वो बंद कमरा – संगीता अग्रवाल

“जिस मां ने अपने गहने बेचकर बेटे को विदेश भेजा, ताकि वो ‘बड़ा आदमी’ बन सके, आज उसी बेटे के आलीशान बंगले में उस मां के लिए दो वक्त की रोटी और एक खुली खिड़की भी मयस्सर नहीं थी… आखिर क्यों रिश्तों की कीमत ईंट-पत्थरों से कम हो गई?”

शेखर का खून जम गया। यह आवाज़… यह तो सुमित्रा काकी की थी! लेकिन राजीव ने तो कहा था कि वे अपने आलीशान कमरे में आराम कर रही हैं। फिर वे यहाँ, इस कबाड़ वाले कमरे में, बाहर से ताला लगा हुआ क्यों हैं?

ट्रेन की रफ़्तार धीमी होते ही शेखर ने खिड़की से बाहर झांका। ‘रामपुर जंक्शन’ का बोर्ड देखते ही उसके चेहरे पर एक फीकी मुस्कान तैर गई। पंद्रह साल… पूरे पंद्रह साल लग गए उसे अपने शहर वापस लौटने में। दिल्ली की भागदौड़ और पत्रकारिता की मसरूफियत ने उसे ऐसा जकड़ा कि अपनी मिट्टी की खुशबू जैसे वह भूल ही गया था।

स्टेशन से बाहर निकलते ही उसने एक गहरी सांस ली। हवा में वही जाना-पहचानापन था, लेकिन शहर बदल चुका था। जहाँ कभी खुले मैदान हुआ करते थे, वहाँ अब ऊंची-ऊंची इमारतें और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स तने खड़े थे।

शेखर ने एक ऑटो रिक्शा रोका। “भाई, सिविल लाइंस चलोगे? ‘गुप्ता विला’ के पास।”

ऑटो वाले ने मीटर डाउन किया और चल पड़ा। शेखर का मन अतीत के पन्नों को पलटने लगा। वह अपने बचपन के जिगरी दोस्त, राजीव के घर जा रहा था। राजीव की बेटी की शादी थी और उसने ज़िद करके शेखर को बुलाया था। बचपन में शेखर का आधा वक्त राजीव के उसी पुराने, बड़े से पुश्तैनी घर में बीतता था। राजीव की माँ, जिन्हें शेखर ‘सुमित्रा काकी’ कहता था, उसे अपने बेटे से ज्यादा मानती थीं।

शेखर को याद आया कि कैसे सुमित्रा काकी उसे अपने हाथ से बने बेसन के लड्डू खिलाती थीं। जब शेखर के पिताजी का देहांत हुआ था, तो वो सुमित्रा काकी ही थीं जिन्होंने शेखर की माँ को सहारा दिया था और शेखर की पढ़ाई का खर्च उठाया  था । शेखर के मन में आज राजीव से मिलने की खुशी तो थी, लेकिन सुमित्रा काकी के चरण स्पर्श करने की आतुरता उससे कहीं ज्यादा थी।

ऑटो एक आलीशान बंगले के सामने रुका। गेट पर बड़े अक्षरों में लिखा था—’राजीव मेंशन’। पुराना पुश्तैनी घर अब एक आधुनिक महल में तब्दील हो चुका था। ऊंचे गेट, विदेशी कुत्ते और सुरक्षा गार्ड्स।

शेखर ने अपना बैग उठाया और अंदर दाखिल हुआ। घर के लॉन में शादी का टेंट लगा था। शहनाई बज रही थी और मेहमानों की भीड़ थी। राजीव, जो अब एक बड़ा बिजनेसमैन बन चुका था, शेरवानी पहने मेहमानों का स्वागत कर रहा था। शेखर को देखते ही वह दौड़कर आया और गले लग गया।

“यार शेखर! तू सच में आ गया? मुझे तो लगा तू दिल्ली का बड़ा बाबू बन गया है, हम छोटों को क्यों याद करेगा?” राजीव ने हंसते हुए कहा।

“तुझे भूल सकता हूँ क्या भाई? और फिर, गुड़िया की शादी है,” शेखर मुस्कुराया। उसकी नज़रें भीड़ में सुमित्रा काकी को ढूंढ रही थीं।

