दास बाबु की डायरी – प्रेषक प्रभा पारीक

पुरानी दिल्ली का चाँदनी चौक में पहाड़गंज का वह भीड़-भाड़ भरा पुराना ईलाका।  पता नहीं क्यों वहाँ एक ही तरह की रौनक ओर जिन्दा दिली सदा पसरी रहती। जो किसी की भी समझ के परे था। गरीब होते हुये भी यहाँ कोई उदास नहीं दिखता । चहकते से नजर आते चैहरेां के लोग,दास बाबु का जब भी अन्य बड़े शहरों  में जाना हुआ उन्होंने मससूस किया कि खूब कमाने और दिल खोलकर खर्च करने के बावजूद वहाँ के अधिकांश चैहरो पर एक उदासी और बेचारगी नजर आती है। साफ-सुथरे  मंहगे कपड़े ,करीने से जमें  बालों ,शानदार सूट-बूट पहने खुशब से सरोबार होने के बावजूद  भी उनके चैहरे सदा बेनूर ही नजर आते । दास बाबु को इसका कारण लोगो की सोच व मानसिकता लगता।

   गाँव छोड़ वर्षो पहले वह चाँदनी चौक के इस संकरे इलाके में आ बसे थे। उन्हें  लगता की मनुष्य जहाँ वर्षो निवास करता है, वहीं का हो जाये ये उसकी मजबूरी नहीं होती पर यह समझदारी जरूर  होती हैं। जितनी सकारात्मकता दिल्ली के इस ईलाके में नजर आती उतनी उन्हें  अपने स्वयं के गॉव में भी कभी नजर नहीं आई। बेतरतीब से कपडे़ पहने जोर-जोर से बोलते, गाने सुनते, हँसते-खिलखिलाते एक दूसरे को बात-बात में गालियॉ देते ये लोग, ,पर रहते साथ ही,सुखः दुखः के ये साथी, सदा मिल बांट कर खाने वाले उनके मौहल्ले के लोगों के संतोष का आलम यह था कि सभी अपनी बातों से अपने व्यवहार से करोडपति ही नजर आते ।

    दास बाबु का दो कमरों का घर और सामने छोटी सी छत परिवार को बडे़ बंगले में रहने सा आनन्द देती। पत्नि कपड़े सुखाने, पापड़ सुखाने, बतियाने से लेकर दिन में सोने तक वहीं बनी रहतीं। उसी छत का एक कौना दास बाबु का जिसमें बैठ कर वह अखबार पठते, अपना प्रिय रेडियो सुनते। बाकी जगह बच्चों का अधिकार श्रेत्र था। सदा खुश रहने वाला परिवार। जहाँ दास बाबु एक साधारण नौकरी करने वाले मैहनत की कमाई घर लाने से पहले कितने पन्नों में हिसाब लिखते । आने वाले खर्चो के साथ न जाने कितने बाकी हिसाब मुँह बांये खडें नजर आते। दास बाबु को हर हिसाब लिख कर रखने की आदत थी। युं भी जब ख्वाबों के रास्ते जरूरतों की और मुड़ जाये तब  जिन्दगी के असल मायने समझ आते हैं।

   सिमित तनख्वाह में सभी बच्चों की जरूरतें को पूरा करना सामाजिक व्यवहार निभाना, इन सभी खर्चों का आयोजन करने में न जाने कितने पन्ने भरें होगें दास बाबु ने….अपनी पुरानी ड़ायरियों को भी दास बाबु इसी लिये संभाले रखते कि काभी समाज में  व्यवहार का लिफाफा देते समय कहीं चूक न हो जाय। लिखे हुये हिसाब को वह अपनी उपलब्धि मानते, कभी कभार गर्व से पत्नि को बताते भी। कुल मिलाकर अपनी दूरदर्शिता संतोष व छोटी जगह होने के कारण अपनी जिम्मेदारियां कुशलता से निभाई ,संयोग वश पत्नि भी संतुष्ट व कदम- कदम पर साथ निभाने लायक ही मिली थी।

 अचानक दास बाबु की आर्थिक स्थिति में इतना परिर्वतन आ जायगा, यह बात उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोची थी। एक दिन बैंक में पास बुक पूरी करवाते समय वह अचानक चौक गये देखा उसके खाते मे। 35 लाखा रूपै  कुल दिखा रहे हैं| पहले सोचा शायद गलत देख लिया| स्कूटर र्स्टाट कर चल पडे घर की और पर रास्ते में मन ही नहीं माना तो पेड के नीचे स्कूटर खडा किया और फिर से पास बुक देखी ….अभी पिछले हफ्ते ही उनके एकाउन्ट में यह रकम जमा हुयी थी। चिन्ता से बढी घड़कनें आम दिनों की घड़कनों से भिन्न थी| उनकी यह घडकने.कुछ और ही कह सुन रहीं थी… दिल जैसे उछल कर बाहर आने को आतुर था|

  जो राशी उन्होने देखी वह सही थी …मन बल्लियों उछलने लगा चैहरे की रंगत ही बदल गई ….पर ईमानदार व्यक्ति का भीरू मन …क्या करे किसी को पूछ भी नहीं सकते, सोचने लगे कौन होगा, जिसने इतनी रकम उनके खाते में जमा कराई होगी ….. और क्यों?

