कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। प्रेरणा के चेहरे पर एक अजीब सी शून्यता आ गई। उसने अपनी आँखों में आए आँसुओं को पलकों के पीछे ही रोक लिया। कुछ पल बाद, प्रेरणा ने गहरी सांस ली, अपने चेहरे पर एक झूठी लेकिन मजबूत मुस्कान लाई और आशा के पास जाकर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, “पापा, इसमें इतना सोचने वाली क्या बात है? मयंक जी सच में बहुत अच्छे लड़के हैं। परिवार भी संपन्न है। अगर आशा की किस्मत में इतना अच्छा घर लिखा है, तो हम भला उसे क्यों रोकें? आप जाकर उन्हें हाँ कर दीजिए। मेरी किस्मत में जो होगा, वो मुझे मिल जाएगा।”
शहर के एक शांत और पुराने मोहल्ले में हरेंद्र जी का छोटा सा, लेकिन बहुत ही सलीके से सजा हुआ घर था। हरेंद्र जी एक सरकारी स्कूल में रिटायर्ड हेडमास्टर थे और उनकी पत्नी सुशीला एक बहुत ही सुलझी हुई गृहणी थीं। उनके आंगन की रौनक उनकी दो बेटियां थीं—बड़ी बेटी का नाम प्रेरणा था और छोटी का नाम आशा । प्रेरणा उम्र में छब्बीस साल की थी, स्वभाव से बेहद शांत, समझदार और घर के हर काम में निपुण। वह एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षिका थी और पूरे घर की जिम्मेदारी उसने अपने कंधों पर ले रखी थी। उसका रंग थोड़ा सांवला था, और नैन-नक्श बहुत साधारण थे। वहीं दूसरी तरफ, चौबीस साल की आशा चुलबुली, तेज-तर्रार और रंग-रूप में बेहद गोरी और खूबसूरत थी। आशा अभी यूनिवर्सिटी से अपनी मास्टर डिग्री पूरी कर रही थी। दोनों बहनों में जान बसती थी; प्रेरणा ने हमेशा आशा को अपनी छोटी बहन कम और बेटी ज्यादा माना था।
हरेंद्र जी पिछले दो सालों से प्रेरणा के लिए एक सुयोग्य वर की तलाश कर रहे थे। लेकिन समाज की कड़वी सच्चाई हर बार उनके दरवाजे पर आकर खड़ी हो जाती थी। लड़के वाले आते, प्रेरणा के बनाए पकवान खाते, उसकी सलीके से की गई मेहमाननवाज़ी की तारीफ करते, लेकिन जाते-जाते कोई न कोई बहाना बनाकर रिश्ता ठुकरा देते। हर बार कारण एक ही होता—लड़की का सांवला रंग। हर टूटते रिश्ते के साथ हरेंद्र जी के माथे की लकीरें गहरी होती जा रही थीं और प्रेरणा के मन में एक गहरा संकोच घर करता जा रहा था।
आज हरेंद्र जी के घर में सुबह से ही गहमा-गहमी का माहौल था। सुशीला रसोई में तरह-तरह के पकवान बनाने में व्यस्त थी। आशा पूरे घर की साफ-सफाई और सजावट देख रही थी। आज प्रेरणा को देखने के लिए एक बहुत ही प्रतिष्ठित परिवार आ रहा था। लड़के का नाम मयंक था, जो एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। लड़के के पिता शहर के जाने-माने व्यापारी थे। यह रिश्ता हरेंद्र जी के एक पुराने मित्र के माध्यम से आया था। हरेंद्र जी ने लड़के वालों को पहले ही प्रेरणा की तस्वीर और उसके स्वभाव के बारे में सब कुछ बता दिया था। लड़के वालों ने भी तस्वीर देखकर हाँ कर दी थी, जिससे पूरे घर में एक नई उम्मीद की किरण जाग उठी थी।
