“सुधा! अरे ओ सुधा! तू अभी तक रसोई में ही है? देख तो ड्राइंग रूम के पर्दों पर धूल जमी है या नहीं? मेरी ‘मल्लिका’ आ रही है। उसे धूल से एलर्जी है। अमेरिका में रहती है वो, वहां जैसा साफ़-सुथरा माहौल यहाँ भी मिलना चाहिए उसे।”
सावित्री देवी की आवाज़ पूरे घर में गूंज रही थी। उनकी आँखों में एक अलग ही चमक थी, गालों पर खुशी की लाली थी। वही सावित्री देवी, जो कल तक घुटनों के दर्द का बहाना बनाकर बिस्तर से नहीं उठती थीं, आज सुबह पाँच बजे से घर के एक-एक कोने का मुआयना कर रही थीं।
मैं, यानी उनकी बेटी राधिका, सोफे पर बैठी यह तमाशा देख रही थी। माँ की खुशी की वजह थी—मेरे बड़े भईया ‘समीर’ और उनकी पत्नी ‘मल्लिका’ का भारत आना। मल्लिका भाभी शादी के बाद बस एक बार आई थीं और फिर समीर भईया के साथ अमेरिका सेटल हो गई थीं। पांच साल बाद वे लोग पहली बार आ रहे थे।
तभी रसोई से खांसने की आवाज़ आई। यह आवाज़ सुधा भाभी की थी—मेरे छोटे भाई ‘रवि’ की पत्नी। सुधा भाभी पिछले तीन दिनों से वायरल बुखार से तप रही थीं। उनका चेहरा पीला पड़ा हुआ था, आँखें सूजी हुई थीं, लेकिन सावित्री देवी को न तो उनकी खांसी सुनाई दे रही थी और न ही उनका बुखार दिखाई दे रहा था। उन्हें बस एक ही धुन सवार थी—अमेरिका वाली बहू आ रही है।
सुधा भाभी हाथ में पानी की बाल्टी और पोछा लेकर बाहर आईं। उनकी चाल लड़खड़ा रही थी।
“माँ जी, वो ऊपर वाले कमरे की सफाई कर दी है। अब नाश्ते की तैयारी कर लूँ?” सुधा भाभी ने हांफते हुए पूछा।
माँ ने तुनक कर कहा, “अरे, अभी पोछा ठीक से लगा कहाँ है? देख, वहां कोने में जाला है। मल्लिका देखेगी तो क्या कहेगी? कि भारत आकर सास ने गंदगी में रखा? और सुन, मल्लिका को वो ऑयली पूरी-सब्जी नहीं पसंद। उसके लिए कॉन्टिनेंटल नाश्ता बनाना है। यूट्यूब पर देख लेना, या रवि से पूछ लेना। कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।”
मुझे रहा नहीं गया। “माँ, सुधा भाभी को 102 डिग्री बुखार है। आप उनसे इतना काम क्यों करवा रही हैं? कामवाली बाई को बुला लेते हैं ना एक्स्ट्रा पैसे देकर।”
माँ ने मुझे घूर कर देखा। “राधिका, तू चुप रह। घर की इज़्ज़त का सवाल है। कामवाली बाई वो सफाई नहीं कर सकती जो घर की बहू कर सकती है। और बुखार ही तो है, कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ा। हम भी तो बुखार में काम करते थे। मल्लिका पांच साल बाद आ रही है, वो मेहमान है। सुधा तो घर की ही है, उसे थोड़ा कष्ट हो भी गया तो क्या हुआ?”
