सूटकेस में बंद खुशियां

शिखा ने आगे कहा, “पापा, हम आपको यहाँ ‘बोझ’ समझकर नहीं लाए हैं। सच तो यह है कि हमें आपकी ज़रूरत थी। उस घर की चारदीवारी में हम सिर्फ़ ‘ज़िम्मेदारियाँ’ निभा रहे थे, ‘रिश्ते’ नहीं। रवि को अपना बचपन याद आ रहा था, जब आप उसे कंधे पर बिठाकर घुमाते थे। आज वो आपको घुमाना … Read more

खनकते सिक्के

रवि एक मेधावी छात्र था। उसके पिता, सोहनलाल, एक पुरानी कपड़ा मिल में दिहाड़ी मज़दूर थे, जहाँ काम मिलने का कोई पक्का भरोसा नहीं होता था। माँ, कौशल्या, घर पर ही बीड़ी बनाने का काम करती थीं, जिससे घर में नमक-तेल का खर्च निकल आता था। रवि ने बारहवीं की परीक्षा ज़िले में टॉप की … Read more

 ब्याज़ में मिली इज़्ज़त – लतिका श्रीवास्तव 

“अंजलि ने जैसे ही उस पुराने, काई लगे लोहे के गेट का ताला खोला, उसकी माँ, सावित्री का हाथ कांप गया। वह चाबी, जो अंजलि ने अभी-अभी उनकी हथेली पर रखी थी, उसका वज़न सावित्री को पहाड़ जैसा लग रहा था। यह सिर्फ़ एक मकान की चाबी नहीं थी, यह उस खोए हुए सम्मान की … Read more

अच्छा बेटा बनने के चक्कर में अपनी पत्नी के साथ गलत तो नहीं कर सकता – संजय सिंह

राजेश अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। माता-पिता ने उसे खूब पढ़ाकर, अच्छे संस्कार देकर इस समाज में रहना और जीवन यापन करना सिखाया ।अब राजेश बिजली विभाग में नौकरी भी करने लगा। रोजाना वे अपने दफ्तर बस से जाया करता। इस बस में मीरा नाम की लड़की कॉलेज जाया करती है। समय बीतता गया। … Read more

कभी तो बहू की भी प्रशंसा की जाए वरना – संध्या त्रिपाठी

वाह …आज क्या कटहल की सब्जी बनी है…  बहुत ही स्वादिष्ट बनी है… डाइनिंग टेबल पर बैठे सभी लोगों ने कटहल की सब्जी की बहुत प्रशंसा की..!  आराध्या मन ही मन खुश हो रही थी कि सब्जी के साथ उसकी भी तारीफ होगी…क्योंकि सब्जी तो वो ही बनाई है…!  पर कुछ ही देर में सासू … Read more

ममता की चौखट – हेमलता गुप्ता 

 गरिमा उस रात बहुत रोई। सुमित ने उसे समझाया, “गरिमा, माँ का स्वभाव ऐसा ही है। तुम दिल पर मत लो। मेरे लिए तुम ही इस घर की लक्ष्मी हो।” पर गरिमा के मन में एक सवाल घर कर गया था—क्या प्यार और सेवा का कोई मोल नहीं होता? क्या रिश्तों की बोली सिर्फ पैसों … Read more

फर्ज़ – रश्मि झा

“मैंने जो कहा, वो तूने सुना नहीं आरुषि? कल से तेरी जेठानी, वंदना, अस्पताल से घर आ रही है। डॉक्टर ने उसे पूरे दो महीने के ‘बेड-रेस्ट’ (बिस्तर पर आराम) के लिए कहा है। मैंने फैसला किया है कि तू अपनी यह ऑनलाइन नौकरी-वौकरी कुछ दिन के लिए बंद कर दे। घर की इज़्ज़त और … Read more

 माँ का अदृश्य दर्द – डॉ अनुपमा श्रीवास्तव

“चुप रहिये माँ जी!” काव्या पहली बार सास पर चिल्लाई, लेकिन इस चिल्लाने में डांट नहीं, बल्कि एक बेटी का अधिकार और डर था। “आप हमें अनाथ करके जाना चाहती हैं? इतना दर्द छिपाकर आप… आप हमारे लिए…” काव्या का गला रुंध गया। रसोई में कुकर की सीटी की आवाज़ ने सुमित्रा जी की तंद्रा … Read more

पुरानी नींव, नई दीवारें – लतिका श्रीवास्तव

“मुझे अपनी लाचारी पर गुस्सा आता है, सुमन। मुझे गुस्सा आता है कि मैं अब ‘जरूरत’ नहीं रही, बस एक ‘बोझ’ बन गई हूँ। जब मैं तुझे घर के काम करते देखती हूँ, तो मुझे अपनी जवानी याद आती है। और जब तू कोई काम छोड़ देती है या गलती करती है, तो मुझे लगता … Read more

बूढ़े हाथों की नई परिभाषा – रीमा ठाकुर

 “मुझे पता है, यदि एक बार कामवाली लगा ली या तुम पर छोड़ दिया, तो इन बर्तनों की चमक चली जाएगी। कामवाली तो बस ऊपर-ऊपर से कपड़ा मारती है। ये पूजा के बर्तन हैं, इनमें मेरी आत्मा बसती है। और रही बात मेरे दर्द की, तो शरीर चलता रहे तभी तक ठीक है। किसी पर … Read more

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