शाम के करीब पांच बजे एक बड़ी सी गाड़ी हरेंद्र जी के दरवाजे पर आकर रुकी। मयंक, उसके माता-पिता और उसकी एक शादीशुदा बहन गाड़ी से उतरे। हरेंद्र जी ने हाथ जोड़कर और बेहद सम्मान के साथ उन सभी का स्वागत किया। बैठक में सभी लोग अपनी-अपनी जगह पर बैठ गए। औपचारिक बातचीत शुरू हुई। मयंक के पिता ने अपनी व्यापारिक सफलताओं की चर्चा की और उसकी माँ ने मयंक की तरक्की के किस्से सुनाए। हरेंद्र जी और सुशीला जी बहुत ही विनम्रता से उनकी सारी बातें सुन रहे थे और बीच-बीच में अपनी सहमति जता रहे थे।
कुछ देर बाद, सुशीला जी ने आशा को इशारा किया। आशा रसोई में गई और प्रेरणा को लेकर बाहर आई। प्रेरणा ने एक बहुत ही शालीन सी हल्के गुलाबी रंग की साड़ी पहनी हुई थी। उसने कोई खास मेकअप नहीं किया था, बस उसकी आँखों में एक अजीब सी घबराहट और उम्मीद का मिला-जुला भाव था। उसके हाथों में चाय और नाश्ते की ट्रे थी। जैसे ही प्रेरणा ने बैठक में कदम रखा, मयंक और उसके परिवार की नजरें उस पर टिक गईं। प्रेरणा ने बहुत ही सलीके से सबको चाय दी और फिर एक किनारे सोफे पर सिर झुकाकर बैठ गई।
मयंक की माँ ने प्रेरणा से कुछ सवाल पूछे—”बेटा, खाना बनाना कैसा आता है? स्कूल के बाद घर का काम कर लेती हो?” प्रेरणा ने बहुत ही धीमे और मीठे स्वर में सभी सवालों के सही-सही जवाब दिए। मयंक भी प्रेरणा को देख रहा था, लेकिन उसकी आँखों में वो चमक नहीं थी जो एक होने वाले जीवनसाथी की आँखों में होनी चाहिए। उसकी नजरें बार-बार उस दरवाजे की तरफ जा रही थीं, जहाँ से आशा अभी-अभी पानी के गिलास लेकर अंदर आई थी। आशा ने एक साधारण सा सलवार सूट पहना हुआ था, लेकिन उसकी प्राकृतिक सुंदरता और गोरा रंग किसी का भी ध्यान खींचने के लिए काफी था। मयंक की माँ और बहन भी एक-दूसरे को कनखियों से देखकर आशा की तरफ इशारा कर रही थीं।
चाय-नाश्ता खत्म होने के बाद, मयंक की माँ ने अपना गला साफ करते हुए हरेंद्र जी से कहा, “हरेंद्र जी, अगर आप बुरा न मानें तो क्या हम लोग अकेले में कुछ जरूरी बात कर सकते हैं?”
हरेंद्र जी का दिल धक से रह गया। उन्हें लगा कि शायद इस बार भी रंग-रूप को लेकर कोई बहाना बनाया जाने वाला है। फिर भी, उन्होंने खुद को संभाला और मयंक के माता-पिता को लेकर अंदर वाले कमरे में चले गए। सुशीला जी भी उनके पीछे-पीछे गईं।
कमरे का दरवाजा बंद होते ही मयंक के पिता ने बात शुरू की, “देखिए मास्टर जी, आप एक बहुत ही इज्जतदार और नेक इंसान हैं। आपकी बड़ी बेटी प्रेरणा भी बहुत संस्कारी और गुणी है। उसने हमारा सत्कार भी बहुत अच्छे से किया। लेकिन…”
“लेकिन क्या भाई साहब? क्या कोई कमी रह गई हमारी तरफ से?” हरेंद्र जी ने घबराते हुए पूछा।
