रूधिरा एक छलावा ” – रीमा महेंद्र ठाकुर

“समन्दर की लहरें उफान पर थी”  छोटे छोटे पत्थरो के ऊपर से गुजरते हुए एक बच्चा तेजी लहरों की ओर बढ रहा था “ बेटा, ज्यादा तेज मत भागो “कंक्रीट है चुभ जाऐगी” पीछ से मां आवाज लगा रही थी!  नो मम्मा “” सूज है न, बच्चा रुककर “पैर ऊपर उठाकर माँ को” दिखाते हुए … Read more

अमानत – अनुपमा

निशा कहां हो तुम … निशा निशा … आवाज देते देते आकाश सीधे उसके कमरे मैं घुस गया , वहां निशा को रमन के साथ देख कर बोला अरे तू  यहां कब आया .. कब से आवाज दे रहा हूं तुझे सुनती क्यों नही और हां अच्छा हुआ तू भी यही है चलो आज नई … Read more

परम्परा के लीक से हटकर एक नई पहल -सुषमा यादव

,हम भारतीय अपनी जिंदगी में बहुत से पुरानी प्रथाओं , परम्पराओं और रीति रिवाजों से अपने पुर्वजों के जड़ों से जुड़े हुए हैं,, इनमें बहुत सी कुरीतियों और कुप्रथाओं तथा अंधविश्वासों से धीरे धीरे हम मुक्ति पा रहें हैं,, पर कुछ रीति रिवाज, संस्कार ऐसे भी हैं,जो हमें निभाने पड़ते हैं, लेकिन हम समयानुसार उसमें … Read more

दोस्ती – प्रियंका त्रिपाठी ‘पांडेय’

जतिन और नितिन दोनों बचपन के दोस्त थे। दोनो साथ-साथ खेले कूदे। स्कूल कालेज तक की पढ़ाई भी साथ में पूरी की। दोनों होनहार थे इसलिए दोनों की सरकारी नौकरी भी लग गई। जतिन नितिन एक दूसरे से अपनी हर बात साझा करते थे,एक दूसरे के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे। दोनो … Read more

 रिश्ता तेरा मेरा  – बेला पुनीवाला

  तेरी मेरी बातें जो कभी ख़तम नहीं होती,                    जब हम साथ थे, साथ में कॉलेज आना, जाना, वो बातें, वो मुलाकातें, कॉलेज में lecture bunk करके तेरे साथ सीढ़ियों पे बैठें रहना, इधर-उधर की बातें करना, सबको चिढ़ाना, मस्ती करते रहना, तेरे साथ रोज़-रोज़ कॉलेज की canteen में वड़ापाव और कचोरी खाने … Read more

माधुर्य – कंचन श्रीवास्तव

रवि के जाने के बाद रेखा बिल्कुल अकेली पड़ गई,पड़ती भी क्यों ना हर वक्त उसी के आगे पीछे जो घूमती रहती । उसे तो अंदाजा भी नहीं था कि ऐसा होगा उसकी जिंदगी में ,पर हुआ। अब मरता क्या न करता अपने किए की सजा तो पानी ही है। उसे अच्छे से याद है … Read more

वो लड़का गरीब था  – ‌खुशनुमा हयात

सर्दी का मौसम था, सड़कों पर ज्यादा भीड़ नही थी। मैं ,कालेज जा रही थी। पैदल सफर करती थी कॉलेज जाने में आधा घंटा लगता था। रोज की तरह मैं, आज भी कॉलेज के लिए घर से निकली। मै स्नातक की छात्रा थी सफेद ड्रेस बालों में सफैद रिबन लगाए काले जूते पहन कर कॉलेज … Read more

उसे पिता मिल गया – डॉ कवि कुमार निर्मल

एक वृद्ध पागल ऐसा दिखता सड़क पर जैसे दिशाहीन लड़खड़ा कर चल रहा था। कभी कभी वह कोई खंभा देखता तो उसका सहारा ले कर कुछ पल ठहर जाता। एक सड़क के फुटपाथ पर बेंच की ओर दिखा तो कुछ लपक पर उसपर जा बैठा। अशोक उसे ध्यान से लगातार देखते हुए न जाने क्यों … Read more

सानिध्य -तृप्ति शर्मा

“आप मेरी चूड़ियां पकड़कर क्यों सोते हैं।”शादी के कुछ दिनों बाद ही थोड़ी हिचकिचाहट के साथ रुचि ने अभिनव से पूछ लिया। अभिनव ने रुचि की आंखों में आंखें डाल कर मुस्कुराते हुए कहा। मुझे अच्छा लगता है इनका सानिध्य इनकी खनखनाहट रुचि ,और इन्हें छूकर मुझे तुम्हारे पास होने का एहसास भी होता है। … Read more

दोस्ती- यारी – मीनाक्षी राय

हरीश जी की उम्र रिटायरमेंट की हुई थी वो फोन पर बात करते हुए बहुत ठहाके लगा रहे थे,,,,,,, सामने से उनकी पत्नी मनोरमाजी चाय लेकर आती है,,,,,, वो जान जाती है,,,, कि आज फोन जरुर राघव का  है। राघव  हरीश के बचपन के दोस्त थे ,,,,,,,पढाई भी दोनो साथ किये थे तो दोनो मे … Read more

error: Content is protected !!