रिश्ते – एम. पी. सिंह 

भोपाल के एरेरा कॉलोनी इलाके मैं सरल और सीधे स्वभाव के गुप्ता जी अपनी पत्नी आशा और बेटे राहुल के साथ रहते थे. न्यू मार्केट मैं उनका जाना माना होटल था जिसे उनके दादा जी ने खड़ा किया था. दादा जी और पिता जी के गुज़र जाने के बाद अब वहीं होटल के मालिक थे. … Read more

रिश्ते अधिकार से नहीं करुणा से  निभते हैं। – संजय सिंह

राजू और रानी की शादी हो गई। दोनों के  परिवारों की सहमति से यह शादी हुई थी ।फर्क सिर्फ इतना था कि दोनों ने एक दूसरे को पसंद किया था ।रानी अपने माता-पिता की इकलौती लड़की थी और राजू अपने तीन बड़े भाइयों में सबसे छोटा था ।दोनों इस शादी से काफी खुश थे। राजू … Read more

टोल प्लाजा – एम. पी. सिंह

कितना अजीब लगता है ज़ब कोई रईसजादा, टोल टेक्स बचाने के लिए टोल कर्मचारियों से बहस करतें हुए ट्रैफिक जाम कर देतें है और दूसरे यात्रियों  का समय और तेल बर्बाद करतें है. कभी कभी तो टोल पर तोड़ फोड़, लाठी डंडे और पिस्तौल तक निकाल लेते है. कई बार टोल कर्मियों पर गाड़ी तक … Read more

इंतजार – लतिका पल्लवी

 संध्या जी को अपनी बेटी और बहू को करवा चौथ मे देने के लिए साड़िया लेनी थी इसलिये उन्होंने मानव जी से बाजार चलने को कहा। मानव जी इस शर्त पर उन्हें बाजार ले गए कि तुम दुकान मे अंदर जाने को नहीं बोलोगी। संध्या जी को अच्छे से पता था कि मानव जी थोड़े … Read more

नासमझ प्यार – शुभ्रा बैनर्जी 

शादी तय हो गई थी मीना की।बस एक महीने और स्कूल में नौकरी करनी पड़ेगी,फिर तो छुट्टी हमेशा के लिए।पापा के जाने के बाद ही नौकरी ज्वाइन कर ली थी मीना ने। कॉलेज में कामर्स की फाइनल इयर में थी,तभी पापा गुजर गए।घर की बड़ी बेटी होने से जिम्मेदारी भी मीना के सर पर थी।पढ़ाई … Read more

पहला प्यार – नीलम शर्मा

सागर और संध्या समुद्र किनारे बैठे अपने भविष्य के सपने सजाने में डूबे थे ।लहरों की आवाज और ठंडी -ठंडी हवा बड़ी रोमांटिक और सुहानी लग रही थी। संध्या ने सागर के हाथों को अपने हाथों में लिया और आंखें बंद करके सागर के कंधे पर सिर टिका दिया। सागर ने संध्या के गालों को … Read more

झूठी शान के परिंदे – मुकेश पटेल 

 “माँ-बाप अक्सर अपने बच्चों की ‘चमक’ देखकर इतना खुश हो जाते हैं कि यह देखना भूल जाते हैं कि वो चमक सोने की है या पीतल की; और जब तक सच सामने आता है, तब तक घर की नींव बिक चुकी होती है।” “अरे भाई साहब, आप तो किस्मत वाले हैं। बड़ा बेटा बंगलौर में … Read more

वो बंद कमरा – संगीता अग्रवाल

“जिस मां ने अपने गहने बेचकर बेटे को विदेश भेजा, ताकि वो ‘बड़ा आदमी’ बन सके, आज उसी बेटे के आलीशान बंगले में उस मां के लिए दो वक्त की रोटी और एक खुली खिड़की भी मयस्सर नहीं थी… आखिर क्यों रिश्तों की कीमत ईंट-पत्थरों से कम हो गई?” — शेखर का खून जम गया। … Read more

चांदी के बर्तन – राधिका गोखले

*हम अक्सर अपनों को खुश करने के लिए दौलत की चमक का सहारा लेते हैं, पर भूल जाते हैं कि बुजुर्गों की झुर्रियों में छिपी मुस्कान मखमली सोफों से नहीं, बल्कि अपनेपन के दो मीठे बोलों से खिलती है।* “मयंक,” हरिनाथ जी ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा, “तुमने सोचा कि पैसा फेंककर तुम … Read more

**कर्मों की वसीयत: एक अबला का श्राप** – सुमन सक्सेना 

*”वक्त गूंगा नहीं होता, बस मौन रहता है। जब वह अपना फैसला सुनाता है, तो गवाहों की ज़रूरत नहीं पड़ती; इंसान की अपनी ही चीखें उसकी गवाही देती हैं।”* “मास्टर दीनानाथ जी, आप तो नाहक ही परेशान हो रहे हैं। अरे, लड़के वाले खुद चल कर आए हैं। वे कहते हैं उन्हें दहेज-वहेज कुछ नहीं … Read more

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