*”दूसरों को अपनी रईसी दिखाने के चक्कर में बेटा कर्ज़ के दलदल में धंसता चला गया, लेकिन पिता ने अपनी बरसों की जमा-पूंजी देकर उसे दौलत का नहीं, बल्कि ‘सुकून’ का असली मतलब समझाया।”*
राघव के हाथों से लिफाफा छूट गया। वह रो पड़ा और पिता के घुटनों पर सिर रख दिया। “नहीं बाबूजी, मैं आपके इलाज के पैसे नहीं ले सकता। मुझसे गलती हो गई। मैं दोस्तों की देखा-देखी में बह गया था। मुझे लगा कि महंगी चीजें खरीदकर मैं उनकी बराबरी कर लूंगा। मुझे माफ़ कर दीजिए।”
शाम की हल्की ठंडक में राघव अपने घर की सीढ़ियां चढ़ रहा था, लेकिन उसके कदमों में वह उत्साह नहीं था जो आमतौर पर पहली तारीख को तनख्वाह मिलने पर होता है। उसके हाथ में एक बड़ा सा चमकदार डिब्बा था—एक महंगा स्मार्ट एलईडी टीवी।
राघव एक मध्यमवर्गीय परिवार से था। उसके पिता, मास्टर दीनानाथ जी, एक सेवानिवृत्त स्कूल अध्यापक थे, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी साइकिल की पैडल मारते हुए और ट्यूशन पढ़ाते हुए गुज़ार दी थी ताकि राघव एक अच्छी नौकरी पा सके। राघव को शहर की एक एमएनसी में नौकरी मिले अभी छह महीने ही हुए थे।
दरवाज़ा खुला तो मां, सुमित्रा जी, आरती की थाली लिए खड़ी नहीं थीं, लेकिन उनकी आंखों में बेटे के लौटने का इंतज़ार ज़रूर था। राघव ने उत्साह का एक मुखौटा ओढ़ा और ज़ोर से बोला, “मां, बाबूजी, देखो मैं क्या लाया हूँ!”
दीनानाथ जी अपने पुराने चश्मे को नाक पर टिकाते हुए अखबार से नज़रें हटाकर बोले, “क्या है भाई? इतना बड़ा डिब्बा?”
राघव ने शान से डिब्बा खोला। 55 इंच का शानदार टीवी। सुमित्रा जी के मुंह से निकला, “हे भगवान! इतना बड़ा टीवी? बेटा, इसकी क्या ज़रूरत थी? हमारा पुराना वाला तो अभी ठीक चल रहा है।”
राघव ने अपनी कॉलर ठीक करते हुए कहा, “मां, अब वो ज़माना गया। मेरे सारे कलीग्स के घर में होम थियेटर है। और वैसे भी, मुझे कंपनी से ‘दिवाली बोनस’ मिला है। मैंने सोचा, इस बार घर का नक्शा बदल दिया जाए।”
दीनानाथ जी ने टीवी की तरफ देखा, फिर राघव की तरफ। उनकी अनुभवी आंखों ने कुछ भांप लिया था, लेकिन वे चुप रहे। टीवी की कीमत राघव की महीने भर की तनख्वाह से भी ज्यादा लग रही थी।
“बोनस?” दीनानाथ जी ने धीमे स्वर में पूछा। “अभी तो दिवाली में चार महीने बाकी हैं राघव, कंपनी इतनी जल्दी बोनस दे रही है?”