घर पहूँचे, मन था फूला फूला सा, पत्नी ने उनको देखते ही चाय चढाई । रेडियों का बटन दबाया, आज रेडियों में भी मस्ती भरे गीत सुन कर मन बाग-बाग हो चला था। दास बाबु को प्रसन्नचित्त देख पत्नी को भी अच्छा लगा। चाय के साथ नाश्ता भी पकड़ाते हुये बोली “बस ऐसे ही रहना चाहिये हमेशा….. क्यों नहीं…. आज मुझे कारण जो मिल गया है”। तपाक से निकले वाक्य का अन्तिम वाक्य गले तक ही रह गया। अचानक याद आ गया ’क्या कहने जा रहें हैं’। …अभी हजारों सीख दे कर ड़रायेगी ’खाते में इतनी बडी रकम होने का मानसिक  आनन्द भी नहींे लेने देगी ….’ पत्नि का ध्यान शायद रेड़ियो के गीतो पर था |

दास बाबु पत्नी के साथ गीतों का मजा लेने लगे दोनैां की प्रतिक्रियायें समान थी। जब कि मनस्थिति भिन्न थी| बीच बीच में दास बाबु सोचते जा रहे थे ’’किसने जमा करवाई होगी इतनी रकम’’? अचानक याद आया छोटे भाई कीे नई नई नौकरी लगी हैं कहीं उसने तो…..पत्नी से पूछा ’अब तो प्रताप के पास खूब पैसे आ गये होंगें…’.पत्नी बिंदास… ’’कहाँ  से होंगे अभी तो दो तनख्हा ही मिली है’’ …..हाँ  बोलकर दास बाबु चुप हो गये …..पर दिमाग वहीं पर दौड़ने लगा।

शाम की सैर जाने का समय हो गया। साथ वालों ने नीचे से आवाज भी लगाई ‘अरे चलो भई दास सैर का समय हो गया। पड़ोस के चोपडा जी ने छत से ही आवाज लगाई आज रात छत पर ही टंगे रहोगे क्या दास बाबु? , दास बाबु उसी तरह बैठे विचार करते रहे ’महिने भर तक किसी ने दावा नहीं किया तो वह बैक से पैसा निकाल कर अपनी कुछ जरूरी काम तो कम से कम कर ही लेंगे’ । एक अच्छा चश्मा बनवाने की कब से मन्शा हैं जिसे मन में दबा रखा हैं एक अच्छा पजामा कुर्ता जिसे पहनकर कभी आफिस भी जा सकें और तो और कलाई घडी का पट्टा कब से टूटा पड़ा हैं बस काम ही चल रहा। घीरे- घीरे उन्हें घर के हर सदस्य की आवश्यक्तायें याद आने लगी। और तो और माँ को यात्रा पर भेजने की भी दबी ठकी इच्छा कुलबुलाने लगी थी। बच्चों को अच्छे स्कूल में पढाने का सपना फिर सर उठाने लगा और न जाने इतना कुछ की दास बाबु सोचने लगे……. क्या उसकी इतनी इच्छाये अधूरी है….ं जब की वह तो लगातार काम कर ही रहें हैं तनख्वा तो पा ही रहे हैं…….. दास बाबु ने महसूस किया कि हमारी इच्छाये सुरसा के मुहँ समान हैं। जो समयानुकूल सिकुडती बढती रहती हैं उन्होने अपने विचारो का रूख तुरंन्त बदल दिया… वो नहीं चाहते, इतना…… निराशा वादी होना।

   उन्होने रेडियों की आवाज और तेज कर दी और अपने हाथ की रेखाएँ  देखने लगे, इसमें लिखा हैं क्या कहीं लखपति होना? पत्नि ने रसोई से निकलते हुये पूछा क्या हुआ …..कोई कांटा लगा हैं क्या ,लाओ निकाल देती हूॅ………। नहीं कुछ नहीं…..बोलकर सोचने लगे कांटा ही तो हैं जो मन पर लगा हैं धन का कांटा…..।