सुधा भाभी ने मुझे चुप रहने का इशारा किया और फीकी मुस्कान के साथ बोलीं, “कोई बात नहीं राधिका दीदी, मैं कर लूँगी। बड़े भईया और भाभी आ रहे हैं, खुशी का मौका है।”
और फिर, वो घड़ी आ गई।
बाहर एक बड़ी लग्जरी टैक्सी रुकी। सावित्री देवी नंगे पैर ही दौड़ पड़ीं। समीर भईया और मल्लिका भाभी उतरे। मल्लिका भाभी ने बड़े ही स्टाइलिश कपड़े पहने थे, आँखों पर बड़ा सा चश्मा और हाथ में एक महंगा पर्स।
सावित्री देवी ने मल्लिका की आरती उतारी। मल्लिका ने झुककर पैर छुए तो माँ ने उसे गले लगा लिया।
“मेरी गुड़िया! मेरी रानी बेटी! कैसी है तू? दुबली हो गई है वहां के खाने से,” माँ ने ऐसे विलाप किया जैसे मल्लिका किसी युद्ध से लौटकर आई हो।
अंदर आते ही तोहफों का पिटारा खुला। मल्लिका भाभी ने माँ के लिए एक डिजिटल बीपी मशीन, एक विदेशी शॉल और कुछ परफ्यूम निकाले। माँ उन चीज़ों को ऐसे देख रही थीं जैसे कोहिनूर मिल गया हो। उन्होंने तुरंत वो शॉल ओढ़ ली, जबकि बाहर उमस वाली गर्मी थी।
“अरे सुधा! कहाँ रह गई? पानी ला मेरी मल्लिका के लिए,” माँ ने आवाज़ लगाई।
सुधा भाभी, जो बुखार से तपते शरीर के साथ रसोई में पसीने से तर-बतर थीं, चांदी की ट्रे में पानी और जूस लेकर आईं।
मल्लिका भाभी ने सुधा को ऊपर से नीचे तक देखा। सुधा भाभी ने एक साधारण सी सूती साड़ी पहनी थी, बाल थोड़े बिखरे थे और चेहरा थका हुआ था।
“ओह हाय सुधा! तुम तो बिल्कुल वैसी ही हो, बदली नहीं। थोड़ा ग्रूमिंग क्लास क्यों नहीं ज्वाइन कर लेती? रवि, तुम अपनी वाइफ को थोड़ा अपग्रेड करो यार,” मल्लिका ने हंसते हुए कहा।
रवि का चेहरा उतर गया। सुधा भाभी ने सिर झुका लिया। माँ ने भी मल्लिका की हां में हां मिलाई, “अरे मल्लिका, ये तो गाँव की है, इसे कहाँ समझ आएगी ग्रूमिंग। तू आ गई है ना, अब घर में थोड़ी रौनक आएगी। वरना इसके मनहूस चेहरे ने तो घर को अस्पताल बना रखा था।”
ये शब्द सुधा भाभी के दिल पर किसी खंजर की तरह लगे होंगे, लेकिन उन्होंने उफ़ तक नहीं की।
अगले चार दिन घर में जैसे कोई उत्सव चल रहा था। मल्लिका भाभी सुबह 10 बजे सोकर उठतीं। उठते ही उन्हें बेड-टी चाहिए होती थी, जो सुधा भाभी बनाकर कमरे तक ले जातीं। फिर मल्लिका घंटों बाथरूम में बितातीं। नाश्ते में उन्हें कभी एवोकाडो टोस्ट चाहिए होता, तो कभी पैनकेक। बेचारी सुधा भाभी, जिसे इन चीज़ों का नाम भी ठीक से नहीं पता था, यूट्यूब देख-देखकर जलते हुए माथे के साथ सब बनातीं।
सावित्री देवी अपनी ‘अमेरिका वाली बहू’ को लेकर पूरे मोहल्ले में घूमतीं।
“मेरी मल्लिका तो लाखों में एक है। देखो, मेरे लिए क्या लाई है। और संस्कार तो देखो, आते ही पैर छुए,” माँ अपनी सहेलियों से कहतीं।
पड़ोसन ने पूछा, “और सुधा कैसी है? सुना है बीमार है?”
