मॉं मेरे हिस्से आयेगी। – अर्चना खण्डेलवाल

अरे! विभा जीजी आप आ गई , कमल खुशी से बोलते हुए उनके पैर छूने लगा और उनका सामान उठाकर अंदर ले गया, विभा ने मुंह बनाया, अभी तक कमल में अक्ल नहीं आई, ये नहीं शादी का घर है, जरा ढंग के कपड़े पहन लेता, गंवार का गंवार ही रहेगा, पढ़ लिख लेता तो … Read more

अपराधबोध – बबीता झा

आज जब लिखने बैठी, तो अपने साथ हुई घटना याद आ गई, और अपनी कहानी को उसी सांचे में ले गई। मेरी ननद, जिन्हें मैं अपनी मां के बाद उन्हीं को स्थान देती थी, अगर मेरे से कोई गलती होती तो वही समझा देती थी। और मुझे ही क्यों, परिवार के हर सदस्य को जोड़कर … Read more

अपराध – खुशी

नलिनी एक स्कूल में अध्यापिका थी।सुंदर सलोनी जो देखे वो उसे पलट कर जरूर देखता।इतनी सुंदर होने पर भी 30 वर्ष तक उसका विवाह नहीं हुआ।सभी पूछते पर वो क्या उतर देती घर में मां पिताजी थे एक बड़ा भाई विवेक था उसकी पत्नी आनंदी थी पर भाई भाभी अपनी ही दुनिया में मस्त थे … Read more

*अपराध बोध…* – तोषिका

इस *अपराध बोध* को अपने मन से निकाल दो तुम मां, तुम्हारी कोई गलती नहीं थी, ऋषि अपनी मां शांता देवी को सांत्वना देते हुए बोला। लेकिन बेटा… बेटा अगर…अगर मैने वो फैसला ना लिया होता तो आज यह नहीं होता। *2 साल बाद* ऋषि और उसकी मां अब दूसरी जगह शिफ्ट हो गए थे, … Read more

वेलेंटाईन डे – विमला गुगलानी

   ज्यों ज्यों चौदह फरवरी का दिन पास आ रहा था महक मन ही मन और भी महकती जा रही थी। सादा लिबास पहनने वाली को अब कुछ सजना संवरना भी आ गया था। कालिज की पढ़ाई का आखरी साल था।पांच साल पहले गांव से पढ़ने के लिए शहर आना जैसे सपने जैसा था।          अच्छे खाते … Read more

मैं बोझ बनकर नहीं जीना चाहता। – सीमा ऋषभ

रात के सन्नाटे में सूटकेस की चेन बंद करने की आवाज़ किसी धमाके जैसी गूंजी। 72 वर्षीय रमाकांत बाबू ने एक नज़र उस कमरे पर डाली जहाँ उन्होंने अपनी ज़िंदगी के पिछले चालीस साल गुज़ारे थे। दीवारों पर लगीं पुरानी तस्वीरें, अलमारी में सजी उनकी किताबें और कोने में रखी उनकी पत्नी की तस्वीर, जिन … Read more

आख़िर उसके सब्र का बांध टूट ही गया – डॉ अनुपमा श्रीवास्तव 

सुबह के छह बजते ही ‘शांति-निवास’ में घंटी की नहीं, बल्कि सावित्री देवी के नाम की गूंज शुरू हो जाती थी। सत्तर वर्षीय दीनदयाल जी की चाय से लेकर, पोते चिंटू के स्कूल के मोज़े तक, सब कुछ सावित्री के हाथों से होकर ही गुजरता था। वह इस घर की वो नींव थीं जो ज़मीन … Read more

सोने का दिल – सावित्री गोंड

शादी की शहनाइयों का शोर अभी थमा भी नहीं था कि सुमेधा के कानों में एक अलग ही सुर घोला जाने लगा था। वह सुर था उसकी ममीरी सास, यानी उसके पति आलोक की बुआ, सरला जी का। सुमेधा जब ब्याह कर ‘शांति-निवास’ में आई, तो उसे लगा था कि संयुक्त परिवार में रहना थोड़ा … Read more

कांच के महल – मंजू घोष

मुंबई के सबसे पॉश इलाके ‘स्काईलाइन टावर्स’ की 45वीं मंजिल पर बने पेंटहाउस की बालकनी में खड़ा होकर शेखर शहर की टिमटिमाती बत्तियों को देख रहा था। उसके हाथ में स्कॉच का गिलास था और चेहरे पर एक विजयी मुस्कान। आज उसकी कंपनी ‘शेखर इंफ्राटेक’ ने शहर का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट हासिल किया था। वह … Read more

काजल की कोठरी – मुकेश पटेल

“अरे ओ कुल-नाशक! डूब मर किसी चुल्लू भर पानी में। पूरे खानदान की नाक कटाकर रख दी है तूने। मेरे तो भाग फूट गए जो तुझ जैसी औलाद को जन्म दिया। लोग सही कहते थे, सांप को कितना भी दूध पिला लो, वो डसता ही है।” सावित्री देवी का गला चिल्लाते-चिल्लाते बैठ गया था, लेकिन … Read more

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