*हम अक्सर अपनों को खुश करने के लिए दौलत की चमक का सहारा लेते हैं, पर भूल जाते हैं कि बुजुर्गों की झुर्रियों में छिपी मुस्कान मखमली सोफों से नहीं, बल्कि अपनेपन के दो मीठे बोलों से खिलती है।*
“मयंक,” हरिनाथ जी ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा, “तुमने सोचा कि पैसा फेंककर तुम हमें वो खुशी दे दोगे जो शायद तुम समय देकर नहीं दे पाए। पर बेटा, माँ-बाप को बुढ़ापे में ‘लग्जरी’ नहीं, ‘लिहाज़’ और ‘लगाव’ चाहिए होता है। यह विमला, जिसे तुम किचन में छुपाकर रखना चाहते थे, आज इसी ने हमें वो सम्मान दिया जो बाहर की भीड़ में कहीं नहीं था—’अपनेपन का सम्मान’।”
शाम के सात बज चुके थे। ‘रॉयल हेरिटेज’ विला की सजावट देखते ही बनती थी। विदेशी फूलों की महक ने पूरे ड्राइंग रूम को घेर रखा था। छत से लटकते हुए क्रिस्टल के झूमर अपनी पूरी शानो-शौकत के साथ चमक रहे थे। यह शहर की सबसे बड़ी पार्टी होने वाली थी।
संजना के पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। वह एक सिरे से दूसरे सिरे तक भाग रही थी, अपनी डिज़ाइनर साड़ी को संभालते हुए। आज उसके सास-ससुर, बाबूजी (हरिनाथ जी) और माँजी (कौशल्या देवी) की 50वीं सालगिरह थी। संजना और उसके पति, मयंक, ने इस दिन को यादगार बनाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया था। शहर के सारे रईस, मयंक के बिज़नेस पार्टनर्स और सोशलाइट्स को न्योता दिया गया था।
“विमला! अरे ओ विमला!” संजना की आवाज़ में तनाव और हड़बड़ाहट साफ़ थी। “ये क्रॉकरी अभी तक टेबल पर क्यों नहीं लगी? और वो स्टार्टर्स की ट्रे कहाँ है? मेहमान किसी भी वक्त आते होंगे। आज अगर कोई भी कमी रह गई तो मेरी नाक कट जाएगी।”
रसोई के कोने में खड़ी विमला, जो घर की पुरानी नौकरानी थी, अपने एप्रन से हाथ पोंछते हुए बाहर आई। “जी मेमसाब, बस अभी लगा रही हूँ। वो… वो मेरी बेटी मुन्नी भी आज मेरे साथ आई है, उसका स्कूल बंद था और घर पर कोई नहीं था… तो…”
संजना ने माथा पीट लिया। “हे भगवान! विमला, तुम्हें कितनी बार कहा है कि पार्टी वाले दिन बच्चों को मत लाया करो। अब क्या वो इन वी.आई.पी. मेहमानों के बीच गंदे कपड़ों में घूमेगी? देखो, उसे बोलो पिछले आँगन में रहे या किचन के कोने में चुपचाप बैठी रहे। बाहर आने की ज़रूरत नहीं है।”
“जी मेमसाब,” विमला ने सिर झुका लिया और जल्दी से किचन में चली गई।
मयंक सीढ़ियों से उतरते हुए आया। वह बेहद कीमती सूट पहने हुए था। “संजना, सब तैयार है ना? मिस्टर खन्ना और मिस्टर मेहता बस पहुँचने ही वाले हैं। और हाँ, मम्मी-पापा तैयार हो गए?”
