अगर भगवान भी आ जायें,तो भी तुम्हारा साथ नहीं छोडूंगा……. – सिन्नी पाण्डेय

दिशा संयुक्त परिवार में पल बढ़ रही थी तो उसका हर रिश्ते के प्रति बड़ा जुड़ाव था I पर अधिकतर जैसा सब घरों में होता है कि बच्चों का ज्यादा लाड़ दुलार अपने दादा दादी से ही होता है, तो यही हाल दिशा का भी था I वो अपने दादा दादी की  बड़ी लाडली थी … Read more

अपनो की पहचान – उमा वर्मा

अम्मा जी को गुज़रे पाँच साल बीत गए, लेकिन हमेशा उनकी याद आती है। आज भी सौरभ को ऑफिस भेजकर, चाय लेकर बरामदे में कुर्सी डालकर बैठी तो बीते हुए क्षण आँखों के सामने घूमने लगे। बहुत अच्छी थीं अम्मा जी। शादी के बाद पहली बार ससुराल गई तो मन में एक डर समाया हुआ … Read more

अपनों की पहचान – नीलम शर्मा 

सुरीली एक मस्त और हरफनमौला लड़की थी। उसे लगता था कि बस जो कुछ वह सोचती और करती है वही सही है। ऐसा नहीं था कि वह बददिमाग या बदतमीज थी। उसकी बहुत बड़ी कमी थी अपने आप को हर बात में सही ठहराना। अगर उसकी मम्मी मीना उसके किसी व्यवहार को गलत बताकर उसे … Read more

हृदय परिवर्तन – डाॅ उर्मिला सिन्हा

   देखते-देखते पांच वर्ष बीत गए। राहुल से रैना ने घरवालों के खिलाफ प्रेम विवाह किया था। एक बिटिया भी दो वर्ष की हो गई।इस बार  पड़ोस में नई फेमिली आई है भरा-पूरा परिवार है…तीज की तैयारी में पूरा परिवार व्यस्त है। आंटी ने बताया,”बहू अपने मायके गई है हरियाली तीज में और बिटिया यहां आई … Read more

कैसे हो अपनों की पहचान? – रोनिता कुंडु 

हेलो पापा जी कैसे हो आप सब? मम्मी जी और अविनाश कैसे हैं? पूजा ने कहा  अमित जी:   बहू! हम सब तो ठीक है, पर तुम ठीक तो हो ना? आज मेरा नंबर गलती से लग गया या कोई काम है? पूजा:  ऐसा क्यों बोल रहे हैं पापा जी? भले ही आप लोगों से … Read more

अपनों की पहचान-मनीषा सिंह

स्वागत है तुम्हारा” रोशन भवन” में••! आज से तुम हमारे घर की सदस्या हो! कहते हुए शारदा जी बहू की नजर उतरती हैं और उसके गृह प्रवेश हो जाने के बाद वह आनंदी शारदा जी की इकलौती बेटी जिसकी शादी भोपाल के बड़े बिजनेसमैन से हुई थी, से भावना को उसके कमरे तक ले जाने … Read more

मायके की पुकार

सुमन फोन उठाने के लिए जैसे ही भागी, तभी सास कविता देवी की ऊँची आवाज़ गूँजी—“फिर बज उठा तेरे फोन का घंटा! तेरी माँ और तेरे रिश्तेदारों को क्या चैन नहीं है? दिन में दस-दस बार फोन करते हैं। जैसे हमारे घर का सुख-चैन छीनकर ही दम लेंगे।” सुमन सकपका गई। शादी को बस एक … Read more

वसीयत का सच

“कैसी वसीयत बनाई पिताजी ने! ज़मीन, मकान, कुछ भी पूरी तरह से हमारा नहीं। हर चीज़ में मम्मी की हिस्सेदारी… जब तक वह ज़िंदा हैं, तब तक कुछ भी हमारा नहीं।” —बहू अंजली ने होंठ सिकोड़ते हुए कहा। “मैं भी यही सोच रहा हूँ। पेंशन तो वैसे ही उन्हें मिलती रहेगी। फिर भी पिताजी ने … Read more

मुझे अपनो की पहचान हो गई है। – अर्चना खण्डेलवाल

मम्मी,  आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं, और हमारी तरफ से ये प्यारा सा उपहार, रोली ने आपके लिए अपने हाथों से जन्मदिन का केक बनाया है, जतिन ने अपनी मम्मी रंजना जी के पैर छूकर आशीर्वाद लिया। केक देखकर रंजना जी के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया, उन्होंने उड़ती नजरों से केक को देखा … Read more

रिश्तों की दरार

“बड़ी बहू! बड़ी बहू!… रुको ज़रा!” मोहल्ले की चाची हाँफती हुई प्रज्ञा के पास पहुँचीं।प्रज्ञा ने तुरंत पैर छूते हुए कहा—“क्या हुआ चाची जी? आप इतनी घबराई क्यों हैं? सब ठीक तो है?” चाची ने लंबी साँस ली और बोलीं—“अरे बड़ी बहू, हम तो ठीक हैं, लेकिन तुम्हारे घर में आज फिर झगड़ा हुआ है। … Read more

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