रिश्तों की अनकही डायरी

आज मैंने बहुत बड़ा पाप किया है। मैंने  दीक्षा  पर हाथ उठाया। मुझे खुद से घिन आ रही है। मैं जानता हूँ कि वो इस शादी से खुश नहीं है, किसी और को चाहती है। मैं ये भी जानता हूँ कि वो रोज़ दोपहर को उससे मिलने जाती है। लेकिन वो भी क्या करे, उसके पिता ने जबरदस्ती उसे मेरे गले बांध दिया। मैं उसे आज़ाद करना चाहता हूँ, लेकिन डरता हूँ कि समाज उसे ताने मारेगा। मैं बस उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ जब वो खुद हिम्मत करके मुझे तलाक के कागज़ थमा दे। मेरी माँ के अपमान पर मुझे गुस्सा नहीं आना चाहिए था, क्योंकि वो अभी भी इस घर को अपना नहीं मान पाई है। काश, मैं उसके आंसुओं की वजह न बनता।”

शहर के एक शांत और साधारण से मोहल्ले में रहने वाले सुमित की ज़िंदगी बिल्कुल सीधी-सादी थी। वह एक सरकारी दफ्तर में क्लर्क था और अपनी बूढ़ी माँ, सुमित्रा देवी के साथ एक छोटे लेकिन बेहद साफ़-सुथरे घर में रहता था। सुमित के पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था, जिसके बाद उसकी माँ ने ही सिलाई-कढ़ाई करके उसे पाला-पोसा और इस काबिल बनाया था। सुमित स्वभाव से बेहद शांत, ईमानदार और कम बोलने वाला लड़का था। उसकी इसी सादगी को देखकर शहर के एक बड़े व्यापारी ने अपनी बेटी  दीक्षा  का रिश्ता उसके लिए तय कर दिया।  दीक्षा  के पिता को लगता था कि एक साधारण और शरीफ लड़का ही उनकी बेटी की ज़िद्दी आदतों को सह सकता है और उसे खुश रख सकता है। शादी में लड़की वालों ने अपनी हैसियत के हिसाब से खूब दान-दहेज दिया, महंगे उपहारों और गहनों से सुमित का घर भर दिया।

लेकिन इस आलीशान शादी की चमक के पीछे एक गहरा अंधेरा छिपा था।  दीक्षा  इस शादी से बिल्कुल भी खुश नहीं थी। वह कॉलेज के दिनों से ही राहुल नाम के एक लड़के से बेइंतहा प्यार करती थी। दोनों ने साथ जीने-मरने की कसमें खाई थीं, लेकिन जब  दीक्षा  के पिता को इस बात की भनक लगी, तो उन्होंने राहुल की हैसियत को आड़े हाथों लेते हुए  दीक्षा  को घर में कैद कर दिया और जल्दबाज़ी में सुमित से उसकी शादी पक्की कर दी।  दीक्षा  ने राहुल से भागने की मिन्नतें की थीं, लेकिन उस वक़्त जो हुआ, वह  दीक्षा  के दिल में एक कांटे की तरह चुभता रहता था।

शादी के सारे रीति-रिवाज़ खत्म होने के बाद जब  दीक्षा  सज-धज कर अपने सुहागरात वाले कमरे में बैठी थी, तो उसके चेहरे पर कोई शर्म या खुशी नहीं थी, बल्कि आँखों में एक अजीब सी नफरत और गुस्सा था। वह चाहती थी कि आज रात कुछ ऐसा हो जिससे झगड़ा बढ़े और वह इस शादी को पहले ही दिन तोड़ दे। दरवाज़े की कुंडी खुली और सुमित हाथों में केसर वाले दूध का गिलास लिए कमरे में दाखिल हुआ। उसने बहुत ही शालीनता से गिलास मेज़ पर रखा और  दीक्षा  की तरफ देखा।

 दीक्षा  ने तुरंत अपनी भारी साड़ी का पल्लू झटकते हुए एक बेहद कड़वा और तीखा सवाल दाग दिया, “सुनो, मुझे तुमसे एक बात पूछनी है। अगर कोई पति अपनी पत्नी की मर्जी के बिना, उसकी बिना किसी रज़ामंदी के उसे छूने की कोशिश करे, तो उसे तुम क्या कहोगे? एक पति का हक, या फिर एक सीधा-साधा बलात्कार?”

