सपना आज बहुत खुश थी। आज उसे मुहल्ले मे उसके दो मकान छोड़ कर रहने वाली शांति जी के पोती का महिलाओं का संगीत कार्यक्रम था। शादी थी उसकी,,जो दूसरे शहर से हो रही थी। उसी के उपलक्ष्य मे ये प्रोग्राम रखा था। गाने बजाने के साथ खाने पीने का भी कार्यक्रम था।
सपना ने हाथ मुंह धोकर अलमारी खोल अपनी पसंदीदा हरी सिल्क की साड़ी निकाली पहनने को जो उसने कुछ समय पहले ₹850 में खरीदा था। सपना को हरा रंग बहुत पसंद था। ये उसकी पसंदीदा साड़ी थी । उसने साड़ी बाहर निकाल बांधने लगी। पूरी साड़ी बांध ली थी जब पल्लू पर पिन लगाने लगी तो देखा बिल्कुल गले के पास साड़ी में एक बड़ा चार-पांच इंच का गोल कट लगा था।
वह देखकर घबरा गई, अरे यह क्या मेरी साड़ी फट कैसे गई। मैं तो एक बार ही इसे पहना था तब तो ठीक थी। और फिर दोबारा तो निकाला ही नहीं। देखने लगी तो क्या देखा साड़ी उतार कर उसे ठीक से एक दो छोटे-छोटे छेद और भी है।उसको जब ध्यान से देखा और सूंघा तो उसमें से बदबू भी आ रही थी ।
उसने उठाकर रख दिया साड़ी को। सपना के दिमाग में आया कि जरूर उसमें खाने पीने का कुछ सामान गिरा है और उसको साफ नहीं किया गया ,ऐसे ही रख दिया गया। इसी से यह साड़ी कट गई। अब सिल्क तो वैसे भी बहुत नाजुक होता है। अब सपना बैठकर कमरे में रोने लगी हाय मेरी साड़ी हाय मेरी साड़ी ।
तभी सपना की सास आई और पूछने लगी क्या हुआ बहू क्यों चिल्ला चिल्ला कर रो रही है। अरे मां मेरी साड़ी, क्या साड़ी मेरी हरी सिल्क की साड़ी फट गई। कैसे पता नहीं कैसे मैं तो बस एक बार ही जब खरीदा था तभी एक बार पहना था। कितनी मुश्किल से और कितनी हसरत से ये साड़ी खरीदी थी ।
अब क्या होगा क्या-क्या होगा, सपना की सास बोली शांति भाभी के यहां फंक्शन में जाना है तो दूसरी साड़ी पहनकर तैयार हो जा इस तरह से साड़ी के लिए रोने बैठ गई जैसे कोई मर गया हो।
उदास मन से सपना में दूसरी साड़ी पहनी और फंक्शन में गई।। लेकिन उसके मन में लगातार यह बात घूम रही थी कि आखिर साड़ी फट कैसे गई । वह तो कुछ सोच ही नहीं पा रही थी। उसने जब साड़ी खरीदी थी तभी उसे एक बार पहनी थी और कुछ घंटे के लिए और फिर संभाल कर रख दी थी । फंक्शन से लौट कर घर आ गई तब भी उसके मन से यह बातें जा ही नहीं रही थी ।
आखिर साड़ी फटी कैसे। इसी उधेडबुन मे कब उसे नींद आ गई पता ही नहीं चला। दूसरे दिन सब कुछ भूल कर सपना काम में लग गई । सास विमला जी ने बताया कि शाम को उसकी नंद नीलम आ रही है सपना चाय के साथ कुछ पकौड़ी बनाने की तैयारी कर लेना।
शाम को सपना की नंद नीलम घर आई तो ,शॉपिंग करके आ रही थी। जब सब लोग चाय को बैठे तो नीलम ने 3 साड़ियां बैग से निकाल कर रखी । देखो मम्मी भाभी मैं यह साड़ी खरीद के लाई हूं सेल लगी थी। और यह साड़ी यह साड़ी भाभी आपके हरी साड़ी की जैसी ही है ।
हां यह तो बिल्कुल वैसे ही लग रही है । तभी सपना के दिमाग में आया कि मेरी हरी साड़ी तो नीलम ने पहनी थी। जब वह यहां आई थी। अचानक से पता चला कि पड़ोस में आंटी यहां उनके पोते का मुंडन संस्कार की पार्टी है। तो नीलम ने कहा कि मैं तो भाभी कोई अच्छी साड़ी लेकर नहीं आई हूं।
तब सपना ने अपनी अलमारी खोल दी और बोले कि तुम जो साड़ी पसंद हो ले लो। फिर नीलम ने सपना की हरी सिल्क की साड़ी निकाली और बोली ये अच्छी है भाभी मैं तो यही पहनूंगी । तभी सपना ने पूछ लिया अरे नीलम यह बताओ जब तुमने पड़ोस में फंक्शन में जाने को मेरी साड़ी पहनी थी तो क्या उसे समय फटी थी। नहीं भाभी तो क्या उसके ऊपर कुछ गिर गया था खाते वक्त ।