माँ ने लापरवाही से हाथ हिलाया, “अरे वो तो हमेशा ही बीमार रहती है। नाजुक है। कामचोर कहीं की।”
एक रात, घर में बड़ी पार्टी रखी गई। मल्लिका भाभी ने अपनी पसंद का खाना बनवाया। सुधा भाभी ने अकेले 30 लोगों का खाना बनाया, क्योंकि मल्लिका को बाहर का खाना हाइजीनिक नहीं लगता था। पार्टी में सबने मल्लिका की खूबसूरती और समीर की कामयाबी की तारीफ की। सुधा भाभी रसोई के कोने में स्टूल पर बैठी रोटियाँ सेक रही थीं, उनकी सांसें भारी हो रही थीं, बुखार बढ़ रहा था। किसी ने उन्हें पानी के लिए भी नहीं पूछा।
पार्टी खत्म हुई। सब थककर सो गए।
रात के करीब 2 बज रहे होंगे। अचानक सावित्री देवी के कमरे से जोर की चीख सुनाई दी। “छाती में… दर्द…!”
पूरा घर जाग गया। मैं, रवि और सुधा भाभी दौड़कर माँ के कमरे में गए। माँ पसीने से लथपथ थीं और अपना सीना पकड़कर तड़प रही थीं। उन्हें शायद हार्ट अटैक आया था।
“जल्दी गाड़ी निकालो रवि!” सुधा भाभी चिल्लाईं। उन्होंने तुरंत माँ को संभाला, उनकी जीभ के नीचे एक गोली रखी (जो डॉक्टर ने इमरजेंसी के लिए बताई थी) और उन्हें सहारा देकर उठाने लगीं।
रवि गाड़ी निकालने गया। मैंने समीर भईया के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया।
“भईया! भईया! माँ की तबीयत बहुत खराब है, हॉस्पिटल ले जाना है।”
काफी देर बाद दरवाज़ा खुला। मल्लिका भाभी अपनी नींद भरी आँखों के साथ बाहर आईं। “क्या हुआ राधिका? इतना शोर क्यों मचा रखा है?”
“माँ को हार्ट अटैक आया है शायद,” मैं रो पड़ी।
समीर भईया भी पीछे आए। “क्या? अभी? इतनी रात को?”
“हाँ भईया, चलिए जल्दी!”
मल्लिका ने समीर का हाथ पकड़ लिया। “समीर, वेट। हम ऐसे हड़बड़ी में नहीं जा सकते। तुम्हें पता है न कल सुबह हमारी फ्लाइट है गोवा की? हमने टिकट्स बुक करा रखी हैं। अगर हम अभी हॉस्पिटल गए तो हमारी ट्रिप कैंसिल हो जाएगी। और वैसे भी, रवि और सुधा हैं ना। वो ले जाएंगे।”
मैं सन्न रह गई। “भाभी? माँ ज़िंदगी और मौत से लड़ रही हैं और आपको अपनी गोवा ट्रिप की पड़ी है?”
मल्लिका ने झल्लाते हुए कहा, “देखो राधिका, इमोशनल ड्रामा मत करो। हम अमेरिका से छुट्टी मनाने आए हैं, बीमार तीमारदारी करने नहीं। रवि है ना वहां, वो संभाल लेगा। हम सुबह आकर देख लेंगे।”
उधर, सुधा भाभी—जिनका अपना शरीर बुखार से तप रहा था—माँ को अपनी पीठ का सहारा देकर सीढ़ियों से नीचे उतार रही थीं। उनकी अपनी सांस फूल रही थी, लेकिन उनकी पकड़ ढीली नहीं हुई। उन्होंने मल्लिका और समीर की बातें सुन ली थीं।
“राधिका दीदी, आप जल्दी नीचे आओ। हमें किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं है,” सुधा भाभी ने कड़क आवाज़ में कहा। उस वक्त उनके चेहरे पर वो ‘भोली बहू’ का भाव नहीं, बल्कि एक ‘दुर्गा’ का रूप था।
हम माँ को लेकर सिटी हॉस्पिटल भागे। डॉक्टर ने तुरंत उन्हें आईसीयू में शिफ्ट किया।
“अच्छा हुआ आप समय पर ले आए और वो सोर्बिट्रेट की गोली दे दी, वरना बचना मुश्किल था,” डॉक्टर ने कहा।
अगले 48 घंटे बहुत भारी थे। सुधा भाभी एक पल के लिए भी आईसीयू के बाहर से नहीं हिलीं। न उन्होंने कुछ खाया, न पिया। उनका अपना बुखार दवाई लेने से थोड़ा कम हुआ था, लेकिन थकान चरम पर थी। रवि दवाइयां ला रहा था, मैं फॉर्म भर रही थी। लेकिन समीर भईया और मल्लिका भाभी? वो एक बार भी हॉस्पिटल नहीं आए।
तीसरे दिन माँ को होश आया। उन्हें जनरल वार्ड में शिफ्ट किया गया।
माँ की नज़रें चारों तरफ घूमीं। उन्होंने देखा—सुधा भाभी स्टूल पर बैठी उनका पैर दबा रही थीं। सुधा की आँखें गड्ढों में धंस गई थीं, होंठ सूख गए थे, लेकिन उनके हाथों में वही सेवाभाव था।
“सुधा…” माँ ने कमज़ोर आवाज़ में पुकारा।
“जी माँ जी? पानी चाहिए?” सुधा ने तुरंत तत्परता दिखाई।
“समीर… मल्लिका…?” माँ ने पूछा।
सुधा चुप रही। मैंने माँ का हाथ पकड़ा। “माँ, वो लोग नहीं आए। वो कल सुबह ही गोवा चले गए। मल्लिका भाभी कह रही थीं कि हॉस्पिटल के माहौल में उन्हें डिप्रेशन होता है और उनकी छुट्टियाँ खराब हो जाएंगी।”
माँ की आँखों से आंसू की एक बूंद लुढ़क कर तकिये में समा गई। वो सन्नाटा, जो उस कमरे में छाया, वो किसी भी शोर से ज्यादा भयानक था।
तभी नर्स आई। “पेशेंट के कपड़े गंदे हो गए हैं, डायपर बदलना पड़ेगा। और इन्होने उल्टी भी कर दी है।”
बदबू फैल गई थी। मैं अपनी नाक पर रूमाल रखने ही वाली थी कि मैंने देखा—सुधा भाभी उठीं। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के, बिना नाक सिकोड़े, माँ के गंदे कपड़े बदले, उनका शरीर गीले कपड़े से पोंछा और साफ़ चादर बिछाई।
यह वही सुधा थी जिसे माँ ‘कामचोर’ और ‘गंवार’ कहती थीं। और वो ‘संस्कारी’ मल्लिका? वो शायद इस वक्त गोवा के बीच पर अपनी सेल्फी ले रही होगी।
दो दिन बाद माँ को डिस्चार्ज मिला।
जब हम घर पहुंचे, तो देखा कि समीर और मल्लिका गोवा से वापस आ चुके थे और अपना सामान पैक कर रहे थे। उनकी वापसी की फ्लाइट थी।
माँ को व्हीलचेयर पर देखकर मल्लिका ने दूर से ही कहा, “ओह थैंक गॉड माँ जी, आप ठीक हैं। हम तो बहुत डर गए थे। पर क्या करते, ट्रिप प्लान थी। वैसे भी सुधा ने संभाल ही लिया। हम निकल रहे हैं, एयरपोर्ट के लिए देर हो रही है।”
मल्लिका आगे बढ़ी और रस्म अदायगी के लिए माँ के पैर छूने झुकी।
सावित्री देवी ने अपने पैर पीछे खींच लिए।
पूरा कमरा हैरान रह गया। मल्लिका ठिठक गई। “क्या हुआ माँ जी?”
सावित्री देवी ने अपनी कांपती उंगली उठाई और दरवाज़े की तरफ इशारा किया।
“जाओ। अभी के अभी मेरे घर से जाओ। मुझे तुम्हारी ज़रूरत नहीं है।”
“माँ, आप नाराज़ हैं?” समीर ने सफाई देनी चाही।
“नाराज़?” सावित्री देवी ने एक कड़वी हंसी हंसी। “मैं नाराज़ नहीं हूँ, मैं शर्मिंदा हूँ। शर्मिंदा हूँ कि मैंने कांच के टुकड़े को हीरा समझा और कोहिनूर को पत्थर।”
माँ ने सुधा का हाथ पकड़ा और उसे अपने पास खींचा। सुधा अब भी संकोच में खड़ी थी।
“मल्लिका,” माँ ने कड़े स्वर में कहा, “तुम अमेरिका से इत्र की शीशियां लाई थीं न? उनकी खुशबू दो दिन में उड़ गई। लेकिन मेरी सुधा… ये मेरे घर की तुलसी है। इसमें कोई चमक-धमक नहीं है, कोई ब्रांड नहीं है। लेकिन जब घर में मुसीबत की बीमारी आई, तो यही तुलसी का काढ़ा बनकर मेरी जान बचाने खड़ी रही।”
माँ का गला भर आया। “तुम कहती थी न कि इसे ग्रूमिंग की ज़रूरत है? सच तो ये है कि इसे नहीं, मुझे ग्रूमिंग की ज़रूरत थी। मेरी आँखों पर जो ‘विदेशी’ और ‘पैसे’ का मोतियाबिंद चढ़ा था, वो आज इस गंवार बहू ने अपने पसीने और सेवा से धो दिया। तुम मेहमान थी, मेहमान की तरह आई और चली जाओ। यह घर इसका है, और आज से इस घर की मालकिन भी यही है।”
मल्लिका और समीर के पास कहने को कुछ नहीं था। वे सिर झुकाकर चले गए।
उनके जाने के बाद, सावित्री देवी ने सुधा के हाथ अपने माथे से लगा लिए और फूट-फूट कर रो पड़ीं।
“मुझे माफ़ कर दे सुधा। मैंने तुझे बहुत सताया। मैंने कभी तेरी कद्र नहीं की। मैं कुमाता बन गई थी, पर तूने साबित कर दिया कि तू सच्ची ‘बहू’ नहीं, सच्ची ‘बेटी’ है।”
सुधा ने माँ के आंसू पोंछे और उनके गले लग गई। “माँ जी, आप ठीक हो गईं, मेरे लिए वही सबसे बड़ा इनाम है। बच्चे माँ की गलतियों को दिल से नहीं लगाते।”
उस दिन सावित्री देवी को समझ आ गया कि रिश्ते खून से नहीं, ‘एहसास’ और ‘सेवा’ से बनते हैं। दूर के ढोल सुहावने होते हैं, लेकिन मुश्किल वक्त में घर की मिट्टी ही घाव भरने के काम आती है। उन्होंने उस विदेशी शॉल को उतारकर फेंक दिया और सुधा की दी हुई हाथ से बुनी स्वेटर ओढ़ ली, जिसमें गर्माहट थी—रिश्तों की, प्यार की, और अपनेपन की।
कहानी का शीर्षक:
विदेशी इत्र की महक और आंगन की तुलसी
हूक लाइन:
“जिस बेटे-बहू की राह में माँ ने पलकें बिछा दी थीं, उन्होंने अस्पताल के बिस्तर पर उसे छोड़कर अपनी छुट्टियां चुनीं। लेकिन जिसे हमेशा दुत्कारा, उसी ‘गंवार’ बहू ने साबित किया कि सेवा सेल्फी लेने से नहीं, दर्द बांटने से होती है।”
लेखक का संदेश:
आज के दौर में हम अक्सर चकाचौंध और दिखावे को ‘संस्कार’ समझ लेते हैं और सादगी को ‘पिछड़ापन’। लेकिन याद रखिये, बुढ़ापे की लाठी और बीमारी का सहारा वही बनता है जो दिल से आपके साथ हो, न कि वो जो सिर्फ सोशल मीडिया पर आपके साथ हो। अपनी ‘सुधा’ की कद्र कीजिये, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।
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मूल लेखिका :संगीता अग्रवाल