” तिरस्कार का बदला ” – डॉ. सुनील शर्मा

तिरिस्कृत और हताश, सुधाकर हाउसिंग सोसायटी से बाहर निकल कर अपनी बाईक के पास ही बैठ गया. हाथों में सर थामे तेज़ होती बारिश में वह सुबक सुबक कर रोने लगा. 

गांव से शहर आकर वह एम बी ए कोर्स में किसी अच्छे कॉलेज में एडमिशन के लिए पूरी मेहनत से पढ़ाई कर रहा था. घर से पैसे मांगने का न तो उसे साहस था और न ही उम्मीद. तीन बहन भाईयों को पिताजी गांव के ही विद्यालय में जैसे तैसे पढ़ा रहे थे. शहर में रहकर पढ़ने की उसकी अपनी ही ज़िद थी.

इसलिए एक फूड सप्लाई चेन में डिलिवरी बॉय की नौकरी पकड़ ली. बाईक कंपनी ने ही दी थी. कहीं कहीं अच्छी टिप भी मिल जाती थीं, लेकिन आज तेज़ होती बरसात में फंस गया. जगह जगह जल भराव के कारण ट्रैफिक जाम था इसलिए फूड पैकेज ले कर डेढ़ घंटा देर से पहुंचा. कॉल बैल बजाने

पर दरवाजा खुलते ही एक लड़का उस पर बरस पड़ा. शायद अंदर पार्टी चल रही थी. संगीत का शोर बाहर तक आ रहा था. पी जी में रहने वाले युवक थे. सभी के सामने बुरी तरह से डांटने लगा. सुधाकर ने बताना चाहा कि बरसात में फंसने की वजह से देर हुई, लेकिन वह और गुस्सा हो गया. पैकेज तो लिया ही नहीं, कंपनी के नंबर पर शिकायत भी कर दी. उसके बॉस ने भी फोन पर ही कल से न आने को कह दिया. 

सुधाकर की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा. उसे सूझ नहीं रहा था कि वह क्या करेगा. कैसे किसी से मदद मांगेगा. क्या अपना उद्देश्य छोड़कर गांव जाना ही ठीक रहेगा. क्या उसे सपने देखने का अधिकार नहीं. 

आज एक मल्टीनेशनल कंपनी में उच्च पद पर आसीन सुधाकर की आंखों के आगे वह दिन किसी फिल्म की तरह घूम गया. वह स्वयं अभी अविवाहित ही था तथा पी जी में रह रहा था. आज मैस बंद थी इसलिए उसने ऑनलाइन खाने का आर्डर दिया. बैल बजाने पर दरवाजा खोला तो

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वहीं लड़का डिलिवरी बाॅय के रुप में पैकेज दिया खड़ा था. सुधाकर ने उससे पूछा कि क्या वह उसे पहचानता है. उसके न कहने पर सुधाकर ने बरसात की उस शाम का किस्सा उसे सुनाया. वह हैरान हुआ और ग्लानि से भर गया. लेकिन सुधाकर ने बताया कि किस तरह उस दिन के बाद में एम बी ए करने की उसकी इच्छा और भी बलवती हो गई. वह दिन भर पढ़ाई कर रात में टैक्सी चलाने लगा. और फिर उसे अच्छे कॉलेज में एडमिशन के साथ साथ स्कौलरशिप भी मिल गया. 

सुधाकर ने उससे पूछा तो वह बोला कि पिछले छः माह से वह बेकार है. कंपनी में छंटनी हो गई और कहीं और काम नहीं मिला. डिलिवरी बाॅय का कार्य भी बहुत मुश्किल से मिला. सुधाकर ने उसे अपना कार्ड दिया तथा अगले दिन ऑफिस में मिलने को कहा. नौकरी मिलने की आस में वह फूट फूटकर रोने लगा. सुधाकर ने उसे गले से लगा लिया.

– डॉ. सुनील शर्मा

गुरुग्राम, हरियाणा 

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