 स्वयं को संयत रखते हुये उठे भगवान् के आगे दिपक लगाते हुये भी विचार चलते रहे। शाम का खाना खाकर टीवी देखने बैठे तो अपनी पसंद के घारावाहिक में अपना मन रमाने का प्रयास करते रहे। रात को सोते समय सोच रहे थे जो पैसा मेरा नहीं हैं उसके लिये मैं  इतना विचलित क्यूं हूँ ..?और आराम से नींद आई…।

     सुबह आफिस के लिये तैयार हुये डब्बा ले कर नीचे उतर रहे थे की शर्मा मिल गया सब ठीक है ना? कल आये नहीं सैर को भी…. सब ठीक हैं कह कर चल पडे…….रास्ते में शर्मा ने बताया कल रात उत्तमकुमार साहब गुजर गये। क्या …कैसे….। मन दुःखी हो गया। अब तो आफिस से जल्दि आना होगा…….। शर्मा ने कहा आज क्या कल, परसो चलेंगे…… दास बाबु ने कहा आज ही जाना होगा। दास बाबु याद करने लगे ‘कैसा हँसता खिलखिलाता व्यक्तित्व था। बेटे तो बडे़ बड़े हैं उनके|  सभी कमाते भी है। पत्नि तो अभी कुछ वर्षो पहले ही चल बसी थी।

सेाचते-सोचते आफिस तक पहूँचे| लंच तक काम किया और आफिस में परमिशन ले कर रिक्क्षा कर उत्तम कुमार के घर पहूँचें। काफी लोग थे वहाँ, उनके बेटों से मिले…. अपनी अन्तरात्मा से संतोष महसूस किया, अच्छा हुआ अभी ही आ गया, कितना अच्छा व्यवहार था उन दौनों का। सामने वकील के साथ बैठ कर दोनौ बेटे हिसाब कर रहे थे पिताजी के पैसों का|  उन्होंने सुना बड़ा बेटा कह रहा था| कुछ दिनों पहले ही पिताजी ने 40 लाख रूपै निकाले हैं 5 लाख तो उन्होंने कल ही दूसरे अकाउन्ट में डाले हैं| पर पैतीस लाख उन्होंने किस खाते में डाले हैं पता ही नहीं चल रहा, उन्होने किसी को कुछ बताया भी नहीं।

   दास बाबु के कान खडे हो गये…….उन्हें  याद आया  उस दिन की बात, जब उत्तम कुमार जी पार्क में बैठ कर कुछ काम कर रहे थे| दासबाबु भी उनकी बगल में बैठ गये| उस दिन पार्क में वह अकेले ही थे। उत्तम कुमार जी को काम करता देख दास बाबु भी चुपचाप उनके पास बैठे रहे……। उत्तम कुमार जी ने पूछा था दास बाबु आपका घर अपना है या किराये का? दास बाबु  उसी दिन किराया चुका कर आये थे| उन्होने उदासी से कहा किराये का हैं भाई……। मेरा अपना घर तो राम जाने कब होगा| मै तो इसी को अपना समझ कर रह रहा हूँ.. और दौनो हँसे…….। सब काम पूरा होने पर उन्होंने पूछा था कितने का होगा यह घर? दास बाबु ने बेरूखी से कहा था । मेरी जब उसे खरीदने की औकात ही नहीं हैं तो मैं क्यों जानुं कितने का हैं …..फिर भी…. कुछ तो कीमत होगी उसकी …..और दास बाबु ने दार्शनिक अंदाज से कहा “होगी यही कोई पैतीस चालीस लाख…”. जो रकम उन्होंने कभी पास पडोस के लोगों से सुनी थी। और सच में कीमत बताते ही उत्तम बाबु के सवाल समाप्त हो गये और दासबाबु को राहत मिली….। दौनो टहलने लगे उस दौरान भी दास बाबु व उत्तम बाबु के बीच मकान की बातें ही होती रहीं………। कोई बेचारगी तो नहीं थी दास बाबु की बातों में, पर  उत्तम बाबु उनकी ईमानदारी उनके चरित्र को ठीक से पहचानते थे। मकान के लिये लोन लेने की बात पर दास बाबु ने द्रढता से कहा था| जो बात उनके बस के बाहर हैं| उसे सोच कर दःुखी होना उसने नहीं सीखा। माता पिता को अपने साथ रखना चाहते थे| पर खर्चो को देखते हुये कुछ पैसे भिजवाते रहते हैं| सदा हालचाल पूछते रहते, अवसर मिलने पर पत्नि बच्चों के साथ जा कर भी आते। उस दिन देर तक टहलते रहे थे। उत्तम कुमार जी ने दास बाबु से  इतना तो कहा था| कौन किसी का होता हैं। आजकल तो लोग मिलने से भी कतराते हैं वैसे भी मेरा तो सिद्धांत हैं कोई व्यक्ति आपके पास तीन कारणों  से आता हैं। भाव से अभाव में और प्रभाव से , जो भाव से आये उसे प्रेम करो जो अभाव में आये उसे मदद करो और जो प्रभाव में आये तो प्रसन्न हो जाओं कि  ईश्वर ने आपको इस योग्य बनाया है।