क्यों क्या हुआ भाभी, मेरी साड़ी में सामने गले के सामने बड़ा सा कट लगा है साड़ी फटी हुई है और छूने पर उसके आसपास का कपड़ा भी फट रहा है। लेकिन भाभी मेरे सामने तो वह नहीं फटी थी। तो क्या कुछ गिर गया था नीलम चुपचाप रही। बोलो नीलम कई बार पूछने पर नीलम बोली हां भाभी वो आइसक्रीम खा रही थी, तभी दो बच्चे दौड़ते हुए आए उनका धक्का लगने से वह आइसक्रीम साड़ी के ऊपर गिर गई थी ।
लेकिन मैं तो उसे टिशू पेपर से पूछ दिया था। लेकिन उसमें मीठा लगा रह गया था ना नीलम और सिल्क की साड़ी तो होती है कितनी नाजुक। हाँ जानती हूं तुम उस समय बता देती हमें तो कितना अच्छा होता।
मैं पानी से उसको साफ कर देती। मेरी पूरी साड़ी बेकार हो गई है और वह सामने से ही फट गई है ,पहनने लायक नहीं रह गई। बेकार हो गई और सपना रोने लगी, कितनी हसरतों से वो साड़ी खरीदी थी मैंने पर मेरे नसीब में नहीं था पहनना।रोते हुए सपना कमरे में जाकर लेट गई
लेटे लेटे सपना शादी के पहले की दुनिया मे खो गई। माँ नहीं थी उसकी, दो भाभियाँ और पिता जी थे। सपना को सिल्क की साड़ी बहुत पसंद थी। जब सपना के शादी के कपडो की खरीदारी होनी थी तो सपना ने अपनी बड़ी भाभी से कहा भाभी मुझे सिल्क की साड़ी चाहिये वो भी हरे रंग की।
अच्छा अच्छा ठीक है ले लेगें भाभी बोली। फिर जब कपड़े खरीदने जाना था तो सपना की छोटी भाभी ने ससुर जी से कहा कि,,मैं अपने घर से साड़ी खरीद लाती हूं सपना के लिए घर की दुकान है तो सस्ती साड़ी मिल जाएगी। छोटी भाभी के यहां साडियों की दुकान थी।
पिताजी ने हामी भर दी।अब छोटी भाभी अपनी दुकान से कुछ पुरानी रखी हुई सिल्की की साड़ी खरीद लाई,सस्ते दामों में उनमें से ज्यादा कुछ पसंद तो नहीं आया सपना को, लेकिन पैसे को संभाल कर खर्च करना था क्योंकि ज्यादा लंबी चौड़ी शादी नहीं हो रही थी तो सपना ने चुपचाप सब स्वीकार कर लिया।
अब शादी हो गई सपना की एक दिन वह अपने साडियों में से एक सिल्की की साड़ी पहन रही थी कहीं जाने को, तो साड़ी को पैर से दबाकर थोड़ा खींच कर बराबर करना चाह रही थी तो वही नीचे से फाल के पास से साड़ी काफी लंबी तक फट गई। और पिन लगाते समय भी वहां से फट जा रही थी।
ऐसा लग रह था साडियों में सीलन सी भरी हुई हो जिससे वह जब गल गई थी और फटती जा रही थी । भाभी लगता है पुरानी साड़ियां उठा ले आई। उसका मन बहुत दुखी हुआ। तीन साड़ियां सिल्क की थी उनमें से दो तो ऐसे ही फट गई तीसरी पहनने का कभी मन ही नहीं किया सपनाका।
सिल्की की साड़ी पहनने का सपना, ,सपना बनकर मन मे पलता रहा। यहां ससुराल में भी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी,कि महंगी महंगी साड़ियां खरीदी जाए। फिर उसने कुछ बचत करके हजार रुपए इकट्ठा किए थे,यह 8:50 की हरी सिल्क की साड़ी खरीदी थी । उसको पहनाने का भी सपना पूरा अधूरा रह गया सपना का।
सपना सोचने लगी छोड़ो अब खत्म करो यह सिल्क की साड़ी पहनने का सपना ।कुछ सपना सपना बनकर ही रह जाती है वह कभी पूरे नहीं होते। वैसे ही मेरा सपना था जो कभी तक पूरा नहीं हुआ और आगे का पता नहीं।
दोस्तों कभी-कभी ऐसा हो जाता है जिसकी चीज को आपको बहुत इच्छा होती है वह नहीं मिलती ,या मिलती भी है तो किसी न किसी बहाने से बेकार हो जाती है। यही सब सपना के साथ हुआ । जिंदगी इसी का नाम है सब कुछ चलता रहता है ऐसे ही। सपना के सपने की तरह आपका भी कोई सपना अधूरा तो नहीं रह गया बताएं । और फिर एक समय ऐसा भी आता है जिंदगी में की फिर कोई सपना ही नहीं रह जाता है ना।
मंजू ओमर
झांसी उत्तर प्रदेश
20 जुलाई