रक्षा – पुष्पा पाण्डेय

शालिनी को बचपन से सुरक्षा विभाग में नौकरी करने की प्रवल इच्छा  थी, लेकिन वह जानती थी कि उसके माता-पिता उधर नहीं जाने देंगे। अंततः उसका नामांकन मेडिकल काॅलेज में हुआ। मन-ही-मन वह हमेशा यही सोचती रही कि वह आर्मी के अस्पताल में नौकरी करेगी। वो वक्त भी आया जब उसे निर्णय लेना था।  माँ-बाप … Read more

राखी का गिफ़्ट – प्रीति आनंद अस्थाना

ऑफ़िस के रास्ते में एक अत्यधिक व्यस्त ट्रैफ़िक सिग्नल पड़ता था। अगर उस पर रुकना पड़ गया तो कम से कम पाँच-सात मिनट की तो छुट्टी हो ही जाती। मेरी नई-नई नौकरी लगी थी तो ऑफ़िस पहुँचने की जरा जल्दी रहती। वहाँ रुकना बेहद अखरता था। इसी सिग्नल पर कुछ लोग तमाम तरह का सामान … Read more

साँसों का तार… – विनोद सिन्हा “सुदामा”

अर्पिता मन में अथाह प्रेम लिए पलकपांवडे़ बिछाए बैठी अपने भाई के आने का इंतजार कर रही थी.. एक नई उम्मीद के साथ एक नए अहसास के साथ…इस राखी पर्व पर.अनुभव की राह तक रही थी… मन की भावनाएं शांत होने का नाम नहीं ले रही थी..खुशी आँखों से आँसूं बन कर निकल रही थी..भाई … Read more

 पश्चाताप – गार्गी राय

शर्मा जी , जो सरकारी नौकर होते हुए भी स्वाध्याय के द्वारा अच्छा-खासा  साहित्यिक समझ रखते थें । अध्ययन में रुचि रखने से काम में हमेशा ईमानदार रहें ….नतीजा हमेशा आर्थिक तंगी का शिकार होना पड़ा । हालाँकि  शर्मा जी ऊँचे पद पर कार्यरत थें । हमारे देश की विडंबना है की पैसे बेईमानो के … Read more

उपहार – रश्मि स्थापक

“नेहा का फोन आया था…।” अविनाश बाथरूम से जैसे ही नहा के बाहर निकला कि पत्नी ने बताया। “अरे!मैं वही सोच रहा था कि छुटकी आज पहली बार रक्षाबंधन पर दूर है और अभी तक उसका फोन नही आया…मैं खुद ही नहा कर लगाने वाला था…क्या कहा छुटकी ने?” “आपसे बात करेगी…पर मुझे समझ नहीं … Read more

“माँ के हाथ की सब्जी ” – *नम्रता सरन”सोना”*

सुषमा आज फिर सकारात्मक उत्तर की अपेक्षा मे प्रमोद जी की खाने की थाली परोस रही थी कि, शायद आज दिल खुश हो जाये … प्रमोद जी ने खाना शुरू कर दिया , पहला निवाला मुँह मे रखते ही वे बोले ,अरे वाह ,,,आलू प्याज़ की सब्जी,,,, सुषमा की  जिज्ञासा और बढ़ी कि,शायद अब वे … Read more

“आ! बहना,राखी बांधे” – ऋतु अग्रवाल

         रिया और सिया दोनों जुड़वा बहनें, बहुत प्यारी। एक दूसरे से इतना प्यार करती थी मानो दो जिस्म एक जान हो। दोनों लगभग पाँच साल की थी। वैसे तो उन्हें कुछ ज्यादा नहीं पता था पर जब रक्षाबंधन पर बाजार में रंग-बिरंगी राखियाँ सजती तो बाल सुलभ कुतूहल माँ से पूछ बैठता,” मम्मी हमारा … Read more

इंतज़ार – लखविंदर सिंह संधू

“सर ये शर्मा जी हैं यह आपके साथ ही इस कमरे में बैठेंगे” मेरे दफ्तर का चपड़ासी एक आदमी जिनको वो शर्मा जी कह रहा था के साथ सामने खड़ा था । मैंने पूरे अदब से उनका वेलकम किया । “आप तो कल आने वाले थे मैंने आपके ऑर्डर देखे थे ” मैंने शर्मा जी … Read more

जख्मों की हांडी – सरिता गर्ग ‘सरि’

बहुत साधारण वस्त्र और टूटी सी पुरानी चप्पल पहने लगभग घिसटती -सी आज जब वे मेरे पास आईं , उनके हाथ में एक सीलबंद लिफाफा था। आते ही बोली मैं तुम्हें एक काम सौंप कर जा रही हूँ। मेरे जीते ही तो यह सम्भव न हुआ पर शायद तुम वह सुपात्र हो जो निश्चित रूप … Read more

बहू/बेटी / सास/माँ – गीतांजलि गुप्ता

थोड़ी देर को बाहर ले चलो सिस्टर कमरे में पड़े पड़े मन घबरा गया है। शालू सिस्टर से कह रही थी पर सिस्टर सुना अनसुना कर कमरे से निकल गई। महीने भर से शालू अस्पताल में दाखिल है। उस का भाई मानव कभी कभी मिलाई के समय आ जाता है औपचारिक मुलाकात होती है। ठीक … Read more

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