रिश्तों की असली गिनती – करुणा मलिक

“एक सास को गुमान था कि उसका घर भरा-पूरा है और बहू ‘अकेलेपन’ से आई है, इसलिए उसे रिश्तों की कद्र नहीं। लेकिन जब घर में विपत्ति की आंधी चली, तो उस ‘भरे-पूरे’ परिवार की भीड़ तमाशबीन बन गई और वो ‘अकेली’ बहू ढाल बन गई। पढ़िए एक ऐसी कहानी जो आपको सोचने पर मजबूर … Read more

*अच्छा बेटा बनने के चक्कर में अपनी पत्नी के साथ गलत तो नहीं कर सकता…* – तोषिका

मुझे नहीं खाना है ऐसा खाना जिसमें कुछ स्वाद ही ना हो, सारे मुंह का मजा किरकिरा कर देती हो तुम बहु…ताने मारते हुए दिव्या की सास बोली। दिव्या बस वहां मौन कड़ी रही। दूर से यह सब दिव्या के पति राम सुन रहे थे। मैं दफ्तर जा रहा हू, ये बोलते हुए राम निकल … Read more

महंगाई – एम. पी. सिंह  

आज बजट पेश करते ही गलिओं मैं महंगाई की फुस फुसाहट शुरू हो गई. सब्जियाँ बहुत महँगी हो गई, रसोई का बजट बिगड गया है,वगैरह वगैरह.  क्या किसी ने कभी चर्चा की कि हमारा रहन सहन, खान पान, दिन चर्या और न जाने क्या क्या बदल गया. सच बात तो ये है कि हमारा अपने … Read more

अपराध बोध – डाॅ संजु झा

पिछले कुछ वर्षों से विनय जी का मन रह-रहकर व्याकुल हो उठता है।उनके दिल में एक टीस-सी उठती रहती है -“काश!अपनी ग़लती का पश्चाताप करने का अवसर मिल जाता,तो अपराध-बोध से मुक्ति मिल जाती!” विनय जी को पता है कि अब उन्हें पश्चाताप का अवसर कभी नहीं मिलेगा।एक छटपटाहट सदा के लिए उनके दिल में … Read more

एक पति का अपराध बोध – गीतू महाजन

पूरे 15 दिन हो गए थे उसे गए हुए..वो सब कुछ छोड़कर जा चुकी थी हमेशा के लिए।एक ऐसी जगह जहां से कोई भी लौटकर नहीं आता और पीछे छोड़ गई थी अपना भरा पूरा घर परिवार।कितना ही सहेज कर रखती थी वह अपने घर को।कितनी तन्मयता से सब कुछ संभालती।बाहर की फुलवारी से लेकर … Read more

उम्मीदों का दिया  – रश्मि प्रकाश 

**”दीदी!! ये घर हम दोनों बहुओं का है, तो इस घर की जिम्मेदारी भी हम दोनों की ही होनी चाहिए।** सिर्फ़ सुख में हिस्सा बंटाना ही बहू का धर्म नहीं होता, दुख में कंधा देना भी उसी का धर्म है। आप जेठानी हैं तो क्या हुआ? क्या मैं इस घर की बेटी नहीं?” बनारस के … Read more

वो कंगन का सच: एक खामोश कुर्बानी – विभा गुप्ता

“बात क्या है, मैं सब समझती हूँ!” कमला देवी ने बीच में ही बात काट दी। “जब से इस घर की चाबियाँ तेरे हाथ में दी हैं, तुझे लगने लगा है कि तू ही मालकिन है। अरे, वो कंगन मैंने तुझे अपनी पुश्तैनी कमाई से बनवाकर दिए थे। आज मेरी ही बेटी को पहनने के … Read more

 अनकही चिट्ठियाँ  – निभा राजीव 

सुमेधा का सब्र का बांध टूट गया। वह चिल्लाई, “रोज़! रोज़ यही सुनती हूँ मैं रवि। माँ की हालत खराब है, माँ को दवाई देनी है, माँ को नेबुलाइज़र लगाना है। **24 घंटे जब अपनी माँ की ही सेवा करनी थी, तो तुमने मुझसे शादी ही क्यों की?**  कमरे में सूटकेस बंद करने की तेज़ … Read more

पुरानी जड़ों की नई कोंपलें – आरती झा

“नहीं बहू, आज बात बढ़नी चाहिए,” सुमित्रा जी खड़ी हो गईं। उनका स्वर आज याचना का नहीं, अधिकार का था। “मैं जानती हूँ तुम पढ़ी-लिखी हो, इंटरनेट से बच्चे पालना सीखती हो। पर मैंने भी एक बच्चे को पाला है—तुम्हारे पति को। शहर के पॉश अपार्टमेंट ‘ग्रीन वुड्स’ की सातवीं मंजिल पर बने फ्लैट नंबर … Read more

बटवारे की दीवार – हेमलता गुप्ता 

मेघना ने आग में घी डालने का काम किया, “रवि भैया, बुरा मत मानिएगा, लेकिन विकास अकेले कितना करेंगे? अभी हमने नई कार बुक की है, घर की ईएमआई है, हमारे बंटी की कोचिंग फीस है। आप तो जानते हैं महंगाई कितनी है। आप थोड़ा हाथ-पैर मारिये, छोटी-मोटी कोई भी नौकरी कर लीजिये। अब हर … Read more

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