फर्ज़ और फ़रेब के बीच – नंदिनी शर्मा

रसोई में बर्तनों के पटकने की आवाज़ ने सुबह की शांति को भंग कर दिया था। “गजब है! आज घर में सत्संग है, पंडित जी आने वाले हैं, और बहु महारानी कुर्सी पर बैठकर पूड़ियाँ बेल रही हैं? हे भगवान! अब तो रसोई भी अपवित्र हो गई। हमारे ज़माने में तो पैर टूटने पर भी … Read more

वो दूसरा कमरा – रमा शुक्ला 

“जब एक बहू ने अपनी सास के लिए वृद्धाश्रम का फॉर्म भरा, तो उसे नहीं पता था कि उसी फॉर्म पर अगला नाम उसकी अपनी माँ का लिखा जाने वाला है। एक ऐसा सच जो आपको झकझोर कर रख देगा। शाम की चाय की चुस्की लेते हुए वंदना ने अपने पति, समीर की ओर देखा। … Read more

दास बाबु की डायरी – प्रेषक प्रभा पारीक

पुरानी दिल्ली का चाँदनी चौक में पहाड़गंज का वह भीड़-भाड़ भरा पुराना ईलाका।  पता नहीं क्यों वहाँ एक ही तरह की रौनक ओर जिन्दा दिली सदा पसरी रहती। जो किसी की भी समझ के परे था। गरीब होते हुये भी यहाँ कोई उदास नहीं दिखता । चहकते से नजर आते चैहरेां के लोग,दास बाबु का … Read more

अपराध बोध – गरिमा चौधरी 

“देखो नेहा, घड़ी देखो। शाम के आठ बजने वाले हैं और तुम्हारी भाभी का अभी तक कोई अता-पता नहीं है। पूरा दिन निकल जाता है, न घर की सुध है, न सास की। मैं तो कहती हूँ, ऐसी नौकरी किस काम की जो घर के सुख-चैन को ही निगल जाए?” सावित्री देवी ने सोफे पर … Read more

अपराध बोध – संजय सिंह

सुजान पंडित और सूजान पंडिताइन अपने गांव में जानी-मानी शख्सियत  थे ।वक्त बीतने के साथ-साथ उनके घर पर एक पुत्र ने जन्म लिया। बड़े प्यार से उसका नाम बृजेश  रखा । सुजान पंडित और सूजान पंडिताइन ने बड़े प्यार के साथ अपने बेटे बृजेश का लालन-पालन किया। माता-पिता के अधिक लाड – प्यार के कारण … Read more

समझौता अब नहीं – करुणा मलिक 

रसोई की खिड़की से आती धूप की तीखी किरणें सुधा के चेहरे पर पसीने की बूंदों को चमका रही थीं। गैस पर चढ़ा बड़ा सा पतीला खदबदा रहा था, जिसमें पचास लोगों के लिए कढ़ी पक रही थी। सुधा ने पल्लू से माथा पोंछा और एक गहरी साँस ली। पिछले पाँच सालों से यही उसकी … Read more

मेरे पास समय नहीं है – करुणा मलिक 

शाम की धुंधली रोशनी खिड़की से छनकर ड्राइंग रूम में आ रही थी। 65 वर्षीय रमाकांत अपनी आराम कुर्सी पर बैठे दीवार घड़ी की टिक-टिक सुन रहे थे। टिक… टिक… टिक…। यह आवाज़ उन्हें हमेशा याद दिलाती थी कि समय कैसे रेत की तरह उनकी मुट्ठी से फिसलता जा रहा है। रमाकांत एक रिटायर्ड बैंक … Read more

वसीयत – करुणा मलिक 

काजल के हाथ से चाय का कप लगभग गिरते-गिरते बचा। बाहर आँगन में हो रहे शोर-शराबे ने उसके कानों में जैसे सीसा घोल दिया था। “तूने क्या सोचा था कि हमेशा ऐसे ही चलता रहेगा? ये घर मेरा है! और अब से वही होगा जो मैं कहूँगा,” आलोक, उसका जेठ, चिल्ला रहा था। काजल के … Read more

मातृत्व – करुणा मलिक 

नीलम अपनी बालकनी में खड़ी थी, हाथ में चाय का कप था जो अब ठंडा हो चुका था। उसकी नज़रें दूर कहीं शून्य में टिकी थीं, लेकिन मन स्मृतियों के बवंडर में फंसा हुआ था। वह सोच रही थी कि कैसे एक ‘सही’ फैसला लेने के चक्कर में जिंदगी उसे उस मोड़ पर ले आई … Read more

जोरू का गुलाम – गरिमा चौधरी 

“खट!” स्टील की थाली को मेज पर पटकने की तीखी आवाज़ से पूरे घर का सन्नाटा टूट गया। रसोई में खड़ी सुधा का दिल एक पल के लिए सहम गया। वह अपने सूजे हुए पैरों को घसीटते हुए डाइनिंग हॉल में आई। सामने उसकी सास, विमला देवी, और उनकी बड़ी ननद, सरोज बुआ, मुंह फुलाकर … Read more

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