मयंक की माँ ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “कमी सत्कार में नहीं है भाई साहब। दरअसल, मयंक को आपकी बड़ी बेटी कुछ खास पसंद नहीं आई। हम लोग एक आधुनिक परिवार से हैं, मयंक को अक्सर ऑफिस की पार्टियों और बड़े-बड़े आयोजनों में जाना पड़ता है। उसे अपने साथ खड़ी होने वाली एक ऐसी पत्नी चाहिए जो दिखने में बेहद आकर्षक हो। सच कहें तो, हमें आपकी छोटी बेटी बहुत पसंद आ गई है। अगर आप चाहें, तो हम मयंक का रिश्ता आपकी छोटी बेटी आशा के साथ तय करने को तैयार हैं। वैसे भी प्रेरणा से वो सिर्फ दो-ढाई साल ही तो छोटी है। आज नहीं तो कल आपको उसका भी घर बसाना ही है।”
यह सुनकर हरेंद्र जी और सुशीला जी के पैरों तले जमीन खिसक गई। एक पिता के लिए इससे बड़ी दुविधा क्या हो सकती थी कि एक ही मंडप में उसकी एक बेटी के गुणों को नकार कर दूसरी बेटी के रूप को चुना जा रहा हो? हरेंद्र जी ने कांपते हुए होठों से कहा, “बहन जी, यह आप क्या कह रही हैं? प्रेरणा बड़ी है, बिना उसका विवाह किए हम आशा का हाथ कैसे पीले कर सकते हैं? और फिर प्रेरणा को कैसा लगेगा?”
मयंक के पिता ने थोड़ा दबाव बनाते हुए कहा, “मास्टर जी, भावनाओं में मत बहिए। मयंक जैसा कमाऊ और खानदानी लड़का बार-बार नहीं मिलता। प्रेरणा के लिए कोई साधारण सा नौकरीपेशा लड़का देख लीजिएगा। आशा का भविष्य मयंक के साथ बहुत सुरक्षित रहेगा। आप बाहर जाकर आपस में विचार कर लीजिए। हम जोर नहीं दे रहे हैं, लेकिन हमारी पसंद आशा ही है।”
हरेंद्र जी और सुशीला जी भारी कदमों से कमरे से बाहर निकले। वे सीधे आशा और प्रेरणा के कमरे में गए। प्रेरणा खिड़की के पास खड़ी थी और आशा उसके पास बैठी थी। माता-पिता के चेहरे देखकर दोनों बहनें समझ गईं कि कुछ गंभीर बात हुई है। सुशीला जी ने रोते हुए सारी बात दोनों बेटियों को बता दी।
कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। प्रेरणा के चेहरे पर एक अजीब सी शून्यता आ गई। उसने अपनी आँखों में आए आँसुओं को पलकों के पीछे ही रोक लिया। कुछ पल बाद, प्रेरणा ने गहरी सांस ली, अपने चेहरे पर एक झूठी लेकिन मजबूत मुस्कान लाई और आशा के पास जाकर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, “पापा, इसमें इतना सोचने वाली क्या बात है? मयंक जी सच में बहुत अच्छे लड़के हैं। परिवार भी संपन्न है। अगर आशा की किस्मत में इतना अच्छा घर लिखा है, तो हम भला उसे क्यों रोकें? आप जाकर उन्हें हाँ कर दीजिए। मेरी किस्मत में जो होगा, वो मुझे मिल जाएगा।”
आशा अपनी बड़ी बहन का यह त्याग देखकर अंदर ही अंदर उबल रही थी। उसने बचपन से प्रेरणा को देखा था—कैसे उसने आशा की हर जिद पूरी करने के लिए अपनी खुशियों को कुर्बान किया था, कैसे उसने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ घर संभाला ताकि आशा आराम से कॉलेज जा सके। और आज, कुछ अजनबी लोग सिर्फ उसके सांवले रंग के कारण उसे सरेआम जलील कर रहे थे और प्रेरणा दीदी इस अपमान को भी हंसते-हंसते पी रही थीं? आशा का खून खौल उठा।
