दिल ढूंडता है – रवीन्द्र कान्त त्यागी
“नाश्ता तैयार हो गया क्या नीतू? जरा जल्दी निकलना है।” बाथरूम से नहाकर निकलते हुए बेताब से मधुर ने कहा। “अरे गीता, नाश्ता तैयार हो गया क्या। साहब को जल्दी निकलना है।” नीतू ने आवाज लगाई। “बस मेमसाब, आलू उबलने ही वाले हैं।” “ओ माय गौड़। अभी देर लगेगी। मुझे निकलना पड़ेगा नीतू। बिल्डिंग में … Read more