राघव थोड़ा सकपकाया, लेकिन उसने बात संभाल ली, “अरे बाबूजी, वो… वो ‘परफॉरमेंस बोनस’ है। मैंने पिछले प्रोजेक्ट में बहुत अच्छा काम किया था ना, इसलिए बॉस खुश हो गए।”
घर में खुशी का माहौल बन गया। पड़ोसी भी नया टीवी देखने आए। राघव की छाती गर्व से फूल गई। उसे लगा कि आज उसने साबित कर दिया है कि वह अब ‘बड़ा आदमी’ बन गया है।
लेकिन असलियत कुछ और थी।
राघव को कोई बोनस नहीं मिला था। दरअसल, ऑफिस में उसके दोस्तों ने उसे ताना मारा था कि वह अभी भी पुराने ख्यालातों में जीता है। अपनी झूठी शान और दोस्तों के बीच ‘स्टेटस’ बनाए रखने के लिए उसने यह टीवी क्रेडिट कार्ड पर ईएमआई (किस्तों) पर लिया था। और सिर्फ टीवी ही नहीं, पिछले दो महीनों में उसने एक महंगा फोन और ब्रांडेड कपड़े भी क्रेडिट कार्ड घिसकर ले लिए थे। उसे लगा था कि धीरे-धीरे चुका देगा, लेकिन अब किस्तों का बोझ उसकी गर्दन तक आ चुका था।
अगले कुछ हफ्ते घर में नए टीवी की धूम रही, लेकिन राघव के चेहरे की रौनक गायब होती गई। महीने की 10 तारीख आते-आते उसके पास पेट्रोल डलवाने तक के पैसे नहीं बचते थे। वह चिड़चिड़ा हो गया था। मां कुछ पूछतीं तो झल्लाकर जवाब देता।
एक रात, करीब 2 बजे, दीनानाथ जी पानी पीने के लिए उठे। उन्होंने देखा कि राघव बालकनी में खड़ा है और किसी से फोन पर बहुत दबी आवाज़ में, लेकिन गुस्से में बात कर रहा है।
“हां भाई, दे दूंगा… कहा ना अगले हफ्ते तक इंतज़ाम कर दूंगा। प्लीज घर पर फोन मत करना… मेरी इज़्ज़त का सवाल है। यार, क्रेडिट कार्ड का बिल ही तो है, भाग थोड़ी रहा हूँ।”
दीनानाथ जी ठिठक गए। ‘क्रेडिट कार्ड’, ‘बिल’, ‘इज़्ज़त’—ये शब्द उनके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरे। वे चुपचाप अपने कमरे में लौट आए, लेकिन उस रात वे सो नहीं सके। उन्हें समझ आ गया कि वह ‘परफॉरमेंस बोनस’ असल में ‘कर्ज का फंदा’ था।
अगले दिन रविवार था। राघव देर तक सोता रहा। जब वह उठा, तो देखा कि दीनानाथ जी अपने पुराने लोहे के संदूक (ट्रंक) को खोलकर कुछ ढूंढ रहे हैं।
“क्या ढूंढ रहे हैं बाबूजी?” राघव ने जम्हाई लेते हुए पूछा।
दीनानाथ जी ने एक पुरानी डायरी और बैंक की पासबुक निकाली। उन्होंने राघव को अपने पास बैठने का इशारा किया।
“राघव, ज़रा हिसाब तो लगाओ। अगर मैं अपनी पेंशन से हर महीने 2000 रुपये बचाऊं, तो 50,000 जोड़ने में कितने महीने लगेंगे?”
राघव ने गणित लगाया, “करीब दो साल, बाबूजी। क्यों? आपको क्या चाहिए?”
दीनानाथ जी ने चश्मा उतारा और राघव की आंखों में सीधे देखा। “मुझे कुछ नहीं चाहिए बेटा। मुझे बस यह जानना है कि जिस टीवी को तुम ‘बोनस’ बताकर लाए हो, उसकी असल कीमत क्या है? रुपये में नहीं… तुम्हारे सुकून के बदले।”
राघव का चेहरा पीला पड़ गया। “बा… बाबूजी, आप क्या कह रहे हैं?”
दीनानाथ जी ने शांत स्वर में कहा, “बेटा, दीवारें पतली हैं और रात के सन्नाटे में आवाज़ें दूर तक जाती हैं। मैंने कल रात तुम्हारी बातें सुन ली थीं।”
राघव की नज़रें झुक गईं। वह शर्म से गड़ गया।
दीनानाथ जी ने एक लिफाफा राघव के हाथ में रखा। “ये लो। इसमें 70,000 रुपये हैं। ये मैंने अपनी मोतियाबिंद की सर्जरी के लिए जमा किए थे। जाओ, और अपना वो क्रेडिट कार्ड का कर्ज़ चुका आओ।”
राघव के हाथों से लिफाफा छूट गया। वह रो पड़ा और पिता के घुटनों पर सिर रख दिया। “नहीं बाबूजी, मैं आपके इलाज के पैसे नहीं ले सकता। मुझसे गलती हो गई। मैं दोस्तों की देखा-देखी में बह गया था। मुझे लगा कि महंगी चीजें खरीदकर मैं उनकी बराबरी कर लूंगा। मुझे माफ़ कर दीजिए।”
दीनानाथ जी ने उसके सिर पर हाथ फेरा और उसे उठाया। “बैठो राघव।”
उन्होंने पानी का गिलास उसे दिया और फिर भारी मन से बोले, “बेटा, जानते हो ‘अमीर’ और ‘रईस’ में क्या फर्क होता है? रईस वो है जो अपनी कमाई से शौक पूरे करता है, और गरीब वो है जो ‘दिखावे’ के लिए कर्ज लेता है। तुमने वो टीवी और फोन अपनी खुशी के लिए नहीं, दूसरों को जलाने के लिए खरीदे। और याद रखना, दूसरों को जलाने के चक्कर में हम अक्सर खुद का घर जला बैठते हैं।”
राघव सिसक रहा था।
दीनानाथ जी ने आगे कहा, “जब मैं नौकरी करता था, तो मेरे साथी स्कूटर से आते थे और मैं साइकिल से। मुझे भी शर्म आती थी। मन करता था कि उधार लेकर स्कूटर ले लूं। पर मैंने नहीं लिया। जानते हो क्यों? क्योंकि साइकिल की सवारी में मुझे रात को चैन की नींद आती थी, और उधार के स्कूटर पर मुझे रातों को जागना पड़ता। बेटा, ‘सुकून’ की कोई ईएमआई नहीं होती। यह तनख्वाह मिलने पर नहीं, बल्कि कर्जमुक्त होने पर मिलता है।”
“मैं यह सब वापस कर दूंगा बाबूजी। मैं टीवी बेच दूंगा, फोन बेच दूंगा,” राघव ने आंसू पोंछते हुए कहा।
“नहीं,” दीनानाथ जी ने रोका। “सामान बेचने से इज़्ज़त कम होगी, और वो मैं होने नहीं दूंगा। ये पैसे लो, कर्ज़ चुकाओ। लेकिन मेरी एक शर्त है।”
“क्या शर्त है बाबूजी?”