सुशीला जी ने आशा के बिखरे हुए बालों को संवारते हुए कहा, “चल बेटा आशा , बाहर चल। वो लोग तेरा इंतजार कर रहे हैं। प्रेरणा सही कह रही है, कम से कम तेरा भविष्य तो संवर जाएगा।”
आशा चुपचाप अपनी जगह से उठी। उसने अपनी दीदी की तरफ एक गहरी नजर से देखा, जैसे वह अपनी आँखों से ही उसे कुछ भरोसा दिला रही हो। फिर वह अपनी माँ के साथ बाहर बैठक में आ गई।
मयंक और उसके परिवार वालों के चेहरे पर आशा को आते देखकर एक विजयी मुस्कान तैर गई। मयंक की माँ ने आगे बढ़कर कहा, “आओ बेटा आशा , यहां मेरे पास आकर बैठो। हरेंद्र जी, अब तो मिठाई मंगवाइए। हमारी होने वाली बहू सच में चाँद का टुकड़ा है।” मयंक भी आशा को देखकर निहाल हो रहा था।
आशा वहां जाकर सोफे के पास खड़ी हो गई, लेकिन वह बैठी नहीं। उसने अपनी नजरें उठाकर सीधे मयंक की आँखों में देखा। उसकी आँखों में न तो कोई शर्म थी और न ही कोई खुशी, बल्कि एक ऐसी तीखी चमक थी जिसने कमरे के तापमान को अचानक बढ़ा दिया।
“बैठो बेटा, खड़ी क्यों हो?” मयंक के पिता ने कहा।
आशा ने बहुत ही शांत, लेकिन एक दृढ़ और तीखे स्वर में कहा, “धन्यवाद अंकल जी, लेकिन मैं यहां बैठने नहीं, कुछ कहने आई हूँ।”
सभी लोग हैरानी से आशा की तरफ देखने लगे। हरेंद्र जी ने घबराते हुए कहा, “आशा बेटा, क्या कह रही हो?”
आशा ने अपने पिता को शांत रहने का इशारा किया और मयंक की तरफ मुड़कर बोली, “मयंक जी, आप एक बहुत बड़ी कंपनी में काम करते हैं, बहुत पढ़े-लिखे हैं। मुझे बताइए, मेरी बड़ी बहन प्रेरणा दीदी में क्या कमी थी? क्या वो पढ़ी-लिखी नहीं हैं? क्या उनमें तमीज नहीं है? या क्या उनके संस्कार अच्छे नहीं हैं?”
मयंक थोड़ा सकपका गया। उसने हिचकिचाते हुए कहा, “नहीं… वो सब तो ठीक है। लेकिन… दरअसल, मुझे कोई ऐसी चाहिए थी जो… मेरा मतलब है, तुम उनसे ज्यादा खूबसूरत हो। और मुझे लगता है कि हम दोनों की जोड़ी ज्यादा अच्छी लगेगी।”
आशा के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान आ गई। उसने पूरे परिवार की तरफ देखते हुए कहा, “अच्छा! तो आपका पैमाना सिर्फ एक गोरा चेहरा है। मयंक जी, मेरी बहन रोज सुबह पांच बजे उठकर पूरे घर का काम करती है, फिर स्कूल जाकर बच्चों को पढ़ाती है और घर आकर भी कभी उसके चेहरे पर थकान नहीं होती। उसका दिल इतना साफ और खूबसूरत है कि उसने अभी-अभी अंदर कमरे में मुझसे कहा कि मैं आपके साथ शादी कर लूं क्योंकि इसमें मेरी खुशी है। उसने अपने अपमान को मेरी खुशी के लिए एक पल में भुला दिया।”
आशा एक कदम आगे बढ़ी और उसकी आवाज में अब एक स्पष्ट गुस्सा झलक रहा था, “और आप कहते हैं कि मैं सुंदर हूँ? मयंक जी, आज मेरी उम्र पच्चीस साल है, मेरी चमड़ी में कसाव है और रंग गोरा है, इसलिए मैं आपको पसंद आ गई। लेकिन जरा सोचिए, कल अगर कोई सड़क दुर्घटना हो गई और मेरा यह चेहरा जल गया, या किसी बीमारी के कारण मेरा यह रंग-रूप छिन गया, तो आप क्या करेंगे? क्या आप मुझे छोड़कर किसी और सुंदर लड़की की तलाश करेंगे?”
