पर्वतेश सूनी ऑखों से सामने आई ० सी० यू० में भर्ती पत्नी ममता को देख रहे थे। ममता को पॉच दिन में लगातार तीन हार्ट अटैक आ चुके थे। वह अब एक जिन्दा लाश से अधिक कुछ नहीं थी। डॉक्टर ने भी कह दिया है कि अचानक मिले आघात से ममता के ठीक होने की संभावना बहुत कम है। दवाइयों और मशीनों के सहारे वह केवल सांस ले रही हैं। जैसे ही मशीनें हटाई जायेंगी, सब कुछ समाप्त हो जायेगा।
पर्वतेश के गुस्से से सब डरते थे। वेदज्ञ तो उनसे कुछ भी कहते हुये इतना डरता था कि जो कुछ कहना होता था मॉ से कहता था। ऐसा नहीं था कि पर्वतेश ममता और वेदज्ञ से प्यार नहीं करते थे। इन दोनों में जान बसती थी उनकी।उन दोनों को अधिक से अधिक सुविधा और सुख मिले, इसी लिये देर रात तक ओवरटाइम भी किया लेकिन कभी जताया नहीं। परिवार को हर सुख देने के लिये पूरी जिन्दगी मेहनत करते रहे। घर में सुविधा की हर वस्तु थी।
इसके बावजूद जब कभी ममता अपनी और वेदज्ञ की इच्छा के लिये कुछ कहती तो उनकी इच्छा तो पूरी कर देते लेकिन पहले गुस्से में चीखते चिल्लाते और बाद में उनकी मांग पूरी करते।
वह अक्सर अपने कार्यालय और दोस्तों के बीच कहा करते थे – ” पत्नी को हमेशा दबा कर रखना चाहिये, छूट देने से सिर पर चढ़कर तांडव करने लगती है। घर में हमेशा मर्द का वर्चस्व रहना चाहिये।”
किसी दोस्त को बच्चों के साथ बहुत लाड़ प्यार करते देखते तो उसे समझाने लगते – ” प्यार दिल से करना चाहिये लेकिन हमेशा शेर की नजर रखनी चाहिये उन पर वरना बच्चे बिगड़ जाते हैं। घर वालों के लिये सारे सुख साधन होने चाहिये लेकिन नियंत्रण अपना ही रखो। हम पैसे कमाते हैं तो हमें मालिक का सम्मान तो मिलना ही चाहिये। सबके अन्दर घर के मालिक का डर होना चाहिये।”
” यह गलत है। पत्नी और बच्चों से बड़ा हितैषी कोई नहीं होता है। उन्हें सुख सुविधा के साथ प्यार और सम्मान भी देना चाहिये। उनके अन्दर अपने वर्चस्व के लिये भय भर देना अनुचित होता है।”
पर्वतेश हॅस पड़ते – ” अनुचित नहीं, यही उचित है। भय बिना प्रीति नहीं होती है।”
” अपने अपने विचार हैं। हम लोग तो अपने परिवार को भय रहित प्यार और सम्मान देते हैं। घर का दमघोंटू और तनाव युक्त वातावरण के स्थान पर हमें खुशनुमा वातावरण अच्छा लगता है। मेरी मानो तो तुम भी घर में गुस्सा करना और चीखना चिल्लाना छोड़ दो। भाभी और वेदज्ञ तुम्हारे सामने कितना सहमे से रहते हैं।” उसके दोस्त अक्सर उसे समझाते।
वेदज्ञ धीरे धीरे बढा होता जा रहा था तो उसके मन में भी सभी बच्चों को देखकर हसरत जागती कि काश! उसके पापा भी ऐसे ही होते। अच्छे से अच्छे नम्बर आने पर भी पर्वतेश केवल इतना कह देते – ” और मेहनत करो।”
सरकारी छात्रवृत्ति पाकर जब वेदज्ञ मुम्बई आई० आई० टी० जाने लगा तो जहॉ ममता की ऑखों के ऑसू सूख नहीं रहे थे वहीं वेदज्ञ भी भीतर से बहुत घबरा रहा था। जीवन में पहली बार घर से दूर जा रहा था।
पर्वतेश ने एक बार भी न तो ममता को सांत्वना दी और न बेटे के सिर पर हाथ रखकर भरोसा दिलाया कि किसी भी परिस्थिति में वह उसके साथ हैं। बेटे की उपलब्धि पर भीतर ही भीतर गर्वित होते हुये भी चिल्लाकर अपना गुस्सा प्रकट कर रहे थे – ” मनहूसित फैला दी है तुम मॉ बेटे ने। बन्द करो यह नाटक।”
एयरपोर्ट पर जब पैरों पर झुका वेदज्ञ सिसक पड़ा, तब भी अपने अहंकार में उसे सीने से नहीं लगाया बल्कि गंभीर स्वर में इतना ही कहा – ” अच्छी तरह पढ़ाई करना, अब तुम वहॉ अकेले रहोगे तो वहॉ की परिस्थिति का सामना करके समस्याओं को खुद सुलझाना और सफल होकर लौटना।”
वेदज्ञ बिना सिर उठाये चुपचाप खड़ा रहा। वेदज्ञ फोन करता तो पर्वतेश उससे खुद बात नहीं करते लेकिन ममता से फोन स्पीकर पर रखने को कहते। यह बात वेदज्ञ भी जानता था इसलिये वह फोन पर भी खुलकर मॉ को अपनी समस्यायें और परेशानियां नहीं बता पाता और सामने पर्वतेश के होने के कारण ममता भी उससे मन की बात न तो कर पाती और न ही सुन पाती।
समय बीत रहा था। करीब सात महीने बीत गये। ममता को बराबर लगता कि उसका बेटा किसी बात को लेकर बहुत परेशान है। पूॅछने पर कह देता कि सब ठीक है लेकिन बेटे के चेहरे की बनावटी मुस्कुराहट उससे छुप नहीं पा रही थी।
आखिर उसने वेदज्ञ से झूठ कह दिया – वेद, पापा इस समय घर में नहीं हैं। तुम बताओ तुम क्यों परेशान हो? ऐसा क्या हो गया कि तुम्हारा चेहरे की सारी चमक गायब हो गई। बताओ बेटा, तुम्हें ऐसे देखकर मम्मा बहुत परेशान है?”
” मम्मा, आप सच कह रही हैं। पापा आपके आसपास नहीं हैं।”
” सच बेटा, कोई नहीं है। तुम बताओ कि क्या बात है? मन न लग रहा हो तो वापस आ जाओ। भाड़ में जाये सब।”
” वापस नहीं आ सकता। वापस आकर पापा का सामना करने से तो अच्छा है मैं आत्महत्या कर लूॅ।”
ममता बिलख पड़ी – ” ऐसा मत कह मेरे बच्चे। मुझे बताओ कि क्या हुआ है जो मेरा बहादुर बच्चा ऐसी निराशा की बात कर रहा है।”
पास बैठे पर्वतेश क्रोध से आग बबूला हो रहे थे। वह बड़ी मुश्किल से अपने गुस्से को रोक रहे थे।
वेदज्ञ ने बताया कि उसके कमरे में रहने वाले लड़के शराब के आदी हैं। हॉस्टल की तलाशी के समय उन लड़कों ने ये सब चीजें उसकी अलमारी में छुपा दीं। चूंकि वेदज्ञ को इस बात का पता नहीं था तो जब उसकी अलमारी से शराब की बोतल पाई गई तो वह खुद हतप्रभ रह गया। उसने बहुत कहा कि न तो यह उसका सामान उसका है और न ही उसे इसके बारे में कुछ पता है लेकिन किसी ने उसकी बात का विश्वास नहीं किया।
उसको संस्थान से निकालने की तैयारी हो रही थी लेकिन वार्डन ने प्रबंध कमेटी के समक्ष उसका पक्ष लेते हुये कह दिया – ” यह लड़का ऐसा नहीं है, जरूर यह किसी की शरारत है।”
आखिर वेदज्ञ और वार्डन के बहुत मिन्नत करने के बाद उसे गलती न होते हुये भी लिखित रूप से माफी मांगनी पड़ी और साथ ही यह भी लिख कर देना पड़ा कि यदि दुबारा ऐसा हुआ तो उसे संस्थान से निकाल दिया जाये। सजा के रूप में उसे एक महीने के लिये सस्पेंड कर दिया गया।
अभी वेदज्ञ और कुछ बताने जा ही रहा था कि पर्वतेश का क्रोध सीमा पार कर गया। उसने ममता के हाथ से फोन छीन लिया – यही दिन देखने के लिये तुम्हें भेजा था? मेरी इज्जत मिट्टी में मिला दी? लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे?”
वेदज्ञ पर्वतेश की आवाज सुनकर चौंक गया – ” पापा, मेरी बात सुनिये, मैंने कुछ नहीं किया था।”
” चुप रहो और आत्महत्या की धमकी किसे दे रहे हो? कल मरना हो तो आज मर जाओ, आज मरना हो अभी मर जाओ। तुम्हारे जैसे लडका मर ही जाये तो अच्छा है। अगर सचमुच असली बाप से पैदा हो तो अपना मुंह मत दिखाना मुझे। सचमुच मरकर दिखाओ।”
पर्वतेश और भी न जाने क्या क्या बड़बड़ाते रहे, काफी देर बाद उन्हें समझ में आया कि फोन कट गया है। फोन सोफे पर पटककर वह ममता की ओर घूमे और दहाड़े – ” बहुत छूट दी है तुमने। मेरा फोन काट दिया। अभी खबर लेता हूॅ। इसे क्या लगता है कि फोन काट दिया तो मैं चुप हो जाऊंगा। मैं पैसे भेजना बन्द कर दूंगा। सारी अकड़ निकल जायेगी।”
ममता ने गिड़गिड़ाते हुये कहा – ” उसे अब कुछ न कहिये। वह वैसे ही बहुत परेशान है।”
” तुम चुप रहो।” कहकर पर्वतेश वेदज्ञ को फोन मिलाने लगे लेकिन वेदज्ञ का फोन न उठा। वेदज्ञ के द्वारा फोन न उठाने के कारण पर्वतेश गुस्से में और भी अनाप शनाप बकते जा रहे थे लेकिन ममता का मन बेहद छटपटा रहा था। आखिर हारकर पर्वतेश ने फोन रख दिया।
ममता वहीं पर चुपचाप बैठी थी। तभी पर्वतेश के फोन पर एक अनजान नम्बर से फोन आया। पहले तो पर्वतेश ने फोन उठाया ही नहीं लेकिन जब तीसरी बार फिर फोन आया तो पर्वतेश ने फोन उठा लिया।
पर्वतेश के ” हलो ” बोलने से पहले उधर से कुछ ऐसा कहा गया कि पर्वतेश चीख पड़ा – ” क्या बकवास कर रहे हो? अभी तो मेरी बात हो रही थी उससे।”
ममता के दिल की धड़कनें बेकाबू हो गईं – ” क्या हुआ मेरे बच्चे को।”
पर्वतेश के तो जैसे होश ही उड़ गये। वह फोन पकड़े ही रह गये। ममता ने आगे बढ़कर स्पीकर चालू कर दिया। उधर से कोई कह रहा था – ” वेदज्ञ किसी से फोन पर बात कर रहा था फिर पता नहीं क्यों फोन रखकर दौड़ते हुये छत की ओर भागा और जब तक कोई कुछ समझ पाता वह नवीं मंजिल से नीचे कूद गया। आखिरी फोन आपका था इसलिये सबसे पहले आपको फोन कर रहा हू्ॅ।”
तभी फोन से आवाज आनी बंद हो गई। पर्वतेश ने देखा कि सोफे पर ममता बेहोश पड़ी है।
अस्पताल लेकर भागे तो डॉक्टर ने बताया कि ममता को सीवियर हार्ट अटैक आया है। पर्वतेश को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह ममता के पास रहे या बेटे का शव लेने जाये। सबसे बड़ी बात खुद से नजरें कैसे मिलाये। उन्हें क्या पता था कि जिस गुस्से को वह अपने वर्चस्व का हथियार समझते हैं वह गुस्सा एक दिन बरबाद कर देगा। उसके क्रोध में निकले शब्दों ने उसके बेटे और पत्नी को उससे छीन लिया और जिन्दगी में पश्चाताप का हाहाकार भर दिया।
बीना शुक्ला अवस्थी, कानपुर
#गुस्सा एक दिन सब बरबाद कर देगा।