डांट में छिपे अथाह प्रेम – संगीता अग्रवाल

“अब तूने मुझे अपने हाथ से खिलाया है, तो थोड़ा मैं भी तुझे खिला दूँ। सुबह से तूने भी तो कुछ ढंग का नहीं खाया होगा मेरी इस ज़िद के चक्कर में,” शांति देवी ने कहते हुए एक निवाला सुमेधा के मुँह में डाल दिया। अयान, जो दरवाज़े के पीछे खड़ा सब कुछ सुन और … Read more

 काश… मेरा अपना कोई घर होता

विकास भी हमेशा अपने माता-पिता का ही पक्ष लेता। धीरे-धीरे बच्चों के मन में भी यह बात बैठ गई कि घर में असली सत्ता दादा-दादी और पापा की है, माँ तो बस घर का काम करने के लिए है। जैसे-जैसे शशांक और नव्या बड़े हुए, उन्होंने भी अंजलि की बातों को अनदेखा करना शुरू कर … Read more

शादी के बाद रोमांस

रोहन के लिए मीरा  का उस घर में होना एक अजीब सा मीठा अहसास था। वह रोज़ सुबह उसे चाय बनाते देखता, आंगन में तुलसी को जल चढ़ाते देखता और शाम को अपनी किताबों में उलझे हुए देखता। मीरा  की हंसी से जैसे पूरा घर गूंज उठता था। रोहन दिल ही दिल में मीरा  को … Read more

गर्व भरी नज़र से

मेरी एक बेहद करीबी दोस्त हुआ करती थी, नाम था अंजलि। अंजलि का परिवार शहर के नामी और रसूखदार लोगों में गिना जाता था। उसके परिवार को लोग ‘डॉक्टर्स फैमिली’ कहते थे। उसके पिता डॉ. माथुर शहर के सबसे बड़े न्यूरोसर्जन थे, माँ डॉ. रश्मि एक जानी-मानी गायनेकोलॉजिस्ट थीं और अंजलि का बड़ा भाई, विक्रम, … Read more

मातृत्व

“चुप कर पागल लड़के! कहाँ जाने की बात कर रहा है रात के इस पहर?” उन्होंने बैग को पलंग के नीचे धकेलते हुए डांटा, लेकिन इस डांट में वो पुराना वाला स्नेह था। “क्या समझता है तू अपनी माँ को? मेरी कोख से जन्मा है तू, क्या मैं तेरी तकलीफ नहीं समझूंगी? ठीक है… नहीं … Read more

दिखावा – संगीता अग्रवाल

लोगों की आँखों में आँसू आ गए थे। एक दोस्त गुस्से में बोल पड़ा, “लानत है ऐसे बेटे पर! ऐसे इंसान को तो सरेआम सजा मिलनी चाहिए। कौन था वो नरपिशाच?” माधव ने एक गहरी साँस ली। उसकी नज़रें सीधे सुशांत पर जाकर टिक गईं। सुशांत, जो अब तक बड़े आराम से खड़ा था, अचानक … Read more

मनहूस

“अरे कोई है? जरा इस मनहूस को मेरी आँखों के सामने से हटाओ! मैंने तो सोचा था कि इस बार घर में कुल का दीपक जलेगा, लेकिन मेरी किस्मत ही खोट निकली। फिर से पत्थर का जन्म हो गया।” शांति देवी ने अपने कानों पर हाथ रखते हुए जैसे ही ये शब्द कहे, पूरे कमरे … Read more

शादी का डर

अंशुमन अब पूरी तरह से झुंझला चुका था। उसे लग रहा था कि उसकी माँ उसकी भावनाओं और उसके डर को समझने के बजाय सिर्फ समाज की रीतियों को महत्व दे रही हैं। उसने चिढ़कर कहा, “माँ, आप नहीं समझेंगी। मुझे ऐसे किसी विश्वास की ज़रूरत नहीं है जिसका टूटना मेरी और आपकी बर्बादी का … Read more

परवरिश

अभिनव ने पिता के आँसू पोंछते हुए कहा, “पिताजी, परेशानी तो तब होती है जब नीयत में खोट हो। आपने हमें जो संस्कार दिए हैं, जो ईमानदारी और बड़ों का सम्मान करना सिखाया है, क्या वो बस किताबी बातें थीं? आपने अपनी पूरी ज़िंदगी हमारी पढ़ाई और भविष्य के लिए कुर्बान कर दी, अब जब … Read more

 ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल

निहारिका को देखते ही वह अपनी कुर्सी से खड़ा हुआ और एक सौम्य मुस्कान के साथ बोला, “हेलो निहारिका, मैं शशांक। आपसे मिलकर अच्छा लगा।” निहारिका ने हाथ मिलाने की ज़हमत तक नहीं उठाई। वह कुर्सी खींचकर बैठी और अपने महंगे गॉगल्स टेबल पर पटकते हुए बोली, “देखिए शशांक, मैं यहाँ सिर्फ अपनी माँ की … Read more

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