वंश का अभिमान – रश्मि प्रकाश

*समाज कहता था कि जिसका अपना खून नहीं, वह वारिस कैसा? लेकिन उस सास ने भरी पंचायत में अपनी बहू के आंसू पोंछकर साबित कर दिया कि माँ बनने के लिए कोख की नहीं, कलेजे की ज़रूरत होती है।* “राघव, आप दूसरी शादी कर लीजिये,” सुमन ने सिसकते हुए कहा। “मैं नहीं चाहती कि मेरी … Read more

**साजिशों के बीच पनपा विश्वास** – शुभ्रा बनर्जी 

*”एक सास ने हीरे की अंगूठी चुराकर रिश्तों में कांच की दरार डालनी चाही, पर उसे नहीं पता था कि उसकी बहुओं का विश्वास उस हीरे से भी ज्यादा खरा और अटूट है।”* रसोई घर से आती खिलखिलाहट की आवाजें गायत्री देवी के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थीं। वह अपने … Read more

संस्कारों का मोल – आरती झा

*लिबास की चमक आँखों को धोखा दे सकती है, लेकिन संस्कारों की खुशबू रूह में उतर जाती है। देखिये कैसे एक सास ने दुनिया के ताने को अपनी समधन के सम्मान में बदल दिया!* “ये मेरी समधन, सावित्री जी हैं। अवनि आज जो कुछ भी है—इतनी समझदार, इतनी सहनशील, और घर को जोड़कर रखने वाली—ये … Read more

**खून के रिश्ते से बड़ा दिल का रिश्ता** – करुणा मलिक

*दुनिया की हर माँ अपने बेटे की ढाल बनती है, लेकिन वो माँ विरली ही होती है जो अपनी बहू के आत्मसम्मान के लिए अपने ही बेटे के खिलाफ तलवार बन जाए।* सावित्री जी उठीं और मेघा के पास जाकर खड़ी हो गईं। उन्होंने मेघा का हाथ अपने हाथ में लिया। वह हाथ कांप रहा … Read more

**कांच के टुकड़ों के लिए हीरा खो दिया** – लतिका अग्रवाल 

“जिस पत्नी को ‘अनपढ़’ और ‘गंवार’ समझकर उसने छोड़ दिया, यह सोचकर कि वह उसके ‘स्टेटस’ के लायक नहीं है, आज वही पत्नी जब सामने आई, तो उसकी कामयाबी ने पति के अहंकार को चकनाचूर कर दिया। क्या ‘स्टेटस’ ही सब कुछ होता है?” “पापा, आप नहीं समझेंगे। मुझे अपनी लाइफ में एक पार्टनर चाहिए, … Read more

मेरी अनपढ़ माँ का ओहदा – विभा गुप्ता

“जिस पत्नी को पति ने महफिल में ‘गंवार’ कहकर चुप करा दिया, उसी बेटे ने माइक थामकर पिता की सारी डिग्रियों को कागज का टुकड़ा साबित कर दिया। आखिर उस बेटे ने भरी सभा में ऐसा क्या कह दिया कि पिता की नजरें झुक गईं?” — “सोचना बंद करो तुम!” शेखर जी ने चिढ़कर उनकी … Read more

झूठी शान के खंडर – संगीता अग्रवाल

“अक्सर हम जिसे अपना खून कहते हैं, वही हमारी रूह को छलनी कर देता है, और जिसे पराया समझते हैं, वो हमारे स्वाभिमान की ढाल बन जाता है। क्या एक बेटे के लिए ‘सच’ बड़ा है या ‘परिवार की झूठी इज़्ज़त’?” — “तमीज़ तो मैं तब भूल गया था भैया, जब मैंने अपनी आँखों से … Read more

पिंजरे की मैना – माधुरी शर्मा 

“क्या एक बेटी की डोली उठने के बाद, उसके घर लौटने का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो जाता है? या फिर स्वाभिमान की लड़ाई में मायके की दहलीज़ लांघना कोई गुनाह नहीं?” “माँ-पापा, मुझे माफ़ कर दीजियेगा। मैं आपकी ‘अच्छी बेटी’ नहीं बन पाई जो चुपचाप जुल्म सह ले। लेकिन मैं एक ‘आत्मनिर्भर औरत’ … Read more

माटी की गुड़िया – अनिता गुप्ता

माँ ने अपने हाथों की लकीरें मिटाकर बेटे की तकदीर लिखी थी, लेकिन बेटे के ‘आधुनिक’ घर में उस माँ के लिए कोई कोना नहीं बचा। क्या एक बेटे की तरक्की उसकी माँ के आत्मसम्मान से बड़ी हो सकती है? सावित्री देवी की आँखों से आंसू बह निकले। मूर्ति टूटने का दुख नहीं था, बेटे … Read more

पहला प्यार – सुनीता मुखर्जी “श्रुति”

रितिका तुम तैयार हो जाओ…! आज कहीं बाहर चलते हैं। और हाँ….! रात का खाना भी बाहर खाकर आएंगे, ऑफिस से आते ही रमन बोला।  रितिका भी बाहर जाने के लिए कई दिनों से सोच रही थी, लेकिन अभी महीना खत्म होने में पाँच दिन बाकी थे। उसने रमन से इस संबंध में कुछ नहीं … Read more

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