“हाँ, मैंने उन्हें तैयार करवा दिया है। पर मयंक, तुम्हें तो पता है ना बाबूजी का। वो फिर वही अपना पुराना, घिसा हुआ चश्मा और वो टूटी हुई छड़ी लेकर बैठने की ज़िद कर रहे थे। मैंने बड़ी मुश्किल से वो छड़ी छुपवाई है और उन्हें नया चश्मा दिया है। उन्हें समझा देना, प्लीज मेहमानों के सामने पुरानी बातें लेकर न बैठ जाएं,” संजना ने पल्लू ठीक करते हुए कहा।
ऊपर के कमरे में, हरिनाथ जी और कौशल्या देवी किसी सजे हुए पुतले की तरह बैठे थे। हरिनाथ जी ने एक शेरवानी पहनी थी जो उन्हें काट रही थी, और कौशल्या देवी के गले में भारी हीरो का हार था जिसका वजन उनकी गर्दन झुकाए दे रहा था।
“कौशल्या, ये पानी का गिलास देना जरा, गला सूख रहा है,” हरिनाथ जी ने कहा।
कौशल्या देवी ने पास रखे जग से पानी दिया। “अजी, आज तो खुश हो जाओ। बेटे-बहू ने इतना खर्चा किया है, पूरा शहर देख रहा है।”
हरिनाथ जी ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, “देख तो रहा है, पर क्या हम जी रहे हैं? उस शेरवानी में दम घुट रहा है मेरा। और वो मेरी छड़ी… संजना ने कहीं रखवा दी। उसके बिना तो मुझे चलने में भी डर लगता है।”
“चुप रहो अब,” कौशल्या देवी ने उन्हें डांटा, पर उनकी अपनी आँखों में भी एक अजीब सी उदासी थी। “बच्चों की खुशी के लिए आज नाटक कर लो। वो कहते हैं ना, ‘स्टेटस’ का सवाल है।”
पार्टी शुरू हुई। हॉल मेहमानों से भर गया। अंग्रेजी संगीत बज रहा था, वेटर चांदी की तश्तरियों में खाना परोस रहे थे। मयंक और संजना ने गर्व के साथ अपने माता-पिता को सबके सामने स्टेज पर खड़ा किया। केक काटा गया, तालियां बजीं।
मेहमान आ-आकर बधाई दे रहे थे।
“अरे मयंक, क्या पार्टी दी है यार! तुम्हारे पेरेंट्स तो बहुत लकी हैं,” मिस्टर मेहता ने शैम्पेन का गिलास उठाते हुए कहा।
मयंक का सीना गर्व से चौड़ा हो गया।
हरिनाथ जी और कौशल्या देवी स्टेज पर बैठे-बैठे मुस्कुराते रहे, लेकिन उनकी आँखें भीड़ में कुछ ढूंढ रही थीं। शायद कोई अपना, जिससे वो दिल की बात कह सकें। पर यहाँ तो सब औपचारिक थे। “कांग्रेचुलेशंस”, “यू लुक ग्रेट”—बस यही शब्द गूंज रहे थे। किसी ने यह नहीं पूछा कि “बाबूजी, घुटनों का दर्द कैसा है?”
करीब एक घंटे बाद, हरिनाथ जी को घबराहट होने लगी। एसी की ठंडक और परफ्यूम की तेज़ खुशबू उनके सिर पर चढ़ गई थी। उन्होंने कौशल्या से इशारे में कहा और धीरे से स्टेज से नीचे उतर गए। संजना मेहमानों में व्यस्त थी, उसने ध्यान नहीं दिया।
हरिनाथ जी भीड़ से बचते हुए, लड़खड़ाते कदमों से (बिना छड़ी के) किचन की तरफ बढ़े। उन्हें बस थोड़ा सादा पानी और शांति चाहिए थी।
जैसे ही वो किचन के गलियारे में पहुंचे, उन्होंने देखा कि विमला ज़मीन पर बैठी है और उसकी आठ साल की बेटी, मुन्नी, कोने में बैठी अपनी फटी हुई गुड़िया से खेल रही है।
हरिनाथ जी को वहां देखकर विमला हड़बड़ा कर खड़ी हो गई। “अरे बड़े साहब! आप यहाँ? कुछ चाहिए था क्या? मैं अभी लाती हूँ।”
“नहीं-नहीं विमला, तुम बैठो,” हरिनाथ जी ने हाथ के इशारे से उसे रोका और पास रखे एक छोटे से प्लास्टिक के स्टूल पर बैठ गए। उन्होंने अपनी शेरवानी का ऊपर का बटन खोला और एक गहरी सांस ली। “आह! यहाँ सुकून है।”
मुन्नी ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से हरिनाथ जी को देखा। उसने अपनी गुड़िया नीचे रखी और अपनी फ्रॉक की जेब से एक पारले-जी बिस्किट का आधा पैकेट निकाला।
“दादू, बिस्किट खाओगे? मेरी माँ ने दिया है,” मुन्नी ने मासूमियत से पूछा।
विमला ने मुन्नी को डांटा, “चुप कर मुन्नी! साहब हैं वो। ये सब नहीं खाते।”