“काकी कहाँ हैं? दिखाई नहीं दे रही हैं?” शेखर ने उत्सुकता से पूछा।

राजीव के चेहरे पर एक पल के लिए छाया-सी पड़ी, लेकिन उसने तुरंत उसे अपनी बनावटी मुस्कान से ढक लिया। “अरे, माँ… माँ तो अब बहुत बूढ़ी हो गई हैं शेखर। उनकी याददाश्त चली गई है। उन्हें कुछ याद नहीं रहता। बस अपने कमरे में आराम करती हैं। डॉक्टरों ने कहा है कि उन्हें शोर-शराबे और भीड़-भाड़ से दूर रखना ही बेहतर है, वरना वो हिंसक हो जाती हैं और कपड़े फाड़ने लगती हैं।”

शेखर को धक्का लगा। सुमित्रा काकी… और हिंसक? वो तो इतनी शांत और ममतामयी थीं। “क्या? काकी को क्या हो गया? मुझे उनसे मिलना है राजीव।”

“हाँ-हाँ, मिल लेना। अभी तो मेहमानों का वक़्त है। तू फ्रेश हो जा, फिर आराम से,” राजीव ने बात टाल दी और उसे गेस्ट रूम की तरफ भेज दिया।

रात हो चुकी थी। संगीत और दावत का दौर चल रहा था। शेखर का मन अशांत था। उसे राजीव की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था। जिस महिला ने पूरे मोहल्ले के बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा किया हो, वो बुढ़ापे में हिंसक कैसे हो सकती है?

देर रात जब पार्टी का शोर थम गया और सब अपने कमरों में जाने लगे, तो शेखर को प्यास लगी। वह पानी लेने के लिए नीचे रसोई की तरफ आया। पूरा घर शांत था। तभी, उसे घर के पिछवाड़े, जहाँ कभी पुराना स्टोर रूम हुआ करता था, वहाँ से किसी के कराहने की आवाज़ सुनाई दी।

आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे कोई बहुत दर्द में हो और मुँह पर कपड़ा रखकर रो रहा हो। शेखर के कदम ठिठक गए।

“हम्म्म्म… आहा… कोई है?” एक क्षीण आवाज़ आई।

शेखर ने इधर-उधर देखा। कोई नहीं था। वह दबे पाँव पिछवाड़े की तरफ बढ़ा। वहाँ अब एक गैराज बना दिया गया था और उसके बगल में एक छोटा सा कमरा था, जिसके लोहे के दरवाज़े पर बाहर से ताला लटका हुआ था।

शेखर ने कान लगाकर सुना।

“बेटा राजीव… एक घूंट पानी दे दे… बहुत प्यास लगी है…”

शेखर का खून जम गया। यह आवाज़… यह तो सुमित्रा काकी की थी! लेकिन राजीव ने तो कहा था कि वे अपने आलीशान कमरे में आराम कर रही हैं। फिर वे यहाँ, इस कबाड़ वाले कमरे में, बाहर से ताला लगा हुआ क्यों हैं?

शेखर ने खिड़की की दराज़ से अंदर झांकने की कोशिश की। अंदर घुप अंधेरा था। उसने अपने मोबाइल की टॉर्च जलाई और रौशनी अंदर डाली।

दृश्य देखकर शेखर के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

अंदर के फर्श पर एक फटी हुई दरी बिछी थी। कोने में मिट्टी का एक घड़ा था जो शायद खाली था। और उस दरी पर, हड्डियों का एक ढांचा-सा सिमटा हुआ पड़ा था। बाल उलझे हुए, कपड़े मैले-कुचैले और शरीर पर कई जगह घाव। वो सुमित्रा काकी थीं—वही काकी, जो कभी साफ़-सफाई और अनुशासन की मूरत हुआ करती थीं।

“काकी?” शेखर ने रुंधे गले से आवाज़ दी।

रोशनी पड़ते ही काकी ने अपनी आँखों पर हाथ रख लिया। “कौन? कौन है? मत मारो… मैंने खाना नहीं मांगा… मत मारो…” वे डर के मारे दीवार से चिपक गईं।

शेखर की आँखों से आंसू बह निकले। यह ‘हिंसक’ नहीं थीं, यह ‘डरी हुई’ थीं।

“काकी, मैं हूँ… शेखर। आपका शेखर,” उसने खिड़की की जाली पकड़कर कहा।

काकी एक पल के लिए शांत हुईं। “शेखर? मेरा लल्ला? तू आ गया? मैंने कहा था न राजीव से कि मेरा शेखर आएगा तो मुझे यहाँ से ले जाएगा। बेटा, मुझे बहुत भूख लगी है। कल से इन्होंने बस दो बिस्कुट दिए हैं। कहते हैं शादी में मेहमान आए हैं, अगर मैं बाहर निकली तो उनकी नाक कट जाएगी।”