कमरे में कुछ पल के लिए एक खौफनाक सन्नाटा छा गया।  दीक्षा  को लगा था कि सुमित इस बात पर भड़क जाएगा, अपनी मर्दानगी का वास्ता देगा या कम से कम बहस करेगा। लेकिन सुमित के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई। उसने बहुत ही शांत और धीमी आवाज़ में कहा, “आपको इतनी गहरी और कड़वी बातों में जाने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं तो बस ये दूध का गिलास लेकर आया था कि शायद आप दिन भर की रस्मों से थक गई होंगी, इसे पी लेंगी तो थोड़ा आराम मिलेगा। मैं तो सिर्फ आपको शुभ रात्रि कहने आया था।”

इतना कहकर सुमित अपनी एक चादर उठाकर कमरे से बाहर चला गया और बाहर सोफे पर जाकर सो गया।  दीक्षा  मन मारकर रह गई। उसने जिस हंगामे और झगड़े की उम्मीद की थी, वह सुमित की खामोशी और शराफत के आगे धराशायी हो गई थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस इंसान से पीछा कैसे छुड़ाया जाए।

दिन बीतने लगे।  दीक्षा  तो बस नाम के लिए उस घर की बहू थी। घर के किसी भी काम में उसका कोई योगदान नहीं होता था। वह सुबह देर से उठती, अपने कमरे में ही नाश्ता मंगवाती और दिन भर अपने महंगे स्मार्टफोन पर ऑनलाइन रहती। वह घंटों राहुल से चैट करती और फोन पर बातें करती रहती। दूसरी तरफ, सुमित्रा देवी उम्र के इस पड़ाव पर भी घर का सारा काम खुद करती थीं। सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक, कपड़े धोने से लेकर घर की सफाई तक, सब कुछ उनके ही ज़िम्मे था। लेकिन उन्होंने कभी  दीक्षा  से कोई शिकायत नहीं की। उनके होठों पर हमेशा एक ममतामयी मुस्कान रहती थी। उन्हें लगता था कि शायद नई बच्ची है, धीरे-धीरे घर के माहौल में ढल जाएगी।

सुमित भी अपनी दिनचर्या में मगन रहता। वह सुबह उठकर तैयार होता और दफ्तर चला जाता। वह बहुत कम बोलता था। दिन में उसकी  दीक्षा  से कोई बात नहीं होती थी। बस रात को खाने के वक़्त वह अपनी पत्नी से इतना ज़रूर पूछता था कि, “खाना कहाँ खाओगी? अपने कमरे में भिजवा दूँ या हमारे साथ बैठकर खाओगी?”  दीक्षा  अक्सर चिढ़कर जवाब देती कि उसे भूख नहीं है या वह कमरे में ही खा लेगी। सुमित को रात को सोने से पहले डायरी लिखने की आदत थी। वह रोज़ रात को मेज़ की बत्ती जलाकर कुछ पन्ने लिखता और फिर चुपचाप ज़मीन पर गद्दा बिछाकर सो जाता।  दीक्षा  और सुमित शादी के इतने दिनों बाद भी अजनबी ही थे।

 दीक्षा  के पास मायके से आई एक स्कूटी थी। जैसे ही सुमित दफ्तर के लिए निकलता,  दीक्षा  अपनी स्कूटी उठाती और घर से बाहर निकल जाती। वह शहर के पार्कों और कैफे में जाकर राहुल से मिलती थी। और फिर सुमित के दफ्तर से लौटने से ठीक पहले घर वापस आ जाती। सुमित्रा देवी सब देखती थीं, लेकिन उन्होंने कभी अपनी बहू पर कोई बंदिश नहीं लगाई।

एक दिन रविवार था। सुमित की छुट्टी थी और वह घर पर ही था। सुमित्रा देवी ने नाश्ते में आलू के पराठे बनाए थे।  दीक्षा  कमरे से बाहर आई और डाइनिंग टेबल पर बैठ गई। सुमित्रा देवी ने प्यार से उसे गरम पराठा परोसा।  दीक्षा  ने जैसे ही एक निवाला मुँह में रखा, उसका पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने ज़ोर से प्लेट ज़मीन पर फेंक दी। प्लेट के टुकड़े-टुकड़े हो गए और सारा खाना ज़मीन पर बिखर गया।

