एहसास के धागे

 श्रुति तो जैसे पत्थर की मूरत बन गई थी। विक्रम के कमरे से बाहर जाते ही उसके अंदर का लावा फूट पड़ा। “माँ आ रही हैं? मतलब मेरी सास! इन्हें भी आज ही आना था? जब भी हम दोनों कहीं बाहर जाने का, अपने लिए कुछ वक्त निकालने का सोचते हैं, तो महारानी जी मुंह उठाए चली आती हैं। गाँव में इनका मन नहीं लगता क्या जो हर दो महीने में बेटे की याद सताने लगती है!”

 आज रविवार का दिन था और श्रुति के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी। हो भी क्यों ना, आज उसकी और विक्रम की शादी की तीसरी सालगिरह जो थी। पिछले कई महीनों से विक्रम अपने ऑफिस के प्रोजेक्ट्स में इतना व्यस्त था कि वे दोनों कहीं बाहर वक्त बिताने नहीं जा पाए थे। आज के दिन के लिए श्रुति ने बहुत पहले से ही एक शानदार ट्रिप की योजना बना रखी थी। उन्होंने शहर की भीड़भाड़ से दूर एक शांत और खूबसूरत रिसॉर्ट में दो दिन बिताने का फैसला किया था। पैकिंग लगभग पूरी हो चुकी थी, सूटकेस बिस्तर के किनारे रखा था और श्रुति आईने के सामने खड़ी होकर अपने बाल संवारते हुए उस हसीन शाम के सपने बुन रही थी जो वह विक्रम के साथ बिताने वाली थी।

तभी अचानक कमरे के सन्नाटे को चीरती हुई विक्रम के मोबाइल की घंटी बज उठी। विक्रम अभी-अभी नहाकर वॉशरूम से बाहर निकला था और तौलिये से अपने बाल सुखा रहा था। “श्रुति, जरा देखना किसका फोन है? इतनी सुबह-सुबह कौन कॉल कर रहा है,” विक्रम ने अलमारी से अपने कपड़े निकालते हुए कहा।

श्रुति ने कुछ झुंझलाते हुए फोन उठाया और स्क्रीन की तरफ देखकर बोली, “अरे, पता नहीं कोई अननोन नंबर है, शायद कस्टमर केयर वाले होंगे, संडे को भी चैन से जीने नहीं देते।”

“लाओ मुझे दो,” विक्रम ने फोन हाथ में लिया और कॉल रिसीव किया। “हैलो… जी… अरे माँ जी, आप? आप इस वक्त यहाँ शहर में? अच्छा, बस स्टैंड पर हैं… हाँ-हाँ, बिल्कुल। मैं बस आधे घंटे में पहुँच रहा हूँ। आप वहीं रुकिए, मैं आता हूँ।”

विक्रम के चेहरे पर एक अजीब सी शांति और हल्की सी मुस्कान थी। उसने फोन काटा और श्रुति की तरफ मुड़कर बोला, “श्रुति, माँ शहर आई हैं। उनके किसी रिश्तेदार के यहाँ कोई जरूरी काम था, तो उन्होंने सोचा कि काम खत्म करके दो-तीन दिन हमारे साथ बिता लेंगी। वो अभी बस स्टैंड पर पहुँच गई हैं। मैं उन्हें लेने जा रहा हूँ। तुम ऐसा करो, जो हमने रिसॉर्ट जाने के लिए सैंडविच और नाश्ता पैक किया था, उसे डाइनिंग टेबल पर लगा दो। हम सब साथ मिलकर लंच करेंगे।”

इतना कहकर विक्रम ने जल्दी-जल्दी अपने कपड़े पहने, गाड़ी की चाबी उठाई और मुस्कुराता हुआ कमरे से बाहर निकल गया।

श्रुति तो जैसे पत्थर की मूरत बन गई थी। विक्रम के कमरे से बाहर जाते ही उसके अंदर का लावा फूट पड़ा। “माँ आ रही हैं? मतलब मेरी सास! इन्हें भी आज ही आना था? जब भी हम दोनों कहीं बाहर जाने का, अपने लिए कुछ वक्त निकालने का सोचते हैं, तो महारानी जी मुंह उठाए चली आती हैं। गाँव में इनका मन नहीं लगता क्या जो हर दो महीने में बेटे की याद सताने लगती है!”

