“करवाचौथ का तोहफा” – संगीता अग्रवाल

करवाचौथ बिल्कुल नजदीक आ गया था। आयशा कितने दिनों से शॉपिंग कर रही थी उस शुभ दिन के लिए। उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक थी—जैसे त्योहार उसके लिए सिर्फ परंपरा नहीं, एक खास मौका हो, जिसमें वह खुद को सबसे अलग, सबसे खूबसूरत, सबसे खास महसूस करना चाहती हो। वह एक दुकान से … Read more

मंगलसूत्र –

“बेटा तेरा गला नंगा क्यों हैं?”संजना की माँ ने रसोई से निकलते ही जैसे ही उसकी ओर देखा, उनके चेहरे पर चिंता उतर आई। सुबह का वक्त था। किचन में दूध उबल रहा था, चूल्हे की आँच पर पतीला हौले-हौले थिरक रहा था, और घर में रोज़ की तरह हलचल थी। पर माँ की नजर … Read more

हां, मैं अपनी बेटी के साथ रहती हूं – अर्चना खंडेलवाल

 मैं और मेरी दुनिया, हम तीन लोग थे। जीवन से सारी खुशियां हमने जैसे चुरा ली थीं। एक छोटा-सा घर, थोड़ी-सी कमाई, और ढेर सारा अपनापन—यही हमारी पूरी दुनिया थी। हम साथ रहते, साथ हँसते, साथ खाते-पीते, और यूँ ही जिंदगी जीते चले जा रहे थे। कभी-कभी तो लगता था कि बस यही तो जीवन … Read more

“आज तक कौन सा सुख पाया मेरी बेटी ने…”

“आज तक कौन सा सुख पाया मेरी बेटी ने… अपने बाबुल के घर में… जो उसे यहां की याद आएगी… क्यों आएगी…!” यह कहते हुए रविंद्र जी ने एक लंबी, ठंडी आह भरी और धीरे-धीरे बिस्तर पर लेट गए। उनकी आंखें छत पर टिकी थीं, लेकिन मन अतीत की गलियों में भटक रहा था। मन … Read more

वो देहरी… – कविता झा ‘अविका’

मांँ के पास आए हुए रिती को एक महीना पूरा होने को था और उसकी वापसी का समय भी नजदीक था। अगले ही दिन की ट्रेन थी। स्कूल की छुट्टियांँ खत्म हो गई थी तो अब वापस जाना जरूरी था वरना प्राइवेट स्कूल वाले टीचर को छुट्टी कहांँ देते हैं। रिती अपने पिता के समझाने … Read more

बड़े को सदा बड़प्पन ही दिखाना चाहिए – भगवती सक्सेना गौड़

आज हरिद्वार से घूमकर एक माह बाद सिद्धेश्वर जी अपनी पत्नी के साथ घर आये। ट्रेन/बस की लंबी यात्रा के बाद भी उनके चेहरे पर एक अजीब-सी ताजगी थी—हरिद्वार की हवा, गंगा के किनारे की शांति, मंदिरों की घंटियों की आवाज़ और आरती की लौ… मानो मन के किसी कोने में वर्षों से जमी थकान … Read more

माँ से जुड़ाव – अंजु गुप्ता ‘अक्षरा’

विनय और तनवी एक दूसरे के पूरक थे। घर में अगर किसी बात पर अंतिम मुहर लगती तो वह विनय की होती—और तनवी वह मुहर बिना शिकायत, बिना बहस, बिना “क्यों” पूछे स्वीकार कर लेती। क्या मजाल कि बिन अपने पापा की मर्जी के खिलाफ तनवी कोई तिनका भी उठा ले। वह कभी अपनी पसंद … Read more

रिश्तों के रंग – खुशी

हमारे मोहल्ले में एक बाबा आता था सबके घर नहीं पर गिने चुने घरों में वो भिक्षा लेता था।उनमें एक हमारा घर भी था।मेरी दादी मेरी मां कमला को बहुत गुस्सा करती थी कि क्यों देती हैं इस बूढ़े को रोज खाना बाकी लोग तो फिर भी बचा खुचा देते थे मां जैसे ही आवाज … Read more

रिश्तों के भी रंग -निधि गुप्ता

मांसी को बचपन से ही रंगों से बहुत प्यार था। उसके कमरे की दीवारें तरह-तरह की पेंटिंग से भरी रहती थीं। कहीं नीले आसमान में उड़ते पक्षी, कहीं हरे खेत, तो कहीं लाल-पीले फूल। मांसी कहती थी कि रंग सिर्फ कागज़ पर नहीं होते, रिश्तों में भी होते हैं। मांसी की मां अक्सर मुस्कुराकर कहती, … Read more

ममता का रंग’ – प्रतिभा भारद्वाज ‘प्रभा’

“मेरी मां बुआ के यहां शादी में नहीं जाएंगी….”वसुधा के कुछ कहने से पहले वसुधा की बेटी सौम्या ने जैसे ही कहा तो सब अवाक रह गए। “बेटा….” “मां प्लीज…, इस बार आप कुछ भी कहने से मुझे मत रोको….वैसे भी आज तक आप मुझे ही चुप करवाती आई हो और किसी से आप कुछ … Read more

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