हरिनाथ जी की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने मुस्कुराते हुए हाथ बढ़ाया। “ला बेटा, दे दे। बाहर तो वो अजीब से नाम वाले खाने हैं जो चबाए भी नहीं जाते। भूख तो मुझे भी लगी थी।”
हरिनाथ जी ने वो बिस्किट खाया। फिर उन्होंने विमला से कहा, “विमला, एक कप वो अपनी वाली अदरक वाली कड़क चाय बना देगी? इस भीड़-भाड़ और एसी ने तो दिमाग सुन्न कर दिया है।”
विमला मुस्कुराई। “अभी बनाती हूँ साहब।”
थोड़ी देर बाद, कौशल्या देवी भी उन्हें ढूंढते-ढूंढते किचन में आ गईं। पति को स्टूल पर बैठकर चाय की चुस्की लेते और मुन्नी के साथ खेलते देख, उनके चेहरे पर भी वो असली मुस्कान आ गई जो स्टेज पर गायब थी।
“अच्छा! तो यहाँ महफिल जमी है और मैं वहां अकेली बैठी बोर हो रही हूँ,” कौशल्या देवी ने नकली गुस्सा दिखाया और वो भी पास रखे आटे के कनस्तर पर बैठ गईं। उन्होंने अपनी भारी ज्वैलरी उतारकर साइड में रख दी।
“आओ भागवान, तुम भी बैठो। असली पार्टी तो यहाँ है,” हरिनाथ जी हंसे।
अब नज़ारा कुछ ऐसा था—करोड़ों के विला के आलीशान किचन में, घर के मालिक और मालकिन, नौकरानी और उसकी बेटी के साथ ज़मीन पर बैठकर बातें कर रहे थे। विमला ने उनके लिए आचार और सादी रोटी परोसी। हरिनाथ जी ने मुन्नी को अपनी जवानी के किस्से सुनाने शुरू कर दिए—कैसे वो साइकिल पर कौशल्या को बिठाकर ले जाते थे, कैसे उन्होंने मयंक की फीस भरने के लिए अपनी घड़ी बेची थी।
बाहर डीजे का शोर था, पर अंदर हंसी के ठहाके गूंज रहे थे। मुन्नी हरिनाथ जी की गोद में चढ़ गई थी और उनकी शेरवानी के चमकीले बटन गिन रही थी। कौशल्या देवी विमला से गाँव की बातें पूछ रही थीं।
उधर हॉल में, केक कटिंग के बाद मयंक की नज़र माता-पिता की खाली कुर्सियों पर पड़ी। वह घबरा गया।
“संजना, मम्मी-पापा कहाँ हैं?”
दोनों ने उन्हें ढूंढना शुरू किया। बाथरूम, लॉन, गेस्ट रूम—सब खाली थे। मयंक का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। “इतनी रात को कहाँ चले गए?”
तभी संजना को किचन की तरफ से हंसने की आवाज़ आई।
मयंक और संजना तेज़ कदमों से किचन की ओर लपके। दरवाज़े पर पहुँचते ही जो नज़ारा उन्होंने देखा, उसने उनके पैरों को वहीं जमा दिया।
उनके पिता, जो बाहर स्टेज पर बुझे-बुझे से लग रहे थे, यहाँ मुन्नी के साथ ताली बजाकर हंस रहे थे। उनकी माँ, जो हीरो के हार के बोझ से दबी थीं, अब सुकून से आचार-रोटी खा रही थीं।
“पापा? मम्मी?” मयंक ने अविश्वास से पुकारा। “आप लोग यहाँ… नौकरों के साथ… ज़मीन पर? बाहर सब आपका इंतज़ार कर रहे हैं। ये क्या तमाशा है?” संजना ने भी नाक सिकोड़ी, “विमला, तुमने इन्हें यहाँ क्यों बिठा रखा है?”
हरिनाथ जी और कौशल्या देवी की हंसी रुक गई। मुन्नी डरकर अपनी माँ के पीछे छुप गई।
हरिनाथ जी धीरे से स्टूल से खड़े हुए। उन्होंने मयंक की आँखों में देखा। आज उनकी आँखों में वो झिझक नहीं थी जो सुबह से थी।
“तमाशा हम यहाँ नहीं, बाहर कर रहे थे बेटा,” हरिनाथ जी की आवाज़ शांत लेकिन गंभीर थी।
“क्या मतलब?” मयंक ने पूछा।
“मयंक,” हरिनाथ जी ने मुन्नी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “तुमने हमारे लिए लाखों खर्च किए, वो झूमर, वो खाना, वो कपड़े… हम तुम्हारी मेहनत की कद्र करते हैं। पर बेटा, तुमने हमारे लिए ‘पार्टी’ रखी, ‘खुशी’ नहीं।”
“पापा, मैंने सब कुछ तो बेस्ट किया है। शहर का बेस्ट कैटरर, बेस्ट डेकोरेशन…” मयंक ने सफाई दी।