श्रुति का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उसने गुस्से में अपना पैक किया हुआ सूटकेस पैर से धक्का मारकर किनारे कर दिया। उसके सारे अरमानों पर जैसे किसी ने बर्फीला पानी डाल दिया हो। वह जोर-जोर से पैर पटकती हुई रसोई की तरफ गई। “क्या जरूरत थी बिना बताए आने की? एक फोन करके नहीं पूछ सकती थीं कि हम घर पर हैं भी या नहीं? नहीं, इन्हें तो बस सरप्राइज देना होता है ताकि हम अपनी जिंदगी जी ही ना सकें। कबाब में हड्डी बनने की जैसे इन्हें आदत सी हो गई है!”

बड़बड़ाते हुए श्रुति ने रसोई का सारा सामान इधर-उधर फेंकना शुरू कर दिया। जो नाश्ता उसने बड़े प्यार से विक्रम के लिए बनाया था, उसे उसने बेमन से कैसरोल में डंप कर दिया। उसने तय कर लिया था कि वह अपनी सास से सीधे मुंह बात तक नहीं करेगी ताकि उन्हें एहसास हो जाए कि उनका इस तरह बिना बताए आना उसे बिल्कुल पसंद नहीं आया है।

करीब पैंतालीस मिनट बाद दरवाजे की घंटी बजी। श्रुति सोफे पर मुंह फुलाए बैठी थी। उसने एक गहरी सांस ली, अपने चेहरे पर कठोर भाव लाए और जाकर झटके से दरवाजा खोला। बिना सामने देखे, बिना किसी का अभिवादन किए, वह दरवाजे से ही पलट गई और रूखे स्वर में बोली, “आ गईं आप? आ जाइए, आप ही का घर है। जब चाहा आ गईं, हमारी तो जैसे अपनी कोई जिंदगी ही नहीं है। जा रही हूँ मैं रसोई में, आप लोग बैठिए।”

वह पैर पटकती हुई रसोई की तरफ बढ़ने ही वाली थी कि तभी पीछे से एक जानी-पहचानी, लेकिन बेहद गंभीर आवाज आई, “क्या सच में मेरी वजह से तुम्हारी जिंदगी नहीं है, श्रुति? क्या मैं तुम्हारे लिए इतनी बड़ी बोझ बन गई हूँ?”

श्रुति के कदम वहीं रुक गए। यह आवाज उसकी सास की नहीं थी। यह आवाज तो…

वह झटके से पलटी और दरवाजे पर खड़े शख्स को देखकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। दरवाजे पर उसकी सास नहीं, बल्कि उसकी अपनी सगी माँ, कमला जी खड़ी थीं। उनके चेहरे पर थकान से ज्यादा गहरा दुख और आंखों में आंसू थे। उनके बगल में विक्रम खड़ा था, जिसका चेहरा बिल्कुल शांत था।

श्रुति हक्की-बक्की रह गई। उसके होंठ कांपने लगे, गले से आवाज नहीं निकल रही थी। “माँ… तुम? मुझे… मुझे लगा कि विक्रम की माँ…”

“विक्रम की माँ आई हैं, इसलिए तुमने ऐसा बर्ताव किया?” कमला जी ने बीच में ही उसकी बात काटते हुए एक कड़कती हुई आवाज में पूछा। वे धीरे-धीरे चलकर घर के अंदर आईं और सोफे पर बैठ गईं। श्रुति दौड़कर उनके पास गई, “माँ, मुझे माफ कर दो, मुझे लगा मेरी सास आई हैं। अगर मुझे पता होता कि तुम आ रही हो तो मैं…”

“तो तुम क्या करती श्रुति?” कमला जी की आंखों से अब आंसू बहने लगे थे। “तुम मेरे स्वागत में पलकें बिछा देतीं? मेरे लिए छप्पन भोग बनातीं? मेरी आरती उतारतीं? क्यों? क्योंकि मैं तुम्हारी सगी माँ हूँ और वो तुम्हारी सास हैं? क्या मैंने तुम्हें बचपन से यही संस्कार दिए थे? मुझे आज पहली बार यह कहते हुए शर्म आ रही है कि तुम मेरी बेटी हो।”

श्रुति की नजरें शर्म से झुक गईं। वह जमीन की तरफ देखती रही, उसके पास अपनी माँ के सवालों का कोई जवाब नहीं था।

