बस गजेन्द्र अब बहुत हो गया, तुम्हारी नौकरी लगे भी दो साल हो गए। हम लड़की वालों को क्या जवाब दे। एक से बढ़कर एक रिश्ते आऐ हैं, तुम्हें जो पसन्द हो हमें बता दो। अगर तुमने कोई पसंद कर रखी हो तो वह बता दो। बेटा शादी की उम्र निकल जाएगी तो अच्छे रिश्ते भी नहीं आऐंगे। मेरी और तुम्हारी माँ की उम्र ढल रही है, हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते हैं। तुम्हारी दादी कब से पोते की बहू को देखने की आस लगाए बैठी है। बेटा कल तुम फिर पूना चले जाओगे।
इस शनिवार को जब आओ अपना निर्णय बता देना, बस इस वर्ष तुम्हारी शादी करनी है,तुम्हें समझाते – समझाते थक गया हूँ, आज आखरी बार कह रहा हूँ, समझ जाओ, वरना करते रहना अकेले शादी, हम पक्के पान है ना जाने कब झड़ जाए।’ रमेश जी की आवाज में कुछ गुस्सा था और कुछ उदासी।
गजेन्द्र कुछ नहीं बोल सका, उसके पापा की बातें तर्कसंगत थी, और सही थी। गजेन्द्र को शादी तो करनी थी, मगर उससे पहले वह अपने बचपन की मित्र मीनू से मिलना चाहता था, क्यों उसे खुद को पता नहीं था। बचपन की दोस्ती थी,मीनू उसके पड़ोस में रहती थी और पहली से पॉंचवी तक दोनों एक साथ पड़े थे, उसके बाद उसके पापा का तबादला हो गया और वे मुम्बई में चले गए उसके बाद दोनों परिवार आपस में मिले ही नहीं।
बचपन की इस दोस्ती को प्यार का नाम तो दिया नहीं जा सकता। गजेन्द्र को तो यह मालुम भी नहीं था कि वो कहाँ है, उसका विवाह हुआ है या नहीं। बस एक ही ख्वाहिश उसके मन में थी कि विवाह के पहले वह एक बार मीनू से मिल ले।उसके लिए इतने रिश्ते आए पर उसने ध्यान से किसी तस्वीर को देखा ही नहीं, बस यही खयाल मन में था कि एक बार मीनू से मिल ले, फिर समस्या का भी समाधान हो जाएगा वही पसंद कर देगी कि किससे शादी करनी है, बचपन में भी जब किसी चीज को चाहे वह उसका बस्ता हो, कपड़े हो या खिलौना हो पसंद करने की दुविधा होती वह मीनू से पसंद करवाता था, बचपन में बहुत कमज़ोर था और जल्दी बिमार पढ़ जाता था, तब मीनू अपनी मम्मी के साथ मंदिर जाती कभी उसके लिए प्रसाद लाती तो कभी भगवान को चढ़ाया हुआ फूल लेकर आती और कहती गज्जू इस फूल को अपने पास रखना तेरी तबियत जल्दी अच्छी हो जाएगी।
कभी कोई कहता मीनू बड़ी होकर क्या बनेगी तो अपनी गोल गोल ऑंखें घुमाकर कहती ‘मुझे बहुत मेहनत करना पड़ेगा, डॉक्टर बनूँ गी तभी तो गज्जू का ध्यान रख पाऊँगी। और सब उसकी बात पर हंस देते। सहज, बालसुलभ बातें थी।
गज्जू पूना में अपने ऑफिस जा रहा था,और न जाने क्यों आज ये सारी बातें उसके दिल पर दस्तक दे रही थी, एक तरफ पिता की बात याद आ रही थी कि हम न रहैं तो अकेले करते रहना शादी। वह विचारों में उलझा था, उसकी गाड़ी का बैलेंस बिगड़ा और वह एक कार से टकरा गया।