  उस दिन खूब टहले थे दोनों | न जाने दास बाबु ने अपने जीवन के कौनसे पन्ने उनके सामने खोले की …. उत्तमकुमार जी  ने उन्हे गले लगाया जैसे…. शाबाशी देते  रहें । दोनो ने अपनी-अपनी राह पकडी। दूसरे चार-पॉच दिन तक वो पार्क में नहीं मिले। उस दिन दास बाबु पास- बुक के आँकड़ों में खोये रहे और आज उत्तमकुमारजी की अन्तिम विदाई……।

 मन खराब तो था ही, निकलते समय सोचने लगे, मैं तो भाव से उनके पास गया था अभाव व प्रभाव तो मेरे दिमाग में ही नहीं था। उसी समय एक दो साथी मिले| उनसे पता चला कि उत्तम कुमार जी के बेटों की नज़र उनके पैसों पर थी| पत्नि के जाने के बाद हाल खराब ही थे| देख भाल भी नहीं करते थे उनके बैटे…..। वापस जा कर आफिस में भी मन नहीं लगा। पैसे की बात वो कुछ समय के लिये भूल गये थे। उस दिन शाम की सैर के समय भी उत्तमकुमर जी की ही चर्चा थी| दासबाबु ने सोचा यह सब लोग इतना सब जानते हैं वह क्यों अंजान थे इन सभी बातों से……। जिसे वह अपना अवगुण मान रहे थे वही तो खूबी थी उनकी कि  किसी भी बात में जहाँ उनका सरोकार न हो निर्लिप्त रहना….।

  दूसरे दिन आफिस जाते समय दास बाबु उत्तमकुमार जी के घर गये उनके बेटों से बातों -बातों  में पता चला उत्तम कुमार जी ने पैतीस लाख रूपै दान कर दिये। जिसका आक्रोष दौनो पुत्र व्यक्त कर रहे थे  बडी कोठी, शेयर, पैसा, गहना सब कुछ देने के बाद भी वो पैतीस लाख रूपै उन्हें अखर रहे थे।

उत्तमकुमार जी का मरणेापरांत का काम सब  विघि-विधान से हो रहा था। कुछ दिन और निकले और एक दिन दासबाबु ने अपनी पत्नि को उन पैसे के बारे में सब कुछ बता दिया …चैहरा एैसा हो गया जैसे दास बाबु ने चोरी कर ली हो। उत्तम कुतार जी के परिवार की बात को इससे जोड़कर देखते हुये पत्नि ने कहा कि उन्होंने आपसे आपके खाते के नम्बर माँगे थे क्या……। दास बाबु ने याद करते हुये कहा नहीं….. पर उन्हें  याद आया, उस दिन पार्क में लिखने के लिये कुछ माँगते समय उन्होंने अपनी छोटी डायरी उन्हें  दी थी| उसमें उनके बैक और खाता नम्बर लिखा हुआ था| शायद यहीं से मिला हो……। पत्नि का चैहरा दिन भर खुश होने के बदले उदास रहा…….। सोमवार को डाक से दास बाबु के घर एक पत्र आया। शाम को आफिस से आने के बाद चाय के कप के साथ पत्र को देख दास बाबु ने खोला…….. छोटा पर सुन्दर अक्षरों में लिखा पत्र ,दास बाबु….. हम मित्र नहीं हैं पर आशा करता हूँ आज के बाद हम अच्छे मित्र होंगे। आपके खाते में जो रकम जमा हुयी हैं| उसका जिम्मेदार मैं हूँ बिना किसी चर्चा के अपना मकान खरीद लो| माता पिता को ले आओ और सूखी रहो। इसके साथ हमारे समाज ने दान स्वरूप यह राशी आपको दी हैं| इसका विरण हैं जो  आयकर विभाग में प्रस्तुत करने में उपयोगी होगा। क्षमा प्रार्थी हूॅ…. चाहता हूँ कि आप इसे अपनी डायरी के पन्नों में कहीं न लिखे, आपका उत्तम कुमार।

दास बाबु ने होले से पत्र पत्नि के हाथ में दिया और सोचने लगे क्यों……। अब उन्हें क्या करना चाहिये… क्या वह इतनी बडी रकम के योग्य हैं क्या उन्हें  यह दान स्वीकार करना चाहिये या नहीं……।दास बाबु ने अपनी डायरी के पन्ने पर लिखा हरि ऊँ और आज की तारीख डाल कर डायरी बन्द कर दी।

                         प्रेषक प्रभा पारीक

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