कमला जी ने आगे कहा, “श्रुति, एक औरत जब माँ बनती है, तो उसका दर्द, उसका प्यार, उसकी ममता सब एक जैसी होती है। चाहे वो तुम्हारी माँ हो या विक्रम की माँ। तुमने कहा कि वो तुम्हारी जिंदगी में कबाब की हड्डी बनने आ जाती हैं? जरा सोचो, अगर कल को तुम्हारी भाभी मेरे साथ यही सुलूक करे? अगर मैं तुम्हारे भाई के घर जाऊं और तुम्हारी भाभी बिना मेरी शक्ल देखे मुझे ताने मारे कि मैं उनकी खुशियों में जहर घोलने आ गई हूँ, तो तुम्हें कैसा लगेगा? क्या तब भी तुम अपनी भाभी का साथ दोगी? नहीं ना! तब तुम मुझसे लिपटकर रोओगी, अपने भाई से लड़ोगी कि वो अपनी पत्नी को तमीज सिखाए। फिर आज तुम खुद एक बहू होकर किसी और की माँ के साथ ऐसा घिनौना व्यवहार कैसे कर सकती हो?”

कमला जी की हर एक बात श्रुति के दिल में किसी तीर की तरह चुभ रही थी। उसे अपनी उस ओछी मानसिकता पर घिन आ रही थी।

“विक्रम की माँ ने अपना कलेजे का टुकड़ा तुम्हें सौंप दिया,” कमला जी ने विक्रम की तरफ देखते हुए कहा। “इस बेचारे ने मुझे फोन पर कहा था कि तुम बहुत खुश होगी। इसने मेरा सामान उठाया, मुझे इतने आदर से घर लाया और तुमने? तुमने बिना देखे ही जहर उगल दिया। अगर मेरी जगह सच में विक्रम की माँ होतीं, तो सोचो उस बूढ़ी औरत के दिल पर क्या गुजरती? वो तो शायद खून के घूंट पीकर रह जातीं, लेकिन उनका दिल हमेशा के लिए टूट जाता।”

श्रुति अब फूट-फूट कर रोने लगी थी। वह अपनी माँ के पैरों में गिर पड़ी। “मुझे माफ कर दो माँ, मुझे सच में बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं अपने स्वार्थ में इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे रिश्तों की अहमियत ही नजर नहीं आई। मुझे सच में लगा कि सास कभी माँ नहीं बन सकती, लेकिन आज तुमने मेरी आंखें खोल दीं। विक्रम, मुझे माफ कर दो प्लीज।”

विक्रम ने आगे बढ़कर श्रुति को उठाया। “श्रुति, मैंने तुम्हें कभी किसी बात के लिए नहीं टोका क्योंकि मैं चाहता था कि तुम खुद इस बात को समझो। मेरी माँ अक्सर मुझसे फोन पर पूछती हैं कि क्या तुम उनसे खुश हो? मैं हमेशा झूठ बोलता था कि तुम उन्हें बहुत प्यार करती हो। मुझे दुख सिर्फ इस बात का है कि तुम मेरे परिवार को कभी अपना नहीं मान पाईं।”

श्रुति ने अपने आंसू पोंछे और विक्रम के दोनों हाथ पकड़कर बोली, “विक्रम, हम आज कहीं नहीं जा रहे हैं। कोई रिसॉर्ट नहीं, कोई सालगिरह का जश्न नहीं। तुम अभी इसी वक्त दो टिकट बुक करो।”

“टिकट? कहाँ के लिए?” विक्रम ने हैरानी से पूछा।

“तुम्हारे गाँव के लिए,” श्रुति ने दृढ़ता से कहा। “अब तुम्हारी माँ गाँव में अकेली नहीं रहेंगी। हम कल ही जाकर उन्हें यहाँ ले आएंगे और वो हमेशा हमारे साथ रहेंगी। मैं उनकी वैसे ही सेवा करूंगी, उनका वैसे ही ख्याल रखूंगी जैसे मैं अपनी माँ का रखती हूँ। मुझे अपनी गलतियों का प्रायश्चित करना है। मैं उन्हें वह हर खुशी दूंगी जो एक बेटी अपनी माँ को देती है।”

यह सुनकर दरवाजे के पास खड़ी कमला जी के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान आ गई। उन्होंने आगे बढ़कर अपनी बेटी को गले से लगा लिया। विक्रम की आंखों में भी आज एक सुकून भरी चमक थी। उसे लगा जैसे आज उसकी शादीशुदा जिंदगी को एक नई और सच्ची शुरुआत मिल गई हो, जहाँ अब ‘सास’ और ‘माँ’ के बीच का वह खोखला पर्दा हमेशा के लिए गिर चुका था।

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मूल लेखिका : प्रियंका त्रिपाठी पांडे 

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