ मांगता था। मैंने तुम्हें खोया ज़रूर, पर तुम्हें कभी छोड़ा नहीं।”
तभी नर्स आई। “सर, पेशेंट को होश आ गया है। वो आपको बुला रही हैं।”
केशव ने आँसू पोंछे और खड़ा हुआ। “मैं चलता हूँ डॉक्टर। सुधा इंतज़ार कर रही है।”
मृणालिनी ने उसे जाते हुए देखा। वह शख्स, जो अब बूढ़ा लगने लगा था, उसकी चाल में थकान थी। लेकिन मृणालिनी को आज वह दुनिया का सबसे खूबसूरत इंसान लग रहा था। उसने अपने प्रेम की बलि चढ़ा दी थी सिर्फ इसलिए ताकि उसका परिवार और खुद मृणालिनी सुरक्षित रह सकें।
केशव वार्ड के दरवाज़े तक पहुँचा, फिर रुका और मुड़ा।
“मिन्नी… तुम खुश तो हो न?”
मृणालिनी ने एक पल सोचा। उसने शादी नहीं की थी। उसने अपना पूरा जीवन मरीजों की सेवा में लगा दिया था। क्या वह खुश थी? शायद नहीं। लेकिन आज, इस सच को जानने के बाद, उसे एक अजीब सा सुकून मिल रहा था।
उसने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। “हाँ केशव। मैं खुश हूँ। क्योंकि मेरा प्यार कायर नहीं था, वो तो शहीद था।”
केशव मुस्कुराया और अंदर चला गया।
मृणालिनी वापस अपने केबिन में आई। उसने खिड़की से बाहर देखा। शाम हो रही थी। उसने अपनी दराज़ से एक पुरानी, पीली पड़ चुकी फोटो निकाली जिसमें वो और केशव कॉलेज की कैंटीन में बैठे थे। उसने उस फोटो को सीने से लगाया।
“तुम्हें माफ़ कर दिया केशव,” उसने फुसफुसा कर कहा।
तभी उसे याद आया कि सुधा को अभी लंबे इलाज की ज़रूरत है। मृणालिनी ने इंटरकॉम उठाया।
“नर्स, मिसेज सुधा शर्मा की फाइल मेरे पर्सनल केबिन में रखवा देना। और हां, उनके बिल का जो भी खर्चा होगा, वो ‘चैरिटी फंड’ से जाएगा। उन्हें पता नहीं चलना चाहिए।”
मृणालिनी जानती थी कि वह केशव को उसका प्यार वापस नहीं दे सकती, लेकिन वह उस औरत की ज़िंदगी ज़रूर बचा सकती थी जिसने केशव का साथ तब दिया जब वह (मृणालिनी) उसे बेवफा समझकर कोस रही थी। यह उस अधूरी मोहब्बत का आखिरी तोहफा था।
उस दिन अस्पताल के उस कमरे में तीन लोग थे—एक जो मरते-मरते बचा था (सुधा), एक जो जी कर भी मर रहा था (केशव), और एक जिसे आज नई ज़िंदगी मिली थी (मृणालिनी)। प्रेम कभी खत्म नहीं होता, बस उसका रूप बदल जाता है। कभी वो साथ निभाने में दिखता है, तो कभी दूर रहकर खामोश दुआएं देने में।
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**कहानी का निष्कर्ष:**
हम अक्सर जो देखते हैं, वही सच नहीं होता। किसी की मजबूरी को उसकी बेवफाई समझ लेना बहुत आसान है, लेकिन उस मजबूरी के पीछे छिपे त्याग को समझने के लिए बहुत बड़ा दिल चाहिए होता है। केशव ने साबित किया कि कभी-कभी प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण ‘पाना’ नहीं, बल्कि किसी की भलाई के लिए उसे ‘खो देना’ होता है।
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**कहानी के अंत में एक सवाल:**
क्या केशव ने जो किया वो सही था? क्या उसे मृणालिनी को सच बता देना चाहिए था? या उसका झूठ ही मृणालिनी की सफलता की वजह बना? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।
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मूल लेखिका : डॉ उर्मिला सिन्हा