आज राधिका भरे पूरे परिवार के बावजूद अपने स्वभाव और व्यवहार की वजह से बिल्कुल अकेली पड़ गई थी। सामने मधुकर जी बीमार अवस्था में अकेले बिस्तर पर लेटे-लेटे अपनी पत्नी राधिका जी से कहे जा रहे थे। राधिका आज तुम्हारी वजह से मेरे इतने भाई बहनों के होते हुए,मेरे इतने बड़े परिवार के होते हुए भी मैं बिल्कुल अकेला हो गया हूं।
भूल मेरी है मुझे तुम्हारी हर बात सुननी नहीं चाहिए थी।
तुमने मेरे भाइयों के लिए हमेशा मेरे कान भरे और मैं अपने पैसे और बड़े भाई होने का इस्तेमाल करके उन्हें सताता रहा। कभी जुबान से कभी दुर्व्यवहार से जो कि मुझे नहीं करना चाहिए था। अब इतना तो समझ गया हूं कि रिश्ते में अभिमान की, अहम की कोई जगह नहीं होती।
अगर हम बड़े हैं तो बिना स्वार्थ के छोटों को प्यार देना ही होगा । अक्सर देखा है जहां रिश्ते में कोई अपना फायदा उठाने लगता है। वो रिश्ता फिर धीरे धीरे बिखरने लगता है।
आज अगर मैं अपने भाइयों से मृदुल व्यवहार रखता, अपनापन रखता तो आज मैं इस तरह अकेला अस्वस्थ हालत में यूं न पड़ा होता। सच कहता हूं जैसे ही मेरे भाइयों को पता चलता । वह तुरंत दौड़कर आते और मुझे गले लगा लेते।
मगर मैंने ही अपने व्यवहार और जुबान से उनके पांव में ऐसी बेड़ियां बांध दी है कि वह मेरे घर अब नहीं आने को मजबूर हो गए हैं। कहने को आज हमारे पास बहुत सारी दौलत है मगर उस दौलत का अब मैं क्या करूं । तुम देख ही रही हो, आज उसी दौलत के खातिर दोनों बेटे भी छोड़ कर चले गए
दोनों बहू भी चली गई। यह सच है इंसान जैसा करता है उसे वैसा ही मिलता है । विधि का विधान कोई टाल नहीं सकता । मैंने अपने भाइयों को अलग किया तो आज मेरे बेटों ने ही मुझे छोड़ दिया। तुमने भी तो मेरे भाइयों से और उनकी पत्नियों से कहां अच्छा व्यवहार किया। तुम्हें जब मौका मिलता तो
उन्हें चार बातें सुनाने से तुम बाज नहीं आती थी । अब किसे सुना पाती हो, अब तो तुम्हारे आसपास सिर्फ यह दीवार है। जिसे तुम जी भर कर सुना सकती हो। इन दीवारों के अलावा तुम्हारी वह चार बातें कोई नहीं सुनने वाला कह कर मधुकर जी ने निराश होकर अपनी आंखें मूंद ली।
मधुकर जी की बात सुनकर आज राधिका जी ने पहली बार अपनी गलती को स्वीकार किया और शांत मन से बोल उठी। आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। आज हमारे भरे पूरे परिवार के बावजूद भी अकेले होने की जिम्मेदार सिर्फ मैं हूं।
मेरे मन में सदा यही रहा कि हमारे पास पैसे हैं, रुतबा है और हम परिवार में बड़े हैं तो हम जो चाहे कर सकते हैं। किसी से भी कुछ भी कह सकते हैं। सच कहूं तो मैंने कभी भी अपने पारिवारिक सदस्यों से दो प्यार के बोल नहीं बोले। अगर कभी बोले भी है तो सिर्फ चालाकीपन में या फिर जहां मेरा स्वार्थ पूरा होता हो।
और मैंने यही संस्कार अपने बेटों में भी दे दिए। वैसे देखा जाए तो हमारे बेटों की क्या गलती क्योंकि मैंने ही उन्हें इस रास्ते पर चलना सिखाया था और यही तो विधि का विधान है, जिसे टाला नहीं जा सकता । हमने जैसा किया आज वही हमें मिल रहा है कहते कहते राधिका जी रोने लगी।
राधिका जी का मन जब रोकर कुछ हल्का हुआ तो उन्होंने मन ही मन एक फैसला किया और उठ खड़ी हुई और मधुकर जी से कहने लगी। मैंने गलत किया है तो मैं ही ठीक करूंगी कहते हुए तुरंत अपने परिवार के बाकी सदस्यों को फोन करने लगी।
राधिका जी को खुद सबको फोन करके क्षमा मांगते हुए देखकर आज मधुकर जी के मन को बहुत तसल्ली हुई और चैन भी मिला और खुशी भी हुई के चलो अब सब रिश्ते ठीक हो जाएंगे और मैं अपने भाइयों से एकबार मिल पाऊंगा फिर भले मुझे ईश्वर का बुलावा आ भी जाए तो कोई गम नहीं सोचते सोचते मधुकर जी ने अपनी आंखें मूंद ली।
स्वरचित
सीमा सिंघी
गोलाघाट असम