गांव में जाने के बाद ही पता चला कि मां काफी समय से बीमार है। खटिया पर लेटी हुई भाभी के कहने पर भी मां विश्वास नहीं कर पा रही थी कि सीमा और मैं वास्तव में उनसे मिलने ही आए हैं। काफी कमजोर हो गई थी मां। अब उसका पूरा चेहरा झुर्रियों से भरा हुआ था। हालांकि उसे उठने में बहुत तकलीफ हो रही थी लेकिन फिर भी हम दोनों को देखकर मानो उसमें नई जान आ गई हो।
कैसे आना हुआ? कोई चिट्ठी पत्री भी नहीं? कुछ नहीं, यूं ही मां! घर खाली खाली लग रहा था ,तेरी याद आई तो आ गए। आंसू सिर्फ सीमा की आंखों से ही नहीं छलके थे, शायद विनय की आंखें भी भर आई थी। मां ने हमेशा के जैसे विनय का हाथ पकड़ा ,प्यार से बिठाया और दोनों को ढेरों आशीर्वाद दिए।
मां का स्पर्श आज भी वही था। मां ने विनय के दोनों हाथों को वैसे ही पकड़ रखा था जैसे कि आज से 20 साल पहले जब विनय ने मां से कहा था कि गांव में करने को कुछ भी नहीं है, मैं अब शहर जाकर काम करना चाहता हूं यहां पर हम सिवाय खेती के कुछ ना कर पाएंगे और सारा दिन बिट्टू भी बदमाशी करता घूमेगा। वैसे भी शहर से आई सीमा का मन गांव में लगता भी कहां था। सीमा के बहनोई ने विनय के लिए शहर में एक नौकरी ढूंढ रखी थी। तब पिताजी ने भी बहुत समझाया था, अपने गांव में ही दोनों भाई अगर खेती करो तो यहां ही काफी मुनाफा कमा लोगे ।लेकिन शहर की चकाचौंध और अपने बच्चे को बहुत अच्छा और ऊंचा बनाने की ललक उन्हें वहां पर रहने नहीं दे रही थी ।माता और पिता की आंखों में आंसू शायद उन्हें नजर ही नहीं आए थे ।उनके सामने था एक बहुत सुनहरा भविष्य था जिसमें कि इन भूतकाल के गंवारो के लिए कोई जगह नहीं थी।
घर छोड़ते हुए रह रह कर मन में सिर्फ यही मलाल था कि हमारे जाने से भैया को तो फायदा हो जाएगा ,पूरे खेत की उपज की कमाई वह अकेले ही खाएंगे। लेकिन ऐसा कुछ ना हुआ। साल दर साल भैया कुछ ना कुछ विनय के हिस्से का भेजते जरूर थे। सच पूछा जाए तो शहर में गांव से आए उन पैसों की भी वास्तव में जरूरत ही होती थी। नौकरी की कमाई ,जहां हर चीज मोल की लेनी होती थी ,और सीमा को बहन के साथ दिखावा करने की जो आदत हुई, वह सब गांव के पैसों से ही पूरा पड़ता था। कई बार भैया गांव से अनाज भी भिजवा देते थे।
शहर में बिट्टू की पढ़ाई का खर्चा भी कम ना था। शहर में व्यस्तताएं इतनी थी कि कभी गांव जाना ही ना होता था। जब पिताजी थे तो एक दो बार तो वह शहर में मिलने आए भी थे । पिताजी की मृत्यु के समय भी बिट्टू को मौसी के पास ही छोड़कर गांव जाना हुआ था। बिट्टू को गांव का गंवार होने से हर तरह से बचाया जा रहा था ,और बीतते समय के साथ बिट्टू को शहर तो क्या ,भारत ही अविकसित देश लगता था।
