अपने लिए जीना भी जरूरी है – मीता राकेश 

  रात के ग्यारह बज चुके थे। रसोई की सिंक में बर्तनों का एक पहाड़ खड़ा था और डाइनिंग टेबल पर बिखरे हुए जूठे प्लेट इस बात की गवाही दे रहे थे कि आज घर में दावत थी। वंदना ने एक गहरी सांस ली और अपनी कमर पर हाथ रखकर उसे सीधा करने की कोशिश की। … Read more

खाने का असली स्वाद तो बहू के हाथों में होता है, – डॉ अनुपमा श्रीवास्तव 

रात के सन्नाटे में अस्पताल की मशीनों की बीप-बीप आवाज़ रोहन के कानों में हथौड़े की तरह बज रही थी। आईसीयू के बाहर बेंच पर बैठा वह अपने हाथों में अपना सिर थामे हुए था। उसकी आँखों के सामने बार-बार वही दृश्य घूम रहा था—रसोई के फर्श पर बेसुध पड़ी सुमन और उसके चारों ओर … Read more

पछतावे की राख – डॉ पारुल अग्रवाल

पड़ोसियों और रिश्तेदारों की बातें सुनकर कावेरी देवी का गुस्सा थोड़ा शांत जरूर हुआ था, लेकिन उनके चेहरे पर अभी भी तमतमाहट साफ़ झलक रही थी। वे अपने बड़े बेटे, विक्रम, की बातों पर आँख मूंदकर विश्वास करती थीं, और आज विक्रम ने जो मंज़र पेश किया था, उसने कावेरी देवी के दिल में छोटे … Read more

यह दुनिया आपकी ‘रूल बुक’ से नहीं चलती – अर्चना खंडेलवाल 

सफेद रंग की ऑडी कार गैराज में आकर रुकी। अमित ने गाड़ी से उतरते ही जोर से दरवाजा बंद किया। उसके चेहरे पर तनाव साफ़ दिख रहा था। वह तेज कदमों से घर के अंदर दाखिल हुआ। ड्राइंग रूम में उसके पिता, रघुवीर जी, अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठे एक डायरी में कुछ हिसाब … Read more

“नहीं चाहिए भीख के पैसे!” – बालेश्वर गुप्ता 

राघव एक प्रतिभाशाली मूर्तिकार था। उसकी उंगलियों में वो जादू था जो गीली मिट्टी में भी प्राण फूँक देता था। लेकिन कला की कद्र और पेट की भूख के बीच का फासला अक्सर बहुत लंबा होता है। उसके पिता, दीनानाथ जी, पुराने ज़माने के कारीगर थे जिन्होंने पूरी ज़िंदगी अभावों में गुजारी थी, लेकिन अपनी … Read more

“मेरी कोई इज्जत नहीं है क्या??” – अमिता कुचया

सफेद रंग की ऑडी कार गैराज में आकर रुकी। अमित ने गाड़ी से उतरते ही जोर से दरवाजा बंद किया। उसके चेहरे पर तनाव साफ़ दिख रहा था। वह तेज कदमों से घर के अंदर दाखिल हुआ। ड्राइंग रूम में उसके पिता, रघुवीर जी, अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठे एक डायरी में कुछ हिसाब … Read more

पारस पत्थर – गरिमा चौधरी

विनय की आवाज़ में खीझ साफ़ झलक रही थी। उसने हाथ में पकड़ी हुई कलाई घड़ी को झुंझलाहट के साथ टेबल पर पटका। “सृष्टि! अब हद हो रही है। पिछले बीस मिनट से मैं मोज़े ढूंढ रहा हूँ और तुम हो कि उस ‘महारथी’ को दलिया खिलाने में व्यस्त हो। मेरी मीटिंग है आज, तुम्हें … Read more

एक सखी, जो देवरानी के रूप में आई थी – संगीता अग्रवाल 

कमरे में बिखरे हुए कपड़ों के ढेर के बीच मीरा हताश होकर बेड के किनारे बैठ गई। माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं और आँखों में एक अजीब सी बेचैनी थी। अलमारी के सारे रैक खाली हो चुके थे, साड़ियाँ, सूट, शॉल—सब कुछ बेड पर एक पहाड़ की तरह जमा था, लेकिन वह … Read more

बड़ी बहन – निभा राजीव 

गुलाबी रंग की बनारसी साड़ी में लिपटी नीलम, घर के आँगन से लेकर रसोई तक किसी फिरकी की तरह घूम रही थी। पिछले तीन दिनों से घर में शादी की शहनाइयाँ गूँज रही थीं, और नीलम ने शायद कुल मिलाकर चार घंटे की नींद भी ठीक से नहीं ली होगी। फिर भी, उसके चेहरे पर … Read more

खोखले घर – रमा शुक्ला

“अरे ओ महारानी! अभी तक बिस्तर में ही है? सूरज सिर पर आ गया है और इसे देखो, कुंभकरण की औलाद अभी तक सो रही है।” बगल के कमरे से मामीजी की तीखी आवाज़ ने मीरा की नींद को एक झटके में तोड़ दिया। मीरा हड़बड़ा कर उठी। उसने जल्दी से अपनी पुरानी शॉल लपेटी … Read more

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