भीड़ जमा हो गई। कार चालक भला आदमी था, उसे अस्पताल में भर्ती कराया, उसके मोबाइल में नम्बर देखकर उसके घर फोन लगाया। माता पिता तुरन्त भोपाल से पूना के लिए रवाना हो गए। वह बेहोश हो गया था, हाथ पैर पर बहुत चोट आई थी। जब उसे होश आया तो नर्स डॉक्टर को बुलाने गई। डॉक्टर आई नहीं उसने फोन से बात की कहा ‘अब कैसा लग रहा है,इतने वर्षों के बाद मिले और वह भी इस हाल में, तुम इतने लापरवाह कैसे हो गज्जू,तुम कब सुधरोगे। ‘ गजेन्द्र को कुछ समझ नहीं आ रहा था, उसे अस्पताल कौन लेकर आया, और फोन पर यह आवाज यह तो बिल्कुल मीनू जैसी है और मुझे गज्जू तो बस वही कहती थी।
पर वह यहाँ कैसे, शायद मेरा भ्रम है, मै उसके बारे में सोच रहा था शायद इसलिए….। वह फोन पकड़े चुपचाप बैठा था, तभी मीनू उसके सामने आई बोली, आखिर बनना पढ़ा न मुझे डॉक्टर, उसके चेहरे पर मुस्कान थी। हल्के गुलाबी रंग के सलवार सूट पर सफेद रंग का डॉक्टर वाला कोट उसके ऊपर बहुत सुन्दर लग रहा था। वह बोली अब मैं मंदिर से फूल लेकर नहीं आती सीधे सुई लगाती हूँ। उसने एक इन्फेक्शन लगाया, वह बस इतना बोला- ‘कौन मीनू?’ ‘ हॉं मैं मीनू ही हूँ, अशभी तुम आराम करो, शाम को बहुत सारी बातें करेंगे।
दवाई के असर से गजेन्द्र को नींद आ गई। शाम तक गजेन्द्र के पापा -मम्मी भी आ गए थे। वे बहुत घबराए हुए थे, वे मीनू को नहीं पहचान पाए। वह बोली अंकल – आंटी आपने मुझे पहचाना नहीं मैं आपकी मीनू हूँ,कल गज्जू की अस्पताल से छुट्टी हो जाएगी, आप दोनों चिन्ता न करे।’ दोनों ने मीनू को आशीर्वाद दिया।वह बोली – मम्मी और मैं अब पूना में ही रहते हैं, वे आपको देखकर बहुत खुश होगी।’ रमेश जी ने कहा- और संजय बाबू। ‘ पापा अब दुनियाँ में नहीं है, उसकी आवाज और ऑंखें दोनों मे नमी आ गई थी। मीरा जी ने उसके सिर पर हाथ रखा।
आगे कोई कुछ नहीं बोल पाया। वह उन्हें अपने घर ले गई। मीनू की अस्पताल में ड्यूटी थी, वह फिर अस्पताल आ गई।उन तीनों ने बहुत सारी बातें की, अपने पुराने दिन याद किए। संजय बाबू को याद कर सब उदास हो गए। मीनू की मम्मी मालती जी ने कहा आप मीनू को समझाइए कहती है, शादी नहीं करेगी, उसे हर पल मेरी चिंता रहती है, कहती है कि मेरी शादी के बाद आप अकेली रह जाऐगी। अब रमेश जी ने कहा गजेन्द्र भी शादी के लिए तैयार नहीं हो रहा है, उसके मन में क्या है कुछ समझ में नहीं आ रहा।’
मालती जी ने कहा भाई साहब आज मीनू के पापा तो है नहीं, आप मीनू को अच्छे से जानती और मुझे भी गजेन्द्र बहुत अच्छा लगता है। दोनों बचपन के मित्र है, क्यों न हम इनकी दोस्ती को रिश्ते में बदल दे, अगर आपको आपत्ति न हो तो हम बच्चों से बात करें। रमेश बाबू ने कहा अगर बच्चे इस रिश्ते से खुश है तो हमें भी कोई आपत्ति नहीं है। दूसरे दिन सुबह मीनू और गजेन्द्र भी आ गए जब उनके सामने यह बात रखी तो गजेन्द्र बोला पापा मुझे यह रिश्ता मंजूर है। मीनू फुदकती हुई बोली और मैं तो डॉक्टर ही गज्जू के लिए बनी हूँ। सब खिलखिलाकर हंस पड़े।दोनों का विवाह हो गया और इस तरह बचपन के दोस्त एक पवित्र बंधन में बंध गए थे।जिनके शीष पर बड़ो का आशीर्वाद था और सर्वत्र खुशियों का साम्राज्य था।
प्रेषक
पुष्पा जोशी
स्वरचित, मौलिकबेटियॉं डॉट इन साप्ताहिक विषय
विषय-#पहला प्यार