कागज़ के फूल – करुणा मलिक

“रिया बेटा, तूने लाखों खर्च किए, तेरा बहुत-बहुत आशीर्वाद। पर तू शायद भूल गई कि इस ‘पुराने तंग घर’ की हर ईंट में मेरी और तेरी माँ की जवानी, तुम्हारा बचपन और हमारे सुख-दुःख की गूंज बसी है। पेंटहाउस में एसी की ठंडक तो होगी, पर इन दीवारों जैसी गर्माहट नहीं होगी। तूने वो दिया … Read more

 माँ का ‘किरायेनामा – सीमा गुप्ता 

” सुमित्रा जी ने वकील साहब की तरफ देखा। वकील साहब ने गला साफ किया और बोले, “मिस्टर विकास, यह एग्रीमेंट आपके और आपकी पत्नी के नाम पर है। सुमित्रा देवी जी, जो इस मकान की मालकिन हैं, उन्होंने फैसला किया है कि अब से आप दोनों को इस घर में रहने के लिए किराया … Read more

 बंटवारा या बचाव – अर्चना झा

“आजकल की बहुएं तो ब्याहकर आते ही… अलग रहने की फरमाइशें शुरू कर देती हैं। न बड़ों का लिहाज, न घर की परंपरा की चिंता। बस अपनी आज़ादी चाहिए इन्हें।” कमला बुआ ने पान चबाते हुए पीकदान की तरफ मुँह किया और फिर बड़े ही व्यंग्यात्मक लहज़े में कहा। आंगन में बैठी सावित्री देवी का … Read more

 मखमल की कैद – गीता वाधवानी

यह अपमान सीधा काव्या के दिल पर लगा। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने देखा कि राजेश्वरी देवी भी दूर से यह दृश्य देख रही हैं और गुस्से में उनकी तरफ आ रही हैं। इससे पहले कि सास उसे डांटकर वहां से हटातीं, काव्या ने टेबल से एक पेंसिल उठाई। बाथरूम का नल पूरी तेज़ी … Read more

 चार लोगों का ‘छोटा’ सा संसार – प्रियंका पटेल 

“तो क्या हम बुढ़ापे में झाड़ू लगाएंगे?” निर्मला देवी ने बात काट दी। “अरे, हमारे ज़माने में तो दस-दस लोगों का खाना हम अकेले चूल्हे पर बनाते थे, कुएं से पानी भरते थे, हाथ से कपड़े धोते थे। और एक तुम हो कि गैस, मिक्सी, वाशिंग मशीन सब होने के बाद भी रोती रहती हो। … Read more

मेरी भूल – गीता वाधवानी

 मां सुलभा, बेचैन होकर आंगन में इधर-उधर चक्कर लगा रही थी। कभी थक हार कर कुर्सी पर बैठ जाती थी तो कभी बड़बड़ाने लगती, ” मैं तो इस लड़की से तंग आ चुकी हूं। समझती ही नहीं है, पढ़ाई लिखाई में बिल्कुल ध्यान नहीं देती है। रोज कॉलेज जाती है सिर्फ मस्ती करने और फिर … Read more

अंत – संगीता अग्रवाल

आज वृद्धाश्रम में अपने बेड पर बैठी सविता जी अपनी गुजरी जिंदगी के बारे में सोच रही थी ….कहने को बेटे बहु पोते पोतियों से भरा पूरा परिवार है पर फिर भी कितनी अकेली है वो …पर ये अकेलापन भी तो उन्होंने स्वयं चुना है …या ये कहो कि उनके कर्मों का प्रतिफल है ये … Read more

कागज़ के रिश्तें – निभा राजीव निर्वि 

मीरा ने कार का दरवाज़ा बंद किया और एक गहरी सांस ली। सामने फैमिली कोर्ट की वो पुरानी, मटमैली इमारत खड़ी थी, जहाँ हर रोज़ न जाने कितने रिश्ते फाइलों में दफ़न हो जाते थे। आज उसकी बारी थी। मीरा के पिता, मिस्टर शर्मा, ने उसका हाथ थाम रखा था, मानो उसे गिरने से बचा … Read more

वो खाली घर नहीं था – रश्मि झा मिश्रा

कार का हॉर्न तीन बार बजाने के बावजूद जब अंदर से गेट खोलने कोई नहीं आया, तो समीर के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। उसने ड्राइविंग सीट पर बैठे-बैठे ही अपनी पत्नी, रिया की तरफ देखा। “देखा रिया? मैं तुमसे कहता था न कि माँ और बाबूजी वहां अकेले मुश्किल में हैं। अब … Read more

खामोश प्यार की गूंज – पुष्पा जोशी

दरवाजे की घंटी बजी तो सुमित्रा जी अपनी पुरानी आदत के मुताबिक थोड़ा बुदबुदाईं, “इस वक्त कौन आ गया? दोपहर की नींद का भी समय नहीं मिलता।” उन्होंने पल्लू ठीक किया और दरवाजा खोला। सामने अपनी बेटी रिया को खड़ा देख उनकी आँखों में चमक आ गई। “अरे रिया! तू? और वो भी बिना बताए?” … Read more

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