शेखर को लगा जैसे किसी ने उसका कलेजा निकाल लिया हो। उसने आसपास देखा। एक लोहे की रॉड पड़ी थी। उसने आव देखा न ताव, ताले पर दे मारा। दो-तीन बार के प्रयास में पुराना जंग लगा ताला टूट गया।

शेखर ने दरवाज़ा खोला और अंदर दौड़ा। काकी से बदबू आ रही थी, लेकिन शेखर ने परवाह नहीं की। उसने उन्हें अपनी बांहों में उठा लिया।

“काकी, मैं आ गया हूँ। अब कोई आपको तंग नहीं करेगा,” शेखर रो रहा था।

वह उन्हें सहारा देकर बाहर लाया और हॉल में सोफे पर बैठाया। उसने दौड़कर फ्रिज से पानी और कुछ फल निकाले। काकी ऐसे पानी पी रही थीं जैसे सदियों से प्यासी हों।

सुबह हो गई। शहनाई फिर से बजने लगी थी। मेहमान नाश्ते के लिए हॉल में जमा होने लगे थे। राजीव और उसकी पत्नी रेणुका हंसते-खेलते नीचे उतरे। लेकिन हॉल का नज़ारा देखकर उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई।

सोफे पर सुमित्रा काकी बैठी थीं, और उनके बगल में शेखर खड़ा था—आँखों में गुस्सा लिए। मेहमान काकी को देखकर नाक-भौं सिकोड़ रहे थे।

“अरे, यह कौन बूढ़ी औरत है? कितनी गंदी है, और यहाँ सोफे पर?” एक मेहमान ने कहा।

राजीव दौड़कर आया। “शेखर! यह क्या तमाशा है? मैंने कहा था न माँ मानसिक रूप से बीमार हैं। तूने ताला क्यों तोड़ा? अगर इन्होंने किसी मेहमान को काट लिया तो?”

राजीव ने गार्ड्स को इशारा किया, “ले जाओ इन्हें वापस उसी कमरे में।”

“खबरदार!” शेखर की आवाज़ ने हॉल को गुंजा दिया। “अगर किसी ने हाथ भी लगाया तो पुलिस को बुला लूँगा।”

शेखर ने एक कदम आगे बढ़ाया और राजीव की आँखों में आँखें डालकर कहा, “राजीव, बचपन में हम कहते थे कि तू अपनी माँ का लाडला है। आज देख रहा हूँ कि तू कितना बड़ा ‘कपूत’ निकला। तूने कहा था माँ पागल हैं? हिंसक हैं?”

शेखर ने काकी की तरफ इशारा किया। “देख इन्हें। ये डर से कांप रही हैं। इनके शरीर पर जो नीले निशान हैं, वो इनके पागलपन के नहीं, तेरी और तेरी पत्नी की क्रूरता के हैं।”

हॉल में सन्नाटा छा गया।

शेखर ने बोलना जारी रखा, “मुझे काकी ने सब बता दिया है। जब से तूने पिता जी की वसीयत अपने नाम करवाई है, तब से तूने इन्हें उस कालकोठरी में बंद कर रखा है। तू डरता था कि अगर ये मेहमानों के सामने आ गईं, तो तेरी ‘हाई क्लास’ सोसायटी को पता चल जाएगा कि तू एक अनपढ़, गंवार माँ का बेटा है? तुझे शर्म आती है न इनसे?”

रेणुका, राजीव की पत्नी, चिल्लाई, “शेखर भाई साहब, आप हमारे घर के मामले में दखल दे रहे हैं। ये बुढ़िया दिन भर बड़बड़ाती है, कपड़े गंदे करती है। घर में बदबू फैलती है। हम क्या करें?”

“तो तुम इन्हें मार डालोगी?” शेखर ने पलटवार किया। “तुम्हें याद है रेणुका भाभी? जब तुम्हारी डिलीवरी हुई थी, तो इन्ही काकी ने रातों को जागकर तुम्हारे बच्चे को संभाला था क्योंकि तुम्हें नींद प्यारी थी। तब इनसे बदबू नहीं आती थी? आज जब इनके हाथ कांप रहे हैं, तो ये बोझ हो गईं?”