कॉलेज में पढ़ने वाली नीता के पिता ने बिट्टू का भविष्य सुरक्षित करने का वादा किया और अपनी इकलौती बेटी की शादी बिट्टू के साथ कर दी। समय बेशक बदल चुका था पर घर पर परिस्थितियां वही पुरानी ही लौटती सी दिख रही थी। बस फर्क इतना था कि माताजी और पिताजी की जगह सीमा और विनय, उन दोनों ने ले ली थी। सीमा की जगह नीता आ बैठी थी, जिसका कि इस घर की गरीबी में दम घुटता था। सेंट्रली ए.सी वाले बड़े घर से आई हुई नीता, इस डुप्लेक्स फ्लैट में हर समय रहने वाले नौकरों के बिना घर में रह नहीं पाती थी। अपने पति का भारत में रहकर एक छोटी सी नौकरी में संतुष्ट हो जाना उसे पसंद न था। उसके पिता ने ही बिट्टू की आगे की विदेश में पढ़ाई और वीजा वगैरह का इंतजाम किया। नीता के चाचा जी यू .एस में ही रहते थे। उसके पिता बिजनेस के सिलसिले में अक्सर विदेशों में भी जाते रहते थे और कई बार नीता का भी विदेशों में घूमना होता ही रहता था।
आज के समय परमात्मा भी कंप्यूटर लेकर बैठा होता है इसलिए उनके हिसाब होने में भी अब जन्मों की जरूरत नहीं है, लगभग इसी जन्म में ही सब कर्मफल लौट के आता है।सीमा और विनय के आंसू, नीता और बिट्टू के उत्साह के आगे फीके थे । शायद उन्हें उनके आंसू दिख ही नहीं रहे थे । एक दिन जैसे इन दोनों की आंखों में शहर की चकाचौंध थी ,तो आज नीता और बिट्टू की आंखों में विदेश की रंगीनियां। जाते हुए दोनों ने मुड़ कर भी ना देखा । सिर्फ यही कहा कि कल रात की फ्लाइट से हम लोग चले जाएंगे। आपके लिए हम वहां से पैसे जरूर भेजेंगे।
उनके जाने के बाद नवरात्रों में भी ज्योत तो दूर की बात, घर की लाइट तक ना जली थी।चूल्हा ठंडा पड़ा था । याद आ रही थी पुरानी यादें, उन दोनों ने भी तो कभी शहर आने के बाद माता पिता को याद तक ना करा था । खुद में ही व्यस्त हो गए थे , तो क्या अब यह दोनों बच्चे इन्हें याद करेंगे?
यादों के घेरे में डूबे ,तो पीछे जाते जाते बिट्टू की किशोरावस्था से होते हुए उसके बचपन ,और फिर अपनी जवानी, यादें आई तो विनय जी रुक ना पाए। सीमा का हाथ पकड़ा और गांव की टिकट कटवा कर चल दिए सीधे अपनी मां से मिलने।
भाभी शरबत लेकर आ गई थी और मां आशीर्वाद देते देते कह रही थी इस नवरात्रि में मैंने माता रानी से यही मांगा था कि एक बार जाने से पहले अपने बीनू का मुंह तो देख लूं। देखो तो माता रानी ने मेरी सुन ली।?????????
दोनों चुप थे और मां खुश थी। समय तो अब लौट कर आ नहीं सकता था। घर के हर कोने को घूरती हुई विनय की आंखें जाने क्या खोज रही थी? लेकिन आंसुओं से भरी पनियाली आंखों से सीमा को तो कुछ भी नहीं दिख रहा था। मां ने अभी भी विनय का हाथ पकड़ा हुआ था। रिश्तो की कीमत वह अब समझ चुके थे पर कुछ बदल थोड़े ही सकते थे। अब उनके जीवन में भी सिवाय उनके बच्चों के विदेश से आने की इंतजार के सिवाय कुछ भी तो नहीं रह गया था। फिर भी जितना समय मैं अपनी मां के साथ गुजार सके उन्होंने मां के जीते जी हर त्यौहार मां के साथ बिताना चाहते थे।
मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा में