रिश्तों की जंजीर – मंजू ओमर

रिया के घर आज एक अलग ही रौनक थी। सुबह से ही राधा जी बार-बार रसोई में जाकर चाय के कप सजातीं, कभी पर्दे ठीक करतीं, कभी रिया की साड़ी पर नजर डालकर कहतीं—“बेटा, पल्लू ठीक कर ले… बस थोड़ा-सा।” महेश जी भी आज असामान्य रूप से शांत थे, मगर उनके चेहरे पर जो उम्मीद … Read more

“ज़लील”

रसोई घर में रोटी बेलती सारिका की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। आटे में नमक जितना घुल जाता है, उतना ही उसका दर्द भी अब उसके भीतर घुल चुका था। बाहर ड्राइंग रूम में हँसी-ठिठोली का शोर था, और भीतर रसोई में उसके सिसकियों का सन्नाटा। उसे लग रहा था जैसे वह अकेली … Read more

आस्तीन के साँप – सरोज माहेश्वरी

दिवाकर का घर शहर की एक शांत कॉलोनी में था। बाहर से देखने पर वह बिल्कुल सामान्य मध्यमवर्गीय घर लगता—दरवाज़े पर तुलसी का गमला, आँगन में छोटी-सी रंगोली, और भीतर दीवारों पर भगवान की तस्वीरें। घर में अनुशासन भी था और संस्कार भी। सास-ससुर उम्र के उस पड़ाव पर थे जहाँ घर की शांति ही … Read more

झूठा शक रिश्तों की जड़ें हिला देता है

दिनेश जी के ऑफिस से लौटने का समय था। घड़ी की सुइयाँ शाम के करीब पहुँच रही थीं, पर जानकी जी के घर में सुबह से ही जैसे तूफ़ान उठा हुआ था। रसोई से लेकर बच्चों के कमरे तक, हर जगह एक अजीब-सी बेचैनी फैली हुई थी। घर के वातावरण में वह गर्माहट नहीं थी … Read more

 “करवाचौथ का तोहफा” – संगीता अग्रवाल

करवाचौथ बिल्कुल नजदीक आ गया था। आयशा कितने दिनों से शॉपिंग कर रही थी उस शुभ दिन के लिए। उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक थी—जैसे त्योहार उसके लिए सिर्फ परंपरा नहीं, एक खास मौका हो, जिसमें वह खुद को सबसे अलग, सबसे खूबसूरत, सबसे खास महसूस करना चाहती हो। वह एक दुकान से … Read more

मंगलसूत्र –

“बेटा तेरा गला नंगा क्यों हैं?”संजना की माँ ने रसोई से निकलते ही जैसे ही उसकी ओर देखा, उनके चेहरे पर चिंता उतर आई। सुबह का वक्त था। किचन में दूध उबल रहा था, चूल्हे की आँच पर पतीला हौले-हौले थिरक रहा था, और घर में रोज़ की तरह हलचल थी। पर माँ की नजर … Read more

हां, मैं अपनी बेटी के साथ रहती हूं – अर्चना खंडेलवाल

 मैं और मेरी दुनिया, हम तीन लोग थे। जीवन से सारी खुशियां हमने जैसे चुरा ली थीं। एक छोटा-सा घर, थोड़ी-सी कमाई, और ढेर सारा अपनापन—यही हमारी पूरी दुनिया थी। हम साथ रहते, साथ हँसते, साथ खाते-पीते, और यूँ ही जिंदगी जीते चले जा रहे थे। कभी-कभी तो लगता था कि बस यही तो जीवन … Read more

“आज तक कौन सा सुख पाया मेरी बेटी ने…”

“आज तक कौन सा सुख पाया मेरी बेटी ने… अपने बाबुल के घर में… जो उसे यहां की याद आएगी… क्यों आएगी…!” यह कहते हुए रविंद्र जी ने एक लंबी, ठंडी आह भरी और धीरे-धीरे बिस्तर पर लेट गए। उनकी आंखें छत पर टिकी थीं, लेकिन मन अतीत की गलियों में भटक रहा था। मन … Read more

वो देहरी… – कविता झा ‘अविका’

मांँ के पास आए हुए रिती को एक महीना पूरा होने को था और उसकी वापसी का समय भी नजदीक था। अगले ही दिन की ट्रेन थी। स्कूल की छुट्टियांँ खत्म हो गई थी तो अब वापस जाना जरूरी था वरना प्राइवेट स्कूल वाले टीचर को छुट्टी कहांँ देते हैं। रिती अपने पिता के समझाने … Read more

बड़े को सदा बड़प्पन ही दिखाना चाहिए – भगवती सक्सेना गौड़

आज हरिद्वार से घूमकर एक माह बाद सिद्धेश्वर जी अपनी पत्नी के साथ घर आये। ट्रेन/बस की लंबी यात्रा के बाद भी उनके चेहरे पर एक अजीब-सी ताजगी थी—हरिद्वार की हवा, गंगा के किनारे की शांति, मंदिरों की घंटियों की आवाज़ और आरती की लौ… मानो मन के किसी कोने में वर्षों से जमी थकान … Read more

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