तमाशा – अमिता कुचया

“अपने घर का धुआं जब दूसरों को दिखाओगे, तो लोग आग बुझाने नहीं, हाथ सेकने आएंगे… क्योंकि टूटे हुए मकान की ईंटें लोग अक्सर उठा ले जाते हैं।” — “तुम्हें लगता है कि मैं इस घर की मालकिन हूँ?” अंजलि ने आखिरकार चुप्पी तोड़ी, आवाज़ में कड़वाहट थी। “नहीं सुमित, मैं तो बस एक सजावटी … Read more

अपराध-बोध – डाॅ संजु झा

पिछले कुछ वर्षों से विनय जी का मन रह-रहकर व्याकुल हो उठता है।उनके दिल में एक टीस-सी उठती रहती है -“काश!अपनी ग़लती का पश्चाताप करने का अवसर मिल जाता,तो अपराध-बोध से मुक्ति मिल जाती!” विनय जी को पता है कि अब उन्हें पश्चाताप का अवसर कभी नहीं मिलेगा।एक छटपटाहट सदा के लिए उनके दिल में … Read more

पहला प्यार – विनीता सिंह 

पहला प्यार सुबह की ओस की तरह होता है, उसका एहसास ज़िन्दगी भर मन में एक उत्साह और उमंग भर देता है।अमर गांव में रहता है वह आगे पढ़ाई के लिए शहर के एक कॉलेज में एडमिशन लेता है बहुत ही सीधा और बहुत ही अपने आप में चुप रहने वाला लड़का है केवल अपनी … Read more

बचपन के दोस्त बन गए हमसफ़र – पुष्पा जोशी

बस गजेन्द्र अब बहुत हो गया, तुम्हारी नौकरी लगे भी दो साल हो गए। हम लड़की वालों को क्या जवाब दे। एक से बढ़कर एक रिश्ते आऐ हैं, तुम्हें जो पसन्द हो हमें बता दो। अगर तुमने कोई पसंद कर रखी हो तो वह बता दो। बेटा शादी की उम्र निकल जाएगी तो अच्छे रिश्ते … Read more

दहलीज के इस पार, आँचल के उस पार – मुकेश पटेल 

“अक्सर पुरुष यह सोचकर सारी ज़िंदगी निकाल देते हैं कि उन्होंने घर में ‘संतुलन’ बना रखा है, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि ‘माँ की ममता’ और ‘पत्नी के त्याग’ को तराजू पर तौला नहीं जा सकता, उन्हें सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है।” विहान को लगता था कि वह एक आदर्श बेटा और … Read more

तीसरा घर: एक पिता की अनोखी वसीयत – संगीता अग्रवाल 

“विदाई की बेला में जब पूरी दुनिया दुल्हन के गहने और दहेज का हिसाब लगा रही थी, तब एक पिता ने अपनी बेटी की हथेली पर कुछ ऐसा रख दिया, जिसने समाज की सदियों पुरानी रीत को हमेशा के लिए बदल दिया।” “पगली, बाप हूँ तेरा। मेरा फ़र्ज़ है तुझे शान से विदा करूँ। तू … Read more

वो बंद कमरा और बैग में सिमटी दुनिया – स्वाति जैन

“जिस घर की दीवारों का रंग कभी मेरी पसंद से तय होता था, आज उसी घर में मुझे अपनी एक साड़ी टांगने के लिए ‘इजाज़त’ और ‘जगह’ दोनों मांगनी पड़ी। क्या शादी के बाद बेटियों का हक सिर्फ यादों तक ही सिमट कर रह जाता है?” “सुमित, आपको नहीं लगता मायके का घर चाहे कितना … Read more

“मायके की सूनी देहरी और बूढ़ी आँखों की आस” – मुकेश पटेल 

“जब माता-पिता दुनिया से चले जाते हैं, तो एक बहन के लिए उसका भाई ही उसका मायका बन जाता है। वह दौलत या उपहारों की भूखी नहीं होती, वह तो बस अपने भाई की एक झलक पाकर ही अपने मायके को जीवित महसूस करती है… पर क्या आज का भाई इस मूक पुकार को सुन … Read more

सूने कमरों की गूंज – विभा गुप्ता

“ईंट और सीमेंट से दीवारें तो खड़ी हो सकती हैं, लेकिन उन दीवारों को थामने के लिए जिन रिश्तों की जरूरत होती है, अगर वही खोखले हो जाएं, तो करोड़ों का महल भी एक आलीशान खंडहर से ज्यादा कुछ नहीं होता। क्या एक पिता की पुरानी कुर्सी बेटे के नए इटालियन मार्बल की शोभा बिगाड़ … Read more

“कच्ची दीवारों का पक्का सच” – रश्मि प्रकाश 

“पिता के बनाए घर में रहकर दीवारों के रंग पर ताना मारना बहुत आसान होता है, लेकिन जब खुद की कमाई से सर छुपाने के लिए एक छत ढूंढनी पड़ती है, तब समझ आता है कि वो पुरानी दीवारें ईंटों से नहीं, पिता की रीढ़ की हड्डी से बनी थीं…” “पापा… मुझे माफ़ कर दीजिये। … Read more

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