“हाँ बेटा, सब बेस्ट था,” कौशल्या देवी बीच में बोलीं, “पर उस बेस्ट में हमारा ‘सुकून’ कहीं खो गया था। तुमने हमें वो कपड़े पहनाए जिनमें हम सांस नहीं ले पा रहे थे। तुमने मेरे पति की वो छड़ी छीन ली जो उनका सहारा है, सिर्फ इसलिए कि वो ‘पुरानी’ लगती है। तुमने वो लोग बुलाए जो हमें नहीं, हमारी ‘हैसियत’ को जानते हैं।”
हरिनाथ जी ने आगे कहा, “बेटा, हम बूढ़े लोग हैं। हमें चांदी के बर्तनों में परोसे गए बेस्वाद खाने से ज़्यादा, मिट्टी के कुल्हड़ वाली चाय और प्यार से परोसी गई रोटी में स्वाद आता है। बाहर उस हॉल में हम ‘शोपीस’ थे, लेकिन इस किचन में, इस बच्ची और विमला के साथ, हमें लगा कि हम इंसान हैं। यह बच्ची मुझे ‘सर’ नहीं ‘दादू’ कहकर बुला रही है। इसने मुझे मेरी अमीरी के लिए नहीं, बल्कि मेरी कहानियों के लिए प्यार दिया।”
संजना और मयंक सन्न रह गए। कमरे में सन्नाटा छा गया। एसी की आवाज़ के सिवा कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।
“मयंक,” हरिनाथ जी ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा, “तुमने सोचा कि पैसा फेंककर तुम हमें वो खुशी दे दोगे जो शायद तुम समय देकर नहीं दे पाए। पर बेटा, माँ-बाप को बुढ़ापे में ‘लग्जरी’ नहीं, ‘लिहाज़’ और ‘लगाव’ चाहिए होता है। यह विमला, जिसे तुम किचन में छुपाकर रखना चाहते थे, आज इसी ने हमें वो सम्मान दिया जो बाहर की भीड़ में कहीं नहीं था—’अपनेपन का सम्मान’।”
मयंक की आँखों में आंसू आ गए। उसे अपनी गलती का एहसास हो गया था। वह जिस कामयाबी के नशे में चूर था, उसने उसे अंधा कर दिया था। उसे लगा था कि वह अपने माता-पिता को दुनिया की हर खुशी दे रहा है, पर असल में उसने उन्हें उनके असली वजूद से ही दूर कर दिया था।
संजना का सिर भी शर्म से झुक गया। उसे मुन्नी का चेहरा देखकर अपनी गलती महसूस हुई।
मयंक ने आगे बढ़कर अपने पिता के पैर छुए। “मुझे माफ़ कर दीजिये पापा। मैं भूल गया था कि खुशी दिखावे में नहीं, महसूस करने में होती है।”
हरिनाथ जी ने उसे गले लगा लिया।
अगले ही पल, मयंक ने विमला और मुन्नी का हाथ पकड़ा। “चलो विमला काकी, चलो मुन्नी।”
“कहाँ साहब?” विमला घबरा गई।
“वहीं, जहाँ पार्टी चल रही है,” मयंक ने मुस्कुराते हुए कहा। “आज की पार्टी की असली मेहमान मुन्नी है, जिसने मेरे पापा को उनकी मुस्कान वापस दी।”
उस रात ‘रॉयल हेरिटेज’ विला में एक अजीब नज़ारा देखा गया। शहर के रईसों के बीच, स्टेज पर हरिनाथ जी अपनी पुरानी छड़ी थामे खड़े थे (जो मयंक खुद ढूंढकर लाया था), और उनके साथ साधारण कपड़ों में विमला और नन्हीं मुन्नी केक काट रहे थे। संजना ने खुद मुन्नी को केक खिलाया।
हरिनाथ जी माइक पर बोले, “दोस्तों, आज मेरी 50वीं सालगिरह है। और आज मेरे बेटे ने मुझे सबसे कीमती तोहफा दिया है—यह एहसास कि अमीरी जेब में नहीं, दिल में होनी चाहिए।”
तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूंज उठा। लेकिन इस बार वो तालियां रस्म अदायगी नहीं थीं, बल्कि उन आंसुओं और मुस्कानों के लिए थीं जो सबके चेहरों पर तैर रही थीं। उस रात चांदी के बर्तनों की खनक के बीच, मिट्टी की सौंधी खुशबू जीत गई थी।
**कहानी के अंत में एक विचार:**
दोस्तो, हम अक्सर आधुनिकता की दौड़ में अपने संस्कारों और सादगी को पीछे छोड़ देते हैं। हमें लगता है कि महंगे तोहफे हमारे बुजुर्गों को खुश कर देंगे, जबकि वे तरसते हैं बस दो पल साथ बैठकर बात करने के लिए। विमला और मुन्नी ने साबित कर दिया कि रिश्ते खून के नहीं, एहसास के होते हैं।
**क्या इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया?**
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मूल लेखिका : राधिका गोखले