“ये क्या बकवास है! नमक इतना ज़्यादा है कि ज़हर लग रहा है। क्या आपको इतना भी नहीं पता कि खाना कैसे बनता है? मेरे मायके में तो नौकर भी इससे अच्छा खाना बनाते हैं। पता नहीं मेरे पापा ने किस दरिद्र और गंवार घर में मुझे धकेल दिया है!”  दीक्षा  ने चीखते हुए सुमित्रा देवी को अपशब्द कहने शुरू कर दिए।

सुमित्रा देवी सहम गईं और उनकी आँखों में आँसू आ गए। तभी सुमित, जो बाहर बरामदे में अखबार पढ़ रहा था, यह शोर सुनकर अंदर आया। अपनी माँ की आँखों में आँसू और ज़मीन पर बिखरा खाना देखकर उसका सालों का धैर्य जवाब दे गया। वह हमेशा शांत रहने वाला लड़का, अचानक गुस्से से कांप उठा। उसने आगे बढ़कर एक ज़ोरदार तमाचा  दीक्षा  के गाल पर जड़ दिया।

“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी माँ से इस तरह बात करने की?” सुमित दहाड़ा।

 दीक्षा  अपना गाल पकड़े हुए स्तब्ध रह गई। लेकिन इससे पहले कि बात और बिगड़ती, सुमित्रा देवी ने आगे बढ़कर सुमित को ज़ोर से डांटा। “तू पागल हो गया है सुमित? किसी औरत पर हाथ उठाता है? मैंने तुझे यही संस्कार दिए हैं? बहू है वो इस घर की, गलती हो गई मुझसे, नमक ज़्यादा गिर गया होगा। तूने उस पर हाथ कैसे उठाया?” माँ ने अपने बेटे को लगभग धक्के मारते हुए पीछे कर दिया।

 दीक्षा  को तो जैसे इसी पल का इंतज़ार था। उसे वो बहाना मिल गया था जिसकी उसे तलाश थी। वह पैर पटकती हुई उठी, “आज तुमने मुझ पर हाथ उठाया है, अब मैं इस घटिया घर में एक पल भी नहीं रुकूँगी।” उसने तुरंत अपनी स्कूटी की चाबी उठाई और घर से बाहर निकल गई।

वह सीधे राहुल के पास पहुँची। राहुल उस वक़्त एक कैफे में बैठा दोस्तों के साथ हंस-बोल रहा था।  दीक्षा  को रोते हुए और गुस्से में देखकर वह थोड़ा घबरा गया।

“क्या हुआ  दीक्षा ? तुम इस तरह अचानक…”

“मुझे अभी के अभी तुम्हारे साथ यहाँ से जाना है राहुल। बहुत हो गया। उस गंवार ने आज मुझ पर हाथ उठाया है। मैं अब उस नर्क में वापस नहीं जा सकती। चलो, हम इसी वक़्त कहीं दूर भाग चलते हैं और शादी कर लेते हैं,”  दीक्षा  ने रोते हुए कहा।

राहुल के चेहरे का रंग उड़ गया। वह इधर-उधर देखने लगा। “अरे…  दीक्षा … शांत हो जाओ। देखो, भागना कोई मज़ाक नहीं है। मेरे पास अभी न कोई ढंग की नौकरी है और न ही इतने पैसे कि हम दूसरे शहर में सेटल हो सकें। मेरे घरवाले भी अभी नहीं मानेंगे। तुम थोड़ा वक़्त दो मुझे… आज कल में कुछ सोचते हैं।”

 दीक्षा  ने अपने आँसू पोंछे और राहुल की आँखों में सीधा देखा। उसकी आँखों में अब प्यार नहीं, बल्कि एक गहरी निराशा और हकीकत की पहचान थी। “आज कल… आज कल… तुम हमेशा यही कहते हो राहुल। तुम्हें याद है हमारी शादी का वो दिन? जब मैं लाल जोड़े में अपने घर के पिछले दरवाज़े से भागकर तुम्हारे पास आई थी? तब तुमने क्या कहा था? तुमने ही तो मुझे धक्के मारकर वापस लौटा दिया था यह कहकर कि तुम मेरे बाप की पुलिस कंप्लेंट से डरते हो और तुम मेरा बोझ नहीं उठा सकते। मैंने अपनी सारी इज़्ज़त दांव पर लगा दी थी, लेकिन तुम एक कायर निकले।”

