आश्रिता – शुभ्रा बैनर्जी 

“देखिए ना,हमारे ऊपर तो इतनी बड़ी जिम्मेदारी है,कहीं भी आना-जाना नहीं कर सकते हम।आप लोगों की तरह मैं स्वतंत्र तो हूं नहीं।मंहगाई है कि बढ़ती जा रही है,और खर्च है कि कम होते ही नहीं।बुढ़ापे में बीमारी भी बिन बुलाए मेहमान की तरह आ जाती है।मैं तो आप लोगों के साथ ट्रिप पर नहीं जा … Read more

जिंदगी की परीक्षा – अंजना ठाकुर

नेहा अपनी गृहस्थी मैं बहुत खुश थी ससुराल मै सब उसका बहुत ध्यान रखते और किसी चीज की कोई कमी नहीं थी नेहा का पति राकेश एक बड़ी कंपनी मैं मैनेजर था नेहा भी शादी के पहले नौकरी करती थी पर शादी के बाद उसका खुद का मन नहीं हुआ वो अपनी जिंदगी सुकून से … Read more

मैं असहाय नहीं हूं.. – आराधना श्रीवास्तव

चटाक की आवाज के साथ कान सुन्न हो गए, रवीना अपलक सिद्धार्थ को देखती रह गई थोड़ी देर तक उनकी उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था सिद्धार्थ ने आखिर तमाचा क्यों मारा।  वह तो सिद्धार्थ के इशारे की कठपुतली है जब चाहा जैसा चाहा वैसा घुमाया आज तक केवल उसकी जरूरत के बारे … Read more

दर्शन, माँ  वैष्णों देवी – एम. पी. सिंह 

कहते है कि जब तक बुलावा नहीं आता, माता के दर्शन नहीं होते. मुझे इस पर पूरा विश्वास नहीं था, ऐसा नहीं कि मैं नास्तिक हूँ, पर भक्त भी नहीं था, बस सब भगवान को मानता हूँ. फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि मुझे विश्वास हो गया कि बुलावा आता है. मैं विस्तार से … Read more

इंसानियत – बीना शुक्ला अवस्थी

अक्सर कहा जाता है कि दुनिया बहुत खराब है, हर कदम पर धोखा देने वाले मिलते हैं। इसलिये किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिये लेकिन इंसानियत अब भी जिन्दा है और जब हमें कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाता है तो हम मानने पर विवश हो जाते हैं कि वह व्यक्ति हमारे लिये भगवान बनकर आया … Read more

फूल चोर – संजय मृदुल

रानू जी कॉलोनी की सबसे पुराने रहवासियों में से थी। बहुत ही अकडू स्वभाव, नकचढ़ी और घमंडी। बड़ा सा बंगला था उनका, उनके साहब, वो अपने पति को इसी नाम से संबोधित करती थी, रिटायर्ड सरकारी अधिकारी थे। रानू जी की रोज़ सुबह मुंह अंधेरे उठ जाती और कॉलोनी का चार पांच चक्कर घूमतीं। सैर … Read more

अपनो से गैर भले – दीपा माथुर

पी..हु, पी …. हु  आवाज सुनते ही पीहू दादी के पास आ गई । दादी जोर जोर से श्वास ले रही थी। डॉक्टर साहब डॉक्टर साहब प्लीज़ देखिए ना दादी को क्या हुआ? पीहू ने जोर जोर से आवाजें लगाई। एक ७५ ८० साल की बुजुर्ग महिला अस्पताल के जनरल वार्ड में प्लग पर लेटी … Read more

असहाय नहीं हूं मैं – सीमा सिंघी 

मिनी ने जैसे ही स्कूल का बस्ता उठाया । मिनी की रमिया ताई  बोल उठी। मिनी अब तुम्हें स्कूल जाने की क्या जरूरत है। सातवीं तक पढ़ लिया,नाम और पत्र लिखना आ गया । अब बहुत हुआ। वैसे भी तेरे ताऊ जी घर के इतने सदस्यों के बोझ अकेले कैसे सहेंगे।  अपनी ताई जी की … Read more

असहाय नहीं हूं, मैं! – लक्ष्मी त्यागी

रोहिणी तो जैसे टूट गई थी, जब उसके पति ने उसकी बाहों में अपना दम तोड़ा। अब वह क्या करेगी ,किसके भरोसे जीएगी ? एक अकेली औरत जात, जान को सोे झंझट नजर आ रहे थे। घर संभालेगी या फिर खेती-बाड़ी देखेगी। अभी दीनदयाल की ‘दाह संस्कार ‘की आग ठंडी भी नहीं हुई थी। रिश्तेदारों … Read more

अपनों से गैर भले! – डाॅ संजु झा

हताश-निराश नमिता सोच रही है कि  कभी-कभी मनुष्य  की ज़िन्दगी में ऐसे मोड़ उपस्थित हो जाते हैं कि अपनों से गैर ही भले लगने लगते हैं। मनुष्य अपनों की जहरीली चाल को समझ नहीं पाता है,उन पर भरोसा कर अपना सर्वस्व लुटा बैठता है।बाद में पछताने के सिवा उसके हाथ में कुछ भी नहीं आता … Read more

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