“अगले छह महीने तक, तुम घर के खर्च में एक रुपया नहीं दोगे। अपनी पूरी तनख्वाह से तुम यह पैसा (जो मैं तुम्हें दे रहा हूँ) वापस मेरे खाते में जमा करोगे। जब तक तुम अपनी मेहनत की कमाई से इस कर्ज़ को नहीं उतारते, तब तक यह टीवी तुम्हारे लिए मनोरंजन नहीं, बल्कि एक ‘सबक’ बनकर दीवार पर टंगा रहेगा। जब भी इसे देखोगे, तुम्हें याद आना चाहिए कि झूठी शान का बोझ कितना भारी होता है।”
राघव ने कांपते हाथों से लिफाफा लिया। उसे वह लिफाफा दुनिया के किसी भी ‘बोनस’ से ज्यादा भारी लग रहा था।
उस दिन राघव ने एक बड़ा पाठ सीखा। वह तुरंत बैंक गया और उसने अपने क्रेडिट कार्ड का पूरा भुगतान किया। घर लौटकर उसने सबसे पहले उस क्रेडिट कार्ड के दो टुकड़े कर दिए।
अगले छह महीने राघव के लिए तपस्या जैसे थे। उसने कोई नई कमीज़ नहीं खरीदी, दोस्तों के साथ पार्टी में जाना बंद कर दिया, बाहर का खाना छोड़ दिया। वह बस ऑफिस जाता और घर आता। हर महीने की पहली तारीख को वह चुपचाप अपनी तनख्वाह का बड़ा हिस्सा पिता के हाथ में रख देता।
छह महीने बाद, जब आखिरी किश्त दीनानाथ जी के हाथ में रखी गई, तो दीनानाथ जी मुस्कुराए।
“अब तुम सच में ‘अमीर’ हो गए हो राघव,” उन्होंने कहा।
“कैसे बाबूजी?”
“क्योंकि आज तुम्हारी आंखों में वो डर नहीं है जो छह महीने पहले था। आज तुम नज़रों से नज़रें मिलाकर बात कर रहे हो। यही असली कमाई है। याद रखना, चादर देखकर पैर पसारना कोई मजबूरी नहीं, बल्कि समझदारी होती है। जिस दिन तुम अपनी कमाई से, बिना किसी को जवाब दिए, अपनी मर्जी की चीज़ खरीद सको, वही असली ‘स्टेटस’ है।”
राघव ने पिता के चरण स्पर्श किए। “बाबूजी, आज के बाद इस घर में कोई भी सामान ‘दिखावे’ के लिए नहीं आएगा, सिर्फ ‘ज़रूरत’ और ‘खुशी’ के लिए आएगा।”
उस शाम जब राघव ने टीवी चलाया, तो उसे वह टीवी वाकई खूबसूरत लगा, क्योंकि आज वह टीवी किसी कर्ज़ की निशानी नहीं, बल्कि उसके आत्म-नियंत्रण और पिता की सीख का प्रतीक था।
उस दिन के बाद राघव ने जीवन में तरक्की तो बहुत की, बड़ी गाड़ियां और बड़े घर भी खरीदे, लेकिन कभी भी अपनी नींद बेचकर कोई सपना नहीं खरीदा।
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**लेखक का संदेश:**
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मूल लेखिका : गरिमा चौधरी