मयंक के पास कोई जवाब नहीं था। उसके माता-पिता भी अवाक् रह गए थे।
आशा ने अपनी बात जारी रखी, “आप लोगों ने अपनी पसंद बदलने में दस मिनट का समय नहीं लगाया। जो इंसान सिर्फ एक सुंदर चेहरा देखकर अपनी जीवनसंगिनी बदल सकता है, वो इंसान किसी का जीवनसाथी कहलाने के लायक नहीं हो सकता। बाहरी सुंदरता का तो कोई अंत ही नहीं है मयंक जी। आज मैं आपको अपनी बहन से ज्यादा सुंदर लगी, कल आपको बाहर किसी पार्टी में मुझसे भी ज्यादा सुंदर कोई और मिल जाएगी। तब आप क्या करेंगे?”
कमरे में सुई गिरने जैसी शांति छा गई थी। आशा की हर एक बात सीधे निशाने पर लग रही थी।
“रही बात सौभाग्य की,” आशा ने मयंक की माँ की तरफ देखकर कहा, “तो आंटी जी, यह मेरा सौभाग्य नहीं है कि आप लोगों ने मुझे चुना। बल्कि यह मेरी प्रेरणा दीदी का सौभाग्य है कि वो आप जैसे सतही और खोखली सोच वाले परिवार में जाने से बच गईं। मैं अपना खुद का दुर्भाग्य कभी नहीं लिखना चाहूंगी, जहाँ मेरी कीमत मेरे गुणों से नहीं, बल्कि मेरी चमड़ी के रंग से तय की जाए। इसलिए, इस रिश्ते का अंत यहीं कर देना ही मेरा सबसे बड़ा सौभाग्य होगा।”
इतना कहकर आशा पलटी और बिना किसी की तरफ देखे तेज कदमों से अंदर अपने कमरे की तरफ चली गई।
बैठक में एकदम सन्नाटा पसरा था। मयंक का चेहरा शर्म और अपमान से लाल हो चुका था। उसके माता-पिता की नजरें झुकी हुई थीं। उनके घमंड और उनकी खोखली मानसिकता को एक पच्चीस साल की लड़की ने आईना दिखा दिया था। हरेंद्र जी जो अब तक डरे और सहमे हुए थे, अचानक उनके अंदर एक अजीब सी ऊर्जा आ गई। उन्होंने हाथ जोड़कर मयंक के पिता से कहा, “भाई साहब, मुझे लगता है कि मेरी बेटी ने आपको हमारा जवाब दे दिया है। आप लोग अब जा सकते हैं।”
मयंक और उसका परिवार बिना एक शब्द कहे, शर्मिंदगी से अपना सिर झुकाए घर से बाहर निकल गए। गाड़ी के स्टार्ट होने और दूर जाने की आवाज के साथ ही घर में फैला हुआ सारा तनाव जैसे धुलकर साफ हो गया।
हरेंद्र जी और सुशीला जी अंदर कमरे में गए। उन्होंने देखा कि आशा प्रेरणा की गोद में सिर रखकर रो रही थी, और प्रेरणा मुस्कुराते हुए उसके आँसू पोंछ रही थी। हरेंद्र जी ने आगे बढ़कर अपनी दोनों बेटियों को गले से लगा लिया। आज उन्हें एहसास हो गया था कि उनके घर में दो बेटियां नहीं, बल्कि दो अनमोल रत्न हैं, जिनकी चमक किसी बाहरी रंग-रूप की मोहताज नहीं है। आज एक पिता के रूप में हरेंद्र जी हारकर भी सबसे बड़ी जीत हासिल कर चुके थे।
क्या आपको लगता है कि आशा ने मयंक और उसके परिवार को जो जवाब दिया वह सही था? क्या आज के आधुनिक समाज में भी शादियों में रंग-रूप को गुणों से ज्यादा अहमियत देना सही है? अपने विचार हमें जरूर बताएं।
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मूल लेखक : विनय कुमार मिश्रा