राहुल अपनी नज़रें चुराने लगा।  दीक्षा  को आज एहसास हुआ कि वह किस इंसान के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी, अपनी शादी, और उस परिवार को दांव पर लगा रही थी, जिसने बिना किसी शर्त के उसे अपना लिया था। उसे सुमित्रा देवी का वो चेहरा याद आया जो उसकी गालियों के बावजूद अपने बेटे को डांट रही थीं, सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने अपनी पत्नी पर हाथ उठाया था।

वह बिना कुछ कहे वहाँ से मुड़ गई। रास्ते भर उसकी आँखों से आँसू बहते रहे, लेकिन ये आँसू राहुल के लिए नहीं, बल्कि अपने उस अंधेपन के लिए थे जिसने उसे कभी सच देखने ही नहीं दिया।

जब वह वापस घर पहुँची, तो शाम ढल चुकी थी। घर में एकदम शांति थी। वह सीधे अपने कमरे में गई। सुमित कमरे में नहीं था, लेकिन मेज़ पर उसकी डायरी खुली पड़ी थी। हवा से पन्ने पलट रहे थे।  दीक्षा  ने कांपते हाथों से डायरी उठाई और आज की तारीख का पन्ना पढ़ने लगी।

सुमित ने लिखा था- “आज मैंने बहुत बड़ा पाप किया है। मैंने  दीक्षा  पर हाथ उठाया। मुझे खुद से घिन आ रही है। मैं जानता हूँ कि वो इस शादी से खुश नहीं है, किसी और को चाहती है। मैं ये भी जानता हूँ कि वो रोज़ दोपहर को उससे मिलने जाती है। लेकिन वो भी क्या करे, उसके पिता ने जबरदस्ती उसे मेरे गले बांध दिया। मैं उसे आज़ाद करना चाहता हूँ, लेकिन डरता हूँ कि समाज उसे ताने मारेगा। मैं बस उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ जब वो खुद हिम्मत करके मुझे तलाक के कागज़ थमा दे। मेरी माँ के अपमान पर मुझे गुस्सा नहीं आना चाहिए था, क्योंकि वो अभी भी इस घर को अपना नहीं मान पाई है। काश, मैं उसके आंसुओं की वजह न बनता।”

डायरी के उन पन्नों ने  दीक्षा  के अंदर के सारे अहंकार और गलतफहमियों को राख कर दिया। एक तरफ वो लड़का था जिसे वह प्यार करती थी, जो सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करता था लेकिन ज़िम्मेदारी लेने से भागता था। और दूसरी तरफ यह इंसान था, जिसे उसने हमेशा गालियां दीं, नफरत दी, फिर भी वह उसकी इज़्ज़त की खातिर समाज की नज़रों में उसे बचाए हुए था, उसकी हर बेवफाई को जानते हुए भी चुप था।

 दीक्षा  डायरी सीने से लगाकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसे महसूस हुआ कि असली प्यार सिर्फ कसमें खाना नहीं होता, बल्कि चुप रहकर भी किसी की इज़्ज़त और ज़िम्मेदारी निभाना होता है। उसी रात, जब सुमित कमरे में सोने के लिए आया, तो उसने देखा कि  दीक्षा  ज़मीन पर गद्दा बिछा रही है।

सुमित ने हैरानी से पूछा, “ये क्या कर रही हो?”

 दीक्षा  ने आँखों में आँसू और होठों पर एक सच्ची मुस्कान लिए कहा, “अपने पति के साथ एक नई शुरुआत कर रही हूँ। बहुत भटक लिया बाहर, अब मुझे अपने घर और अपने रिश्तों की अहमियत समझ आ गई है। क्या आप मुझे मेरी गलतियों के लिए माफ़ कर देंगे?”

सुमित की आँखों में एक चमक आ गई। खामोश डायरी के पन्नों ने आज दो दिलों के बीच के सारे फासले मिटा दिए थे। एक अनचाही शादी, आखिरकार एक सच्चे और अटूट रिश्ते में बदल गई थी।

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#रिश्तों की अनकही डायरी

लेखिका : ऋतु पहड़िया  

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