शेखर ने अपनी जेब से फोन निकाला। “मैंने कल रात का वीडियो रिकॉर्ड कर लिया है और काकी का बयान भी। अब मेरे पास दो रास्ते हैं राजीव। या तो मैं अभी पुलिस को बुलाऊँ और ‘सीनियर सिटीजन एक्ट’ के तहत तुझे और तेरी बीवी को जेल भिजवाऊँ… और यकीन मान, मीडिया में मैं हूँ, तेरी इज़्ज़त की धज्जियां उड़ाने में मुझे एक घंटा भी नहीं लगेगा।”

राजीव का चेहरा पसीने से तर-बतर हो गया। मेहमान अब कानाफूसी कर रहे थे।

“या फिर…” शेखर ने अपनी बात पूरी की, “तू अभी, इसी वक्त, सबके सामने काकी के पैर पकड़कर माफ़ी मांगेगा और लिखित में देगा कि आज से इस घर की मालकिन काकी रहेंगी और तू उनका सेवक। और अगर मुझे काकी की आँखों में एक भी आंसू दिखा, तो मैं तुझे बर्बाद कर दूंगा।”

राजीव जानता था कि शेखर खोखली धमकियां नहीं देता। और शादी का माहौल था, पुलिस आने का मतलब था सब कुछ ख़त्म।

राजीव और रेणुका, दोनों धीरे-धीरे आगे बढ़े और सुमित्रा काकी के पैरों में गिर पड़े। यह पश्चाताप नहीं, डर था। लेकिन शेखर के लिए इतना काफी था कि काकी को उनका हक़ मिल जाए।

सुमित्रा काकी, जो अब तक चुप थीं, उन्होंने कांपते हुए हाथ राजीव के सिर पर रखे। “मत रो बेटा… कोई बात नहीं। तू खुश रह।”

यह दृश्य देखकर वहां मौजूद हर इंसान की आँखें भर आईं। एक माँ का दिल, इतना अपमान सहने के बाद भी, सिर्फ़ आशीष दे रहा था।

शेखर ने काकी को उठाया। “काकी, अब आप यहाँ नहीं रहेंगी। जिस घर में आपको कैद करके रखा गया, वहां अब आपका दम घुटता होगा। आप मेरे साथ दिल्ली चलेंगी। मेरी माँ नहीं हैं, आप ही मेरी माँ बनेंगी।”

“लेकिन बेटा, यह मेरा घर है… मेरे पति की निशानी…” काकी ने धीरे से कहा।

“यह घर तब था जब इसमें प्यार था काकी,” शेखर ने कहा। “अब यह सिर्फ ईंटों का ढेर है। चलिए मेरे साथ।”

शेखर ने काकी का हाथ थामा और मुख्य द्वार की तरफ चल पड़ा। राजीव पीछे से आवाज़ देता रहा, माफ़ी मांगता रहा, लेकिन शेखर ने मुड़कर नहीं देखा। वह जानता था कि कुछ गुनाह माफ़ी के लायक नहीं होते।

जाते-जाते शेखर ने गेट पर खड़े होकर राजीव से कहा, “राजीव, तूने अपना घर तो संगमरमर का बनवा लिया, लेकिन अपनी नींव को ही दीमक खिला दी। याद रखना, जिस माँ की दुआएं तुझे अर्श पर ले जा सकती हैं, उसकी एक आह तुझे फर्श पर भी ला सकती है।”

शेखर काकी को लेकर निकल गया। पीछे, वह आलीशान ‘राजीव मेंशन’ अपनी सारी चमक-दमक के बावजूद, एक खंडहर जैसा वीरान लग रहा था।

**कहानी का सार:**

हम अक्सर अपनी झूठी शान और सामाजिक प्रतिष्ठा को बचाने के लिए अपने ही बुज़ुर्गों को घर के अंधेरे कोनों में छिपा देते हैं। हम भूल जाते हैं कि हमारे वजूद की जड़ें उन्हीं से जुड़ी हैं। वृद्ध माता-पिता को दया या एहसान की नहीं, सम्मान और समय की ज़रूरत होती है। जिस घर में बुज़ुर्गों की आँखों में आंसू होते हैं, वहां सुख-समृद्धि कभी नहीं ठहरती।

**प्रिय पाठकों,**

क्या आपको भी लगता है कि आज की चकाचौंध भरी ज़िंदगी में हम रिश्तों की असली कीमत भूलते जा रहे हैं? क्या आपने भी कभी अपने आसपास किसी ऐसे बुज़ुर्ग को देखा है जो अपने ही घर में बेगाना